Silent Resignation in India: सोशल मीडिया पर दिखा ट्रेंड लोग सामने आकर बता रहे नौकरी कर रहे हैं, लेकिन काम से इमोशनली हो चुके हैं डिस्कनेक्ट (Silent Resignation), कुछ लोग सिर्फ सैलरी के लिए कर रहे नौकरी? आखिर क्या कहता है मनोविज्ञान? क्यों बढ़ रहा ये नया और खतरनाक ट्रेंड?
Silent Resignation India: सुबह 5 बजे अलार्म बजता है… नींद खुलती है… लेकिन फिर ऑफिस जाने का मन नहीं होता… बॉस की डांट और सैलरी कटने का डर जागने को मजबूर करता है और मिनटों में तैयार होकर ऑफिस पहुंच जाते हैं… सबको विश किया और हंसते-बोलते काम कंप्लीट भी। शाम को घर लौटने पर भी व्यक्ति खुश नजर आता है। लेकिन नौकरीपेशा लाइफस्टाइल का ये चेहरा जैसा नजर आ रहा है वास्तव में अब ऐसा नहीं रहा… अब मन के भीतर एक बड़ा बदलाव चुपचाप पनप रहा है। बड़ी संख्या में कर्मचारी अब नौकरी छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन उससे एक दूरी मेंटेन कर चुके हैं। एक्सपर्ट्स इसे Sillent Resignation या Quiet Quitting का नया दौर कह रहे हैं। Patrika.com पर पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
भोपाल की एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे मंडीदीप की एक फैक्ट्री में काम करती हैं। उनके साथ तीन और लड़कियां भी हैं, जो नई हैं। 20 साल से फैक्ट्री में अपनी सेवाएं दे रहीं ये अकाउंटेंट बताती हैं कि सैलरी बहुत कम मिलती है। ज्यादा इंक्रीमेंट नहीं होता। वहीं नए बच्चे ऐसे हैं जो कुछ सीखना नहीं चाहते, तो उनका काम भी उन्हीं के सिर पर आ जाता है। काम का बढ़ता बोझ और लंबा समय उन्हें परेशान करता है, वे कहती हैं कि अगर सैलरी अच्छी होती है तो काम बोझ नहीं लगता, लेकिन कम सैलरी, ज्यादा काम और समय के कारण अब ऑफिस तो जाती हूं, लेकिन अनमने मन से काम करती हूं। अपनी नौकरी से अब पहले जैसा प्यार नहीं रहा मुझे, मैं इमोशनली इससे दूर हो चुकी हूं। बस नौकरी चलती रहे इसलिए काम करने आ जाती हूं।
भोपाल की ही एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका कहती हैं कि लगातार बढ़ता वर्कलोड और फिर घर की दोहरी जिम्मेदारी अब उन्हें मानसिक रूप से थकाने लगी है। स्कूल में पढ़ाई के अलावा बढ़ती कई अन्य जिम्मेदारियां उन्हें मेंटली परेशान भी करती हैं। वे कहती हैं कि फिजिकली तो वह स्कूल जाती हैं, लेकिन मेंटली हमेशा थकावट और परेशानी महसूस करती हैं।
एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले दीपक साउद बदला हुआ नाम, कहते हैं दो साल पहले तक वे अपनी कंपनी के सबसे एक्टिव कर्मचारियों की लिस्ट में शामिल थे। Overtime, नए प्रोजेक्ट्स के साथ एक्स्ट्रा रेस्पॉन्सिबिलिटी उनकी वर्किंग लाइफस्टाइल का हिस्सा थी। लेकिन अब उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया है।
वे कहते हैं कि लगातार टारगेट्स, देर रात तक फोन कॉल और छुट्टी के दिन भी काम ने उन्हें एक मशीन बनाकर रख दिया था। लेकिन अब वे उतना ही काम करते हैं, जितना जरूरी है। वे बताते हैं कि पहले उन्हें कंपनी में अपनापन लगता था, लेकिन अब यह सिर्फ एक सेलरी अकाउंट बनकर रह गई है। पहले जैसा जुड़ाव कंपनी से अब नहीं रहा। दीपक बताते हैं कि आज के दौर में नौकरी छोड़ने का विकल्प आसान नहीं रहा। EMI, बढ़ते खर्च और अनस्टेबल मार्केट अब नौकरी करने के लिए मजबूर करने लगा है।
मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के मुताबिक 'जब एक एम्प्लॉई लंबे समय तक इस स्थिति से गुजरता है, तो उसे Anxiety, Sleep Disorder और Emotional numbness जैसी मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। आज की पीढ़ी पहले से ही कंपेरिजन कल्चर और ऑलवेज एवेलेबल वर्क एन्वायरमेंट में जी रही है।'
डॉ. सत्यकांत बताते हैं, आजकल वर्क लाइफ बेलेंस केवल कॉर्पोरेट स्लोगन बनकर रह गया है। कई कर्मचारी ऑफिस अवर्स खत्म होने के बाद भी मेंटली ऑफिस वर्क से बाहर नहीं निकल पाते। यही धीरे-धीरे इमोशनल बर्नआउट हो रहे हैं और मेंटली रेजिगनेशन या क्वाइटली क्विट जैसे मामले सामने आ रहे हैं।
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि वर्कप्लेस पर सबसे बड़ी चुनौती कर्मचारियों का इस्तीफा नहीं, बल्कि उनका इमोशनली डिस्कनेक्टेड होना है। क्योंकि जब कर्मचारी निराशा या टूटे मन के साथ काम करते हैं, तो इसका असर कंपनियों की प्रोडक्टिविटी पर नजर आता है। यही कारण है कि अब ऑफिसों में ज्यादा दिखाई देने वाली स्थिति कर्मचारियों की थकान नहीं बल्कि उनकी चुप्पी बन गई है।
Silent resignation या Burnout Employees वाली परिस्थियों के भावी खतरों को भांपते हुए कंपनीज या संस्थान 4 डे वर्क इन वीक कर सकती हैं। मेंटल हेल्थ लीव शुरू कर सकती हैं। फ्लैक्सिबल टाइमिंग रख सकती हैं। हाईब्रिड वर्क को प्राथमिकता दे सकती हैं।आज भी कई कंपनियां और संस्थान एम्प्लॉइज वेलबींग प्रोग्राम्स जैसे मॉडल्स पर फोकस करना शुरू कर चुकी हैं। ताकि एम्प्लॉइज खुद को अपने वर्क से इमोशनली कनेक्टेड महसूस करें।
भारत जैसे मिडल क्लास देश में लोगों के लिए नौकरी छोड़ना आसान नहीं होता। EMI, परिवार की जिम्मेदारी, आर्थिक दबाव ये ऐसे फैक्टर हैं जो उन्हें जॉब में रहने को मजबूर करते हैं। ऐसे में ऑफिस में फिजिकली प्रजेंस और मेंटली एबसेंस यानी Silent Resignation या Quiet Quitting कल्चर रफ्तार पकड़ सकता है। यह भविष्य में वर्क प्लेस क्राइसिस जैसी मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
कहना होगा कि अगर ऐसा होता है, तो आने वाले समय में सफलता का पैरामीटर भी बदल सकता है। ये सैलरी या टारगेट से बदलकर इस बात पर तय होगा कि कर्मचारी अपने काम से भावनात्मक रूप से कितना जुड़ाव महसूस करता है?