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Speech Delay: “मम्मी-पापा… मैं बोलना चाहता हूं” स्मार्टफोन के स्क्रीन की नीली रोशनी में गुम न हो जाए आपके बच्चे की आवाज

Speech Delay in Kids: क्या आप अपने बच्चों से कम संवाद करते हैं? क्या आपका बच्चा भी स्पीच डिले का शिकार हो रहा है? आइए इन संवेदनशील मुद्दे से जुड़े ऐसे ही अन्य सवालों के जवाब डॉ. डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशियन डॉ. शिखा गर्ग से जानते हैं।

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Apr 17, 2026

Speech Delay : आज के समय में हम अपने बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह स्मार्टफोन थमा रहे हैं। दादा, दादी, नाना, नानी के साथ मिलकर बोलना सीखने की बजाय वह यूट्यूब पर बच्चों की कविताएं सुनता है तो हमें लगता है कि हमारा बच्चा 'स्मार्ट' हो रहा है। अगर आपके घर में ऐसा हो रहा है तो आप खुश ना हों क्योंकि डॉक्टर्स इसे एक बड़ी चेतावनी मान रहे हैं। स्मार्टफोन की स्क्रीन देखने का खामियाजा मासूम क्या उठाने जा रहा है, आइए इसे डॉक्टर से समझने की कोशिश करते हैं।

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What is Speech Delay in Child: क्या है स्पीच डिले?

फोन की स्क्रीन देखने की वजह से बच्चों में 'स्पीच डिले' (Speech Delay) की समस्या पैदा हो रही है और देखते ही देखते अब एक साइलेंट महामारी का रूप ले चुकी है। स्पीच डिले का मतलब सिर्फ 'देर से बोलना' नहीं है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे 'कम्युनिकेशन डिसऑर्डर' (Communication Disorder) की श्रेणी में रखा गया है। डॉक्टरों के अनुसार, यदि बच्चा 2 साल की उम्र तक 50 शब्द नहीं बोल पा रहा है या दो शब्दों को जोड़कर एक छोटा वाक्य (जैसे- 'दूध दो') नहीं बना पा रहा, तो वह स्पीच डिले का शिकार हो सकता है।

स्क्रीन टाइम सबसे बड़ा 'साइलेंट किलर'

Digital Pacifier: आज के दौर में मोबाइल 'डिजिटल पैसिफायर' (बच्चों को चुप कराने वाला औजार) बन गया है।

ब्रेन वायरिंग का बिगड़ना: 0 से 3 साल के बीच बच्चे का दिमाग एक स्पंज की तरह होता है। इस उम्र में बच्चे को इंसानी चेहरे, हाव-भाव और आवाज की जरूरत होती है। जब बच्चा स्क्रीन देखता है, तो उसका दिमाग 'पैसिव मोड' में चला जाता है। उसे जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे उसके बोलने वाले न्यूरॉन्स विकसित नहीं हो पाते।

वर्चुअल ऑटिज्म: हालिया शोधों में 'वर्चुअल ऑटिज्म' (Virtual Autism in Kids) शब्द उभरा है। यह असल ऑटिज्म नहीं है, बल्कि अत्यधिक मोबाइल देखने के कारण पैदा हुए ऑटिज्म जैसे लक्षण हैं। मोबाइल हटाते ही और उनसे संवाद बढ़ाते ही कई बच्चों में सुधार देखा गया है।

मल्टीलिंगुअल कंफ्यूजन: घर में मां-बाप के अलग-अलग भाषा में संवाद करते हैं तो भी बच्चे को भाषा सीखने में दिक्कत पैदा होती है। मिसाल के तौर पर मां बंगाली भाषा में बात करती है और पिता मलयाली भाषा में। अब इन हालात में बच्चे के ब्रेन के समक्ष भ्रम की स्थिति पैदा होती है। यह हालत बच्चों के भाषाई शोर पैदा करने जैसा है।

आखिर क्यों 'खामोश' हो रहे हैं बच्चे?

वन-वे कम्युनिकेशन (One-way Communication) : मोबाइल या टीवी देखते समय बच्चा सिर्फ सुनता है, लेकिन जवाब नहीं देता। भाषा का विकास तब होता है जब बच्चा 'संवाद' (Interaction) करता है। स्क्रीन पर चल रहे विजुअल्स इतने तेज होते हैं कि बच्चे का दिमाग उसे प्रोसेस तो करता है, लेकिन उसे बोलने की जरूरत महसूस नहीं होती।

वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा (Virtual Autisms ) : ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में ऑटिज्म जैसे लक्षण दिखने लगते हैं, जिसे विशेषज्ञ 'वर्चुअल ऑटिज्म' कह रहे हैं। बच्चा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है और बुलाने पर रिस्पॉन्स नहीं देता।

