
Woman Guest Editor: लोककला समाज की स्मृतियों, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने का जरिया है। आधुनिक मनोरंजन और डिजिटल संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोककलाओं से लोगों का जुड़ाव कम होता जा रहा है। ऐसे समय में लोकगायिका हिमानी वासनिक भरथरी गायन के जरिए लोकसंस्कृति की इस विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। सिरपुर महोत्सव, स्वदेशी मेला और राजिम कुंभ जैसे आयोजनों के साथ ग्रामीण अंचलों में 50 से अधिक प्रस्तुतियां दे चुकीं हिमानी का मानना है कि लोककला को जीवित रखने के लिए उसे मंचों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों के बीच ले जाना जरूरी है। यही वजह है कि वह गांव-गांव जाकर भरथरी गायन की प्रस्तुतियां देती हैं। बस्तर के लोगों के बीच इस लोकगाथा को विशेष पसंद किए जाने का अनुभव भी उन्हें इस दिशा में आगे बढऩे की प्रेरणा देता है।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों की साधना: हिमानी कहती हैं कि भरथरी गायन की विशेषता उसकी कथा, भावपूर्ण गायकी और वैराग्य के संदेश में है। इसकी प्रस्तुति में केवल संगीत नहीं, बल्कि जीवन के मोह-माया, त्याग और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़े भाव भी सामने आते हैं। हिमानी आज भी डिजिटल साउंड सिस्टम के बजाय हारमोनियम, बेंजो और मंजीरे जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुति देती हैं।
कहीं उत्साह, कहीं कम होता रुझान: ग्रामीण अंचलों में प्रस्तुतियों के दौरान हिमानी को अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती हैं। कुछ स्थानों पर लोग भरथरी गायन को उत्साह से सुनते हैं, तो कहीं इसके प्रति अपेक्षाकृत कम रुचि दिखाई देती है। उनका मानना है कि भरथरी की कथा में वैराग्य और आध्यात्मिक भाव अधिक होने के कारण हर वर्ग के श्रोता इससे समान रूप से नहीं जुड़ पाते।
महिलाओं के सम्मान का संदेश: हिमानी महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ आगे बढऩे का संदेश देती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को अपनी क्षमता साबित करने के लिए पुरुषों से तुलना करने की जरूरत नहीं है। पुरुषों और महिलाओं का अपना-अपना स्थान है, लेकिन महिलाओं को अपने सम्मान और आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं।
Updated on:
24 Oct 2026, 8:34 PM IST
Published on:
24 Oct 2026, 8:34 PM IST
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