
Shefali Alvares Inspirational Story: 'बदतमीज दिल' और 'सुबह होने न दे' जैसे गानों से युवाओं के बीच पहचान बनाने वालीं सिंगर शेफाली अल्वारेस की जिंदगी का एक ऐसा दौर भी आया, जब उन्हें लगा कि कहीं वह अपनी ही पहचान न खो दें। दूसरी बार मां बनने के बाद शारीरिक परेशानियों, बढ़ते वजन और डिप्रेशन से जूझते हुए उन्होंने फिर से संगीत की दुनिया में लौटने का फैसला किया। आज उनका संदेश साफ है, जिम्मेदारियां निभाइए, अपनों के साथ रहिए, लेकिन अपने सपनों को मरने मत दीजिए।
कभी-कभी जिंदगी में सबसे बड़ी लड़ाई दुनिया से नहीं, खुद से ही होती है। एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं, तो दूसरी तरफ मन के किसी कोने में पलता वह सपना, जो हमें हमारी खास पहचान देता है। खासकर महिलाओं के लिए यह बैलेंस आसान नहीं होता। मां बनने के बाद उनकी दुनिया बदल जाती है।
बच्चों की जरूरतें, घर-परिवार और बदलती फिजिकल कंडिशन के बीच कई बार उनकी अपनी इच्छाएं पीछे छूटने लगती हैं। लेकिन क्या मां बनने का मतलब अपने सपनों को पीछे छोड़ देना है? सिंगर शेफाली अल्वारेस के साथ patrika ने की बात, आप भी जानिए उनके संघर्ष और उनसे उबरकर फिर से मंच पर लौटने की कहानी
शेफाली अल्वारेस एक ऐसे परिवार से आती हैं, जहां संगीत सिर्फ पेशा नहीं, जिंदगी का हिस्सा रहा है। उनके पिता जो अल्वारेस जाने-माने जैज संगीतकार और गायक रहे हैं। शेफाली ने संगीत के माहौल में ही आंखें खोलीं।
करीब 11 साल की उम्र से गाना शुरू करने वाली शेफाली बताती हैं कि उनके पिता ने बचपन से उन्हें यही सिखाया कि गाते रहना है, कुछ भी गाओ, लेकिन गाती रहो। और वो चलते-चलते, उठते-बैठते गाते रहना सीख गईं। कई बार तो उन्हें पता ही नहीं होता था कि वह गा रही हैं। वेस्टर्न सॉन्ग्स पसंद करने वाली शेफाली की जब कोई तारीफ करता अच्छा गाती हो तब पता चलता वे गा रही थीं।
शेफाली कहती हैं कि स्कूल के दिनों में उनका बैंड था। इसी दौरान संगीतकार प्रीतम ने उन्हें सुना और उनकी आवाज पसंद आई। उन्होंने शेफाली को बॉलीवुड में गाने का मौका दिया। शेफाली के मुताबिक, उस समय उन्होंने कभी गंभीरता से नहीं सोचा था कि वह बॉलीवुड में प्लेबैक सिंगर बनेंगी। लेकिन मौका मिला तो सफर आगे बढ़ता चला गया।
'सुबह होने न दे' और 'बदतमीज दिल' जैसे गानों ने उन्हें खास पहचान दिलाई। इसके अलावा 'पार्टी ऑन माई माइंड', 'ढैटिंग नाच', 'तेरा नाम जपदी फिरां', 'ओ गुजरिया' और 'बीच बीच में' जैसे गानों में भी उनकी आवाज सुनाई दी। उनके संगीत सफर में प्रीतम ने अहम भूमिका निभाई।
आमतौर पर लोग बॉलीवुड में करियर बनाने के लिए मुंबई आते हैं, लेकिन शेफाली की जिंदगी ने उलटी दिशा ली। मुंबई में पली-बढ़ीं शेफाली ने शादी के बाद भोपाल को अपना घर बनाया। साल 2014 में उनकी शादी के बाद वह भोपाल शिफ्ट हो गईं। वह बताती हैं कि भोपाल आने के उनके फैसले की चर्चा उस समय भी हुई थी।
शेफाली कहती हैं कि उनके लिए भोपाल शिफ्ट होना उतना मुश्किल नहीं था, जितना लोगों को लगता है। कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए कि वह अपने करियर को लेकर नहीं सोच पा रहीं, उनसे पूछा कि वे ऐसा फैसला क्यों ले रही हैं। लेकिन उनके लिए प्यार और परिवार भी जिंदगी का अहम हिस्सा थे, जिनके लिए वे मुंबई छोड़ आईं। धीरे-धीरे भोपाल से भी उन्हें लगाव हो गया।
उनके मुताबिक, भोपाल खूबसूरत और शांत शहर है। यहां रहते हुए भी रिकॉर्डिंग, बैंड के कार्यक्रमों और दूसरे शहरों में परफॉर्म करने में उन्हें परेशानी नहीं होती। शैफाली की लाइफ की यह कहानी बताती है कि सफलता के लिए हमेशा अपनों से दूर रहना जरूरी नहीं। सही संतुलन बनाकर अपने सपनों को भी जिया जा सकता है।
शेफाली की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा वह पल है, जब वह मां बनने के बाद अपने संघर्ष के बारे में बताती हैं। वे कहती हैं कि उनके दूसरे बेटे रेहान के जन्म के बाद उन्हें कई फिजिकल इश्यूज का सामना करना पड़ा। उस पर लगातार वजन बढ़ने से वे परेशान हो रही थीं। वह खुद को पहले जैसा महसूस नहीं कर पा रही थीं।
वह बताती हैं कि मां बनना रूह तक खुश कर देने वाला एक्सपीरियंस है, लेकिन उनके लिए अपनी पहचान भी उतनी ही जरूरी थी। उनके मन में बस यही था कि वह गाना चाहती हैं, संगीत की दुनिया में फिर से एक्टिव होना चाहती हैं। एक मां के रूप में वो खुश हैं, लेकिन उनकी पहचान खोना भी उन्हें भीतर से तोड़ रहा था। फिजिकली अनफिट महसूस करने और अपनी पहचान को लेकर खुद से लड़ने के बीच ही वह डिप्रेशन में भी चली गईं।
यह वह दौर था, जब उनके सामने सिर्फ करियर का सवाल नहीं था। सवाल था कि जिस काम से उनकी पहचान बनी, क्या वह उससे दोबारा जुड़ पाएंगी? क्या परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए वह अपने उस हिस्से को बचा पाएंगी, जो उन्हें शेफाली अल्वारेस बनाता है?
खुद को हारा महसूस करती शेफाली ने खुद से जिद की कि वापसी तो करनी है। परिवार के सहयोग, अपने हौसले और संगीत के प्रति लगाव ने उन्हें फिर आगे बढ़ने की ताकत दी। वह बताती हैं कि लंबे ब्रेक करीब 5 साल के बाद वह दोबारा गा रही हैं और जिंदगी की आखिरी सांस तक गाते रहना चाहती हैं।
शेफाली की कहानी सिर्फ एक सिंगर की वापसी नहीं है। यह उन तमाम महिलाओं की भावनाओं से जुड़ती है, जो मां बनने के बाद अपने लिए समय निकालने को लेकर अपराधबोध महसूस करती हैं। घर और बच्चों की देखभाल जरूरी है, लेकिन अपनी खुशी, रुचि और पहचान को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
उनका कहना है कि हमें जिम्मेदारियां कई बार संघर्ष जैसी लगने लगती हैं। ऐसे में उनसे भागने के बजाय उनके बीच अपने सपनों के लिए जगह बनानी चाहिए। सफलता का मतलब यह नहीं कि इंसान सबकुछ छोड़कर आगे बढ़े। असली खुशी तब है, जब वह अपनों को साथ लेकर आगे बढ़े और अपनी मंजिल तक पहुंचे।
आज के युवाओं के लिए शेफाली का संदेश बेहद मायने रखता है। वह मानती हैं कि हर व्यक्ति का संघर्ष अलग होता है। किसी को मौके नहीं मिलते, किसी को आर्थिक परेशानियां रोकती हैं, तो किसी को परिवार और करियर के बीच रास्ता तलाशना पड़ता है। लेकिन इन मुश्किलों के कारण अपनी पहचान बनाने का सपना छोड़ देना सही नहीं है।
वह यूथ से कहती हैं कि अपनी काबिलियत और लगन को सहारा बनाइए। भीड़ बहुत है, मुकाबला भी बहुत है, लेकिन आपकी जगह आपकी काबिलियत ही तय करेगी। अगर आपने मकसद तय किया है कि मंजिल तक जाना ही है, तो जिद का एक पौधा हाथ में लेकर सफर तय कीजिए, उसे हर दिन मेहनत से सींचिए, ताकि एक दिन वह बड़ा पेड़ बन सके।
शेफाली अल्वारेस की जिंदगी हमें यही सिखाती है कि ठहराव हमेशा अंत नहीं होता। कभी-कभी जिंदगी हमें कुछ समय के लिए रोकती है, ताकि हम खुद को फिर से पहचान सकें। मां बनना, परिवार संभालना या मुश्किल दौर से गुजरना किसी महिला की प्रतिभा का अंत नहीं है। जरूरत है अपने सपनों को जिंदा रखने की और उन्हें पूरा करने के लिए लगातार कोशिश करते रहने की। क्योंकि पहचान एक दिन में नहीं बनती, लेकिन उसे बचाए रखने का फैसला हर दिन करना पड़ता है।