न्यूक्लियर फैमिली (Nuclear Families): शहरों में वर्किंग पेरेंट्स की व्यस्तता के कारण बच्चों को बात करने के लिए घर में कोई नहीं मिलता। दादी-नानी की कहानियों की जगह अब मोबाइल ने ले ली है।

इन 5 संकेतों को न करें नजरअंदाज (Red Flags)

यदि आपके बच्चे में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं, तो आपको तुरंत डॉक्टर मिलना चाहिए

  • 12-15 महीने: अगर बच्चा 'मम्मा', 'पापा' जैसे छोटे शब्द भी नहीं बोल रहा।
  • 18 महीने: अगर बच्चा साधारण निर्देशों (जैसे- इधर आओ, ये उठाओ) को नहीं समझ पा रहा।
  • 2 साल: अगर बच्चा कम से कम 50 शब्द नहीं बोलता या दो शब्दों को जोड़कर वाक्य नहीं बना पाता।
  • इशारों पर निर्भरता: बात कहने के बजाय हाथ पकड़कर ले जाना या सिर्फ रोकर अपनी बात समझाना।
  • आई-कॉन्टैक्ट की कमी: आंखों में आंखें डालकर बात न करना।

माता-पिता के लिए 'होम-प्लान' (Home Strategy)

  • डिजिटल डिटॉक्स: 2 साल से छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम 'जीरो' होना चाहिए। बड़े बच्चों के लिए भी यह 30 मिनट से ज्यादा न हो।
  • कमेंट्री थेरेपी: आप घर में जो भी कर रहे हैं, उसे बच्चे को बोलकर बताएं। जैसे- "देखो, मम्मी खाना बना रही है", "पापा ऑफिस जा रहे हैं"।
  • कहानी और सवाल: बच्चे को कहानियां सुनाएं और उनसे छोटे-छोटे सवाल पूछें, ताकि वे जवाब देने की कोशिश करें।
  • चबाने वाला खाना: बच्चे को बहुत ज्यादा मैश किया हुआ खाना न दें। गाजर या फल चबाने से बोलने वाली मांसपेशियां (Speech Muscles) मजबूत होती हैं। आजकल माता-पिता बच्चों को 'प्यूरी' या बहुत मुलायम खाना देते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि जब बच्चा ठोस खाना चबाता है, तो उसके जबड़े और जीभ की मांसपेशियों की एक्सरसाइज होती है, जो बोलने के लिए जरूरी है।
  • पैरेलल टॉक: आप जो भी काम कर रहे हैं, उसे बच्चे को बोलकर सुनाएं। "देखो बेटा, मम्मी अब सब्जी काट रही है। ये लाल टमाटर है। और अगर बच्चा इशारा करके पानी मांगे, तो उसे तुरंत पानी न दें। उसे कोशिश करने दें कि वह कम से कम 'पा' या 'पानी' बोले।

थेरेपी और उपचार: कैसे लौटेंगे शब्द?

स्पीच डिले का इलाज दवाओं से ज्यादा 'इंटरवेंशन' (हस्तक्षेप) से होता है।

स्पीच थेरेपी: इसमें थेरेपिस्ट खेल-खेल में बच्चे को ध्वनियों की पहचान करना और जीभ का सही मूवमेंट सिखाते हैं।

मिरर थेरेपी: बच्चे को शीशे के सामने खड़ा करके उसके साथ बोलना, ताकि वह होंठों की बनावट को देख सके।

पिक्चर एक्सचेंज कम्युनिकेशन (PECS): चित्रों के जरिए शब्दों को जोड़ना।

एक्सपर्ट इंटरव्यू डॉ. शिखा गर्ग के साथ

क्या स्पीच थेरेपी का असर तुरंत होता है, या यह एक लंबी प्रक्रिया है? औसतन कितना समय लगता है और क्या इसके मुख्य कारण हैं? इस सवाल के जवाब में डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशियन डॉ. शिखा गर्ग ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि स्पीच थेरेपी कोई 'जादुई छड़ी' या एंटीबायोटिक का कोर्स नहीं है जिसका असर दो-तीन दिनों में दिखने लगे। यह एक सीखने की प्रक्रिया (Learning Process) है। थेरेपी का असर तुरंत नहीं, बल्कि क्रमिक (Gradual) होता है। आमतौर पर, शुरुआती 3 से 6 महीनों में बच्चे के व्यवहार और संवाद करने की कोशिश में बदलाव दिखने लगता है। बच्चा तुरंत स्पष्ट वाक्य नहीं बोलता, बल्कि पहले वह 'आई-कॉन्टैक्ट' (नजरें मिलाना) करना सीखता है। छोटे-छोटे निर्देश समझने लगता है और फिर आवाज़ें निकालने की कोशिश करता है।

औसतन कितना समय और मुख्य कारण यह तीन मुख्य बातों पर निर्भर करता है

इंटेंसिटी (Intensity): थेरेपी के सेशन कितने नियमित हैं।

बच्चे की उम्र: जितनी कम उम्र (Early Intervention) में शुरुआत होगी, परिणाम उतने ही तेज और बेहतर होंगे।

होम एनवायरनमेंट: थेरेपी सेंटर में बच्चा केवल 1-2 घंटे बिताता है, बाकी के 22 घंटे वह घर पर होता है। अगर घर पर भी वही प्रैक्टिस दोहराई जाए, तो रिकवरी बहुत जल्दी होती है।

अक्सर यह भी देखा गया है कि एकतरफा संवाद भी बच्चों के लिए भाषा को सीखने में बैरियर का काम करता है जिससे उनकी सोचने और समझने की क्षमता खत्म हो जाती है। इस बारे में आपकी क्या राय है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह समझना बहुत जरूरी है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक 'सामाजिक आदान-प्रदान' है। जब बच्चा मोबाइल या टीवी देखता है, तो वह 'एकतरफा संवाद' का हिस्सा होता है। यहां दो बड़ी समस्याएं पैदा होती हैं

यह समझना बहुत जरूरी है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक 'सामाजिक आदान-प्रदान' है। जब बच्चा मोबाइल या टीवी देखता है, तो वह 'एकतरफा संवाद' का हिस्सा होता है। यहां दो बड़ी समस्याएं पैदा होती हैं

'ब्रेन रिस्पॉन्स' का रुक जाना: भाषा का विकास तब होता है जब बच्चा कुछ बोलता है और सामने से उसे प्रतिक्रिया (Feedback) मिलती है। उदाहरण के लिए, जब बच्चा 'दूध' की तरफ इशारा करता है और मां कहती है, "हां बेटा, आपको दूध चाहिए?", तो बच्चे के दिमाग में एक सर्किट पूरा होता है। लेकिन मोबाइल में ऐसा नहीं होता। स्क्रीन की ओर से बच्चे को कभी भी पलटकर जवाब नहीं मिलता, जिससे बच्चे का दिमाग 'पैसिव मोड' (Passive Mode) में चला जाता है। वह सिर्फ एक 'श्रोता' बनकर रह जाता है, 'वक्ता' नहीं बन पाता।

सोचने-समझने की क्षमता (Cognitive Skills) पर चोट: संवाद ही वह प्रक्रिया है जिससे बच्चा 'कारण और प्रभाव' (Cause and Effect) सीखता है। जब संवाद बंद हो जाता है, तो बच्चे की 'क्रिटिकल थिंकिंग' यानी सोचने की क्षमता पर असर पड़ता है।

भाषा सीखने के लिए 'प्रैग्मैटिक्स' (Pragmatics) जरूरी है, जिसका अर्थ है किसे, कब और कैसे बोलना है। एकतरफा संवाद में बच्चा राइम्स (Rhymes) तो रट लेता है, लेकिन उसे यह नहीं पता होता कि उन शब्दों का इस्तेमाल असली जिंदगी में कैसे करना है। इसे हम 'फंक्शनल स्पीच' की कमी कहते हैं। बच्चा 'एप्पल' तो बोल देगा, लेकिन भूख लगने पर 'एप्पल दे दो' नहीं कह पाएगा।

क्या मोबाइल की वजह से बिगड़ा हुआ स्लीप पैटर्न भी बच्चे की सीखने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है? इस पर डॉ. शिखा कहती हैं कि एक पीडियाट्रिशियन के तौर पर मैं इसे 'स्लीप-डेप्रिवेशन साइकल' कहती हूं। नींद और सीखने का आपस में सीधा संबंध है, जिसे हम तीन बिंदुओं में समझ सकते हैं-

'मेमोरी कंसोलिडेशन' (याददाश्त का संचय): बच्चा दिन भर जो कुछ भी नया सीखता है, चाहे वह नए शब्द हों या कोई गतिविधि हमारा दिमाग उसे नींद के दौरान ही 'प्रोसेस' और 'स्टोर' करता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में 'मेमोरी कंसोलिडेशन' कहते हैं। अगर बच्चा मोबाइल की वजह से गहरी नींद (REM Sleep) नहीं ले पा रहा है, तो उसका दिमाग दिन भर की सीखी हुई बातों को स्थाई यादों में नहीं बदल पाता। सरल शब्दों में कहें तो, बच्चा जो आज सीखता है, नींद की कमी के कारण कल उसे भूल जाता है।

'ब्लू लाइट' और मेलाटोनिन का खेल : मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) बच्चे के दिमाग को यह भ्रम देती है कि अभी दिन है। इससे शरीर में 'मेलाटोनिन' (Melatonin) हार्मोन का स्राव रुक जाता है, जो नींद के लिए जिम्मेदार है। जब बच्चा प्राकृतिक नींद नहीं लेता, तो उसका 'प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स' (दिमाग का वह हिस्सा जो ध्यान केंद्रित करने और निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार है) थका हुआ रