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Udaipur Solar Observatory : उदयपुर के फतहसागर झील के बीच बसी वेधशाला, जहां 24 घंटे पढ़ी जाती है सूर्य की ‘धड़कन’

Udaipur Solar Observatory : उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी में 50 सेमी के मास्ट टेलिस्कोप से सौर ज्वालाओं और चुंबकीय तूफानों पर 24 घंटे पैनी नजर रखी जाती है। राजीव जैन अपनी विशेष रिपोर्ट में बता रहे हैं कि क्यों दुनिया के लिए नायाब है झीलों की नगरी की यह वेधशाला।
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Aug 20, 2026
Udaipur Solar Observatory
झील के बीच सोलर ऑब्जर्वेटरी (Photo: Rajasthan Patrika)

Udaipur Solar Observatory : झीलों का शांत पानी न सिर्फ पर्यटकों को सुकून देता है, बल्कि वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड के सबसे बड़े ऊर्जा स्रोत सूर्य की तह तक झांकने के लिए आदर्श वातावरण भी देता है। उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी देश की उस वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक है, जो प्रकृति और तकनीक के अद्भुत तालमेल से भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाने में जुटी है।

उदयपुर सिर्फ महलों, संस्कृति और पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान और खगोल भौतिकी के क्षेत्र में भी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। फतहसागर झील के बीचों-बीच छोटे टापू पर उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी (यूएसओ) स्थापित है। ​यह वेधशाला भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग की स्वायत्त संस्था फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के तत्वावधान में संचालित है। सूर्य की सतह की गतिविधियों, सौर तूफानों, सौर ज्वालाओं और चुंबकीय क्षेत्रों के अध्ययन में यह वेधशाला पूरी दुनिया के सौर वैज्ञानिकों के लिए एक प्रमुख धुरी बनी है।

डॉ. अरविंद भटनागर का दूरदर्शी विजन

​उदयपुर सौर वेधशाला (USO) की स्थापना वर्ष 1976 में प्रख्यात सौर भौतिक विज्ञानी डॉ. अरविंद भटनागर (Dr. Arvind Bhatnagar) ने की। इसकी परिकल्पना कैलिफोर्निया की सुप्रसिद्ध बिगबियर लेक सोलर ऑब्जर्वेटरी के मॉडल पर की। डॉ. भटनागर का मानना था कि देश में सौर अध्ययन के लिए ऐसा केंद्र होना चाहिए, जहां से सूर्य की सबसे स्पष्ट और स्थिर फोटोग्राफ्स प्राप्त की जा सकें। 1981 में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के अंतर्गत शामिल कर लिया, जिसके बाद तकनीकी और वैज्ञानिक विस्तार हुआ। यह इस साल सितंबर में अपने 50 साल पूरे करेगी।

​झील के बीच टापू पर ही वेधशाला क्यों?

लोगों के मन में उत्सुकता होती है कि इस वेधशाला को जमीन पर बनाने के बजाय फतह सागर झील के बीचों-बीच क्यों स्थापित किया। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है।

थर्मल टर्बुलेंस से बचाव: जब सूर्य की तेज किरणें सामान्य सूखी जमीन पर पड़ती हैं, तो जमीन बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। जमीन की इस गर्माहट के कारण ऊपर की हवा भी गर्म होकर तेजी से ऊपर उठने लगती है, जिससे वायुमंडल में कंपन या हलचल पैदा होती है। यह हलचल दूरबीन से ली जाने वाली सूक्ष्म छवियों को धुंधला या विकृत कर देती है, जिसे खगोल विज्ञान में 'पुअर सीइंग' कहा जाता है।

पानी का स्थिर तापमान : पानी की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होती है, जिससे झील का जलस्तर और आसपास का तापमान दिन के समय भी अपेक्षाकृत स्थिर और ठंडा रहता है। ​

हाई-रेजोल्यूशन और क्रिस्टल-क्लियर तस्वीरें : झील के चारों ओर अथाह जलराशि होने के कारण टेलिस्कोप के आसपास हवा का कंपन न्यूनतम हो जाता है। इससे वेधशाला के अत्याधुनिक कैमरों और सेंसरों को सूर्य की सतह की अत्यंत स्पष्ट, उच्च रेजोल्यूशन तस्वीरें हासिल होती हैं।

​उदयपुर का साफ आसमान : उदयपुर में साल के 300 से ज्यादा दिन धूप खिली रहती है और आसमान बिल्कुल साफ रहता है, जो निरंतर सौर प्रेक्षण के लिए बेहद अनुकूल है।

