
बालोद@सतीश रजक। Shamshad Begum Padma Shri: कभी घूंघट में रहकर किताबें पढ़ने के लिए संघर्ष करने वाली शमशाद बेगम आज 65 हजार से अधिक महिलाओं के आत्मविश्वास और सामाजिक बदलाव की आवाज बन चुकी हैं। 65 साल की शमशाद बेगम जनकल्याण समिति के माध्यम से बाल विवाह रोकने, गरीब और आदिवासी बेटियों को उच्च शिक्षा से जोड़ने और युवाओं को नशे से दूर करने के लिए काम कर रही हैं। उनके सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें नारी शक्ति सम्मान, जानकी देवी बजाज पुरस्कार और 2025 का कौशल पुत्री सम्मान समेत कई सम्मान मिल चुके हैं।
रूढ़िवादी माहौल में पली-बढ़ी शमशाद को बचपन से ही पढ़ने की जिद थी। पांचवीं कक्षा में उनकी शादी तय कर दी गई। इसके बाद वे ससुराल गुंडरदेही पहुंचीं, लेकिन पढ़ाई का सिलसिला नहीं टूटा। घरेलू जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने निजी परीक्षा देकर अपनी शिक्षा पूरी की। अपने संघर्ष ने उन्हें यह संकल्प दिया कि दूसरी बेटियों को पढ़ाई के लिए ऐसी परेशानियों का सामना न करना पड़े।
शराब, जुआ और घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ शमशाद ने महिलाओं को संगठित किया। मैरून साड़ी, टोपी और हाथ में लाठी लेकर महिला कमांडो गांवों में रात के समय गश्त करने लगीं। धीरे-धीरे यह पहल बड़े सामाजिक अभियान में बदल गई। छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी महिला कमांडो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ काम करने लगीं।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वयं सहायता समूहों के जरिए खेती, सिलाई और लघु उद्योगों से भी जोड़ा गया। इससे महिलाओं को सामाजिक बदलाव के साथ आर्थिक मजबूती की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिला।
1995 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन से जुड़ने के बाद शमशाद ने गांव-गांव जाकर महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया। सामाजिक विरोध और तानों के बावजूद उन्होंने महज छह महीने में 12,269 महिलाओं को साक्षर किया। इसके बाद शिक्षा उनके सामाजिक अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
वर्तमान में शमशाद बेगम तीन प्रमुख मोर्चों पर काम कर रही हैं। उनका पहला लक्ष्य बाल विवाह रोकना, दूसरा गरीब और आदिवासी बेटियों को उच्च शिक्षा से जोड़ना और तीसरा युवाओं को नशे से दूर रखना है। अपने व्यक्तिगत संघर्ष को सामाजिक आंदोलन में बदलकर उन्होंने हजारों महिलाओं को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की राह दिखाई है।
शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2012 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। आज भी उनका अभियान महिलाओं और बेटियों को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव से जोड़ने की दिशा में जारी है।