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11 शिक्षादूतों को नक्सलियों ने मारा, फिर भी नहीं बुझा शिक्षा का दीप… 441 जांबाजों ने ऐसे बदली बस्तर की तस्वीर

Bastar Teacher's Day Special: नक्सल हिंसा के साए में जहां कभी स्कूल पहुंचना भी मुश्किल था, वहीं शिक्षादूतों ने बच्चों तक शिक्षा की लौ पहुंचाई। अपने 11 साथियों को खोने के बाद भी यह मुहिम नहीं रुकी।
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जगदलपुर

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Khyati Parihar

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Updated: 5 Sep 2026, 4:00 PM IST

Chhattisgarh News

11 शिक्षादूतों को नक्सलियों ने मारा (फोटो सोर्स - पत्रिका)

Teacher's Day 2026: बस्तर आज अगर नक्सल मुक्त है तो उसमें फोर्स के साथ ही बीजापुर और सुकमा के 441 शिक्षादूतों का भी विशेष योगदान है। शिक्षादूत धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा की लौ जगाने के साथ ही ग्रामीणों को हिंसा के खिलाफ जागरूक करने वाले बनकर उभरे। लगातार 10 साल तक एक रणनीति के तहत उन्होंने काम किया और गांवों को नक्सलमुक्त बना डाला। गांवों के बच्चे शिक्षित बने और नक्सल संगठन कमजोर होता गया।

शिक्षादूतों को नक्सली इसी वजह से पसंद नहीं करते थे और बीते 10 साल में दोनों जिलों में 11 शिक्षादूतों की हत्या भी कर दी गई। बावजूद इसके वे आज भी डटे हुए हैं। सुकमा में 107 और बीजापुर में 334 शिक्षादूतों को इतने जोखिम के बाद भी महज 12 हजार रुपए मानदेय के रूप में मिलते हैं।

एक के बाद एक शिक्षादूत मारे गए, मगर गांवों में बच्चों की कक्षाएं बंद नहीं हुईं। पक्के स्कूल भवनों को नक्सलियों ने निशाना बनाया तो झोपड़ियां कक्षाएं बन गईं। डर के बीच ब्लैकबोर्ड लगा, बच्चों ने किताबें खोलीं और बस्तर के उन इलाकों में पढ़ाई शुरू हुई, जहां कभी शिक्षक का पहुंचना भी असंभव माना जाता था। आज उसी संघर्ष की कहानी में करीब 441 शिक्षादूतों के कदमों की आहट है। बीजापुर के 334 और सुकमा के 107 स्थानों पर शिक्षा की यह मुहिम विपरीत परिस्थितियों में भी जारी है।

मौत के साये में शुरू हुए स्कूल

नक्सलवाद के चरम दौर में बस्तर के अंदरूनी इलाकों में स्कूलों की हालत किसी त्रासदी से कम नहीं थी। सलवा जुडूम के दौर में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने गांव छोड़े। इसके बाद नक्सलियों ने कई स्कूल भवनों को पुलिस की मौजूदगी से जोडकर निशाना बनाया। स्कूल टूटे तो बच्चों की पढ़ाई भी टूट गई। उस दौर में 300 से अधिक स्कूलों के बंद होने की बात सामने आती है। शिक्षक अंदरूनी गांवों में जाने से डरते थे। वजह साफ थी, नक्सली उन लोगों को निशाना बना सकते थे जो बच्चों को पढ़ाने के लिए गांवों तक पहुंचते।

शिक्षादूतों का काम अशोक की वजह से पूरे देश में चर्चा का कारण बना

इस कहानी का सबसे अहम किरदार हैं जगरगुंडा के अंदरूनी इलाके से आने वाले अशोक बघेल। सलवा जुडूम के दौर में अशोक भी अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर बाहर आ गए थे। उनकी पढ़ाई 12वीं तक हुई थी। बाद में उनका संपर्क प्रथम एजुकेशन नामक संस्था से हुआ।

शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने बस्तर के अंदरूनी इलाकों की उस पीढ़ी को करीब से देखा, जिसके सामने स्कूल और किताबों से ज्यादा बंदूक और हिंसा का माहौल था। अशोक के मन में एक डर घर करने लगा था कि अगर इन बच्चों तक शिक्षा नहीं पहुंची तो आने वाले वर्षों में यहां का युवा नक्सलवाद के प्रभाव में फंसता चला जाएगा। यहीं से उन्होंने तय किया कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल हों, अंदरूनी गांवों में शिक्षा पहुंचानी होगी।

सामने था मौत का खतरा, फिर भी कलेक्टर को बताई योजना

अपनी सोच को जमीन पर उतारने के लिए अशोक सबसे पहले बीजापुर कलेक्टर के पास पहुंचे। उन्होंने अंदरूनी इलाकों में बच्चों को पढ़ाने की योजना सामने रखी। योजना सुनना आसान था, लेकिन उसे लागू करना बेहद मुश्किल। सबसे बड़ा सवाल था कि जो शिक्षक वहां जाएगा, उसकी सुरक्षा कौन करेगा? नक्सल प्रभावित इलाके में किसी शिक्षक को भेजना मतलब उसे सीधे खतरे के बीच भेजना था।

अशोक को भी खतरे का अंदाजा था। लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय गांव जाने का फैसला किया। वे अंदरूनी गांवों में पहुंचे। ग्रामीणों से बात की। बच्चों को पढ़ाने की बात रखी। ग्रामीण तैयार हुए और यहीं से एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जिसका विस्तार आज पूरे अभियान के रूप में सामने है।

दस साथियों की मौत ने डराया जरूर, रोका नहीं

शिक्षा की राह में शिक्षादूतों को भीषण कीमत चुकानी पड़ी। करीब 10 शिक्षादूतों की नक्सली हिंसा में हत्या ने पूरे अभियान को झकझोर दिया। हर मौत के बाद सवाल उठता था- क्या अब यह अभियान रुक जाएगा? लेकिन जवाब गांवों से आया। कक्षाएं फिर लगीं। बच्चे फिर पहुंचे। किताबें फिर खुलीं।

जिन लोगों ने अपने साथियों को खोया, उन्होंने उन्हीं बच्चों के बीच जाकर पढ़ाना जारी रखा। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ नौकरी या काम नहीं था। यह उन गांवों की अगली पीढ़ी को हिंसा से निकालकर शिक्षा की ओर ले जाने की कोशिश थी।