​कैसे काम करती है वेधशाला: अत्याधुनिक तकनीक और टेलिस्कोप नेटवर्क ​उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी सूर्य के विस्तृत अध्ययन के लिए अत्याधुनिक तकनीकों और उपकरणों का उपयोग करती है:

​1. मास्ट ( मल्टी एप्लीकेशन सोलर टेलीस्कोप)

​यह वेधशाला का सबसे शक्तिशाली 50 सेमी अपर्चर वाला 'ऑफ-एक्सिस ग्रेगोरियन-कूडे टेलिस्कोप है, जिसे 16 जून 2015 को औपचारिक रूप से चालू किया गया।

विशेष फैब्रिक डोम: इसका डोम बेल्जियम की कंपनी' की ओर विशेष तन्य फैब्रिक (Tensile Fabric) से बनाया है, जो खुलने-बंद होने की क्षमता रखता है। यह डोम टेलिस्कोप के आसपास स्थानीय ताप को जमने नहीं देता।

स्वदेशी बैक-एंड उपकरण: इसमें यूएसओ की इन-हाउस विकसित अडैप्टिव ऑप्टिक्स सिस्टम और नैरो बैंड इमेजिंग पोलरीमीटर लगे हैं। इसके अलावा इसरो सैटेलाइट सेंटर द्वारा विकसित स्पेक्ट्रो-पोलरीमीटर भी चुंबकीय क्षेत्रों के त्रि-आयामी मापन में मदद करता है।

​विभिन्न स्पेक्ट्रल बैंड्स में अध्ययन: मास्ट की मदद से सूर्य के फोटोस्फीयर और क्रोमोस्फीयर का एच-अल्फा (656.3 एनएम) और जी-बैंड (430.5 एनएम) तरंगदैर्ध्य पर सटीक विश्लेषण किया जाता है।

​2. उदयपुर वेधशाला गोंग प्रोजेक्ट का हिस्सा

​यूएसओ दुनिया भर में फैले 6 प्रमुख सौर केंद्रों के वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे गोंग कहा जाता है। चूंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, इसलिए एक जगह रात होने पर दूसरी जगह से सूर्य पर नजर रखी जाती है। इस नेटवर्क के जरिए वैज्ञानिक चौबीसों घंटे सूर्य की गतिविधियों पर निरंतर नजर रखते हैं।

इस वेधशाला का बड़ा फायदा

इस वेधशाला का शोध सिर्फ अकादमिक अध्ययन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक मानव जीवन, सैटेलाइट सुरक्षा और संचार तंत्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

​सौर तूफानों और सोलर फ्लेयर्स की पूर्व चेतावनी

सूर्य की सतह पर जब विशाल विस्फोट और कोरोनल मास इजेक्शन होते हैं, तो अरबों टन आवेशित प्लाज्मा और चुंबकीय ऊर्जा अंतरिक्ष में फैलती है। यदि यह तूफान पृथ्वी की ओर आता है तो इससे ​अंतरिक्ष में मौजूद संचार उपग्रह और जीपीएस सिस्टम ठप हो सकते हैं। ​पृथ्वी के पावर ग्रिड फेल हो सकते हैं। ​विमानों के नेविगेशन और रेडियो संचार में रुकावट आ सकती है। यूएसओ इन चुंबकीय तूफानों और सौर चक्र की समय रहते निगरानी कर अग्रिम चेतावनी जारी करने में मदद करता है।

​स्पेस वेदर की सटीक समझ

जैसे पृथ्वी पर मौसम का पूर्वानुमान जरूरी है, वैसे ही उपग्रह युग में अंतरिक्ष के मौसम की समझ जरूरी है। सौर हवाएं पृथ्वी के वायुमंडल और मौसम चक्र को कैसे प्रभावित करती हैं, इसका विश्लेषण यहां किया जाता है।

सूर्य के चुंबकीय रहस्यों और सीस्मोलॉजी का अध्ययन

मास्ट टेलिस्कोप की मदद से सूर्य पर उठने वाले सनस्पॉट्स और सौर ज्वालाओं के सीस्मिक प्रभावों का अध्ययन होता है, जिससे पता चलता है कि सूर्य के गर्भ में क्या हलचल हो रही है।

युवा पीढ़ी और विज्ञान संचार

यूएसओ नियमित शैक्षणिक आउटरीच कार्यक्रम आयोजित करता है। यहां स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी आकर सौर भौतिकी, टेलीस्कोप तकनीक और अंतरिक्ष विज्ञान के व्यावहारिक पहलुओं को समझते हैं, जो नए वैज्ञानिकों की पौध तैयार हो रही है।

Updated on:
20 Aug 2026 11:28 am
Published on:
20 Aug 2026 11:28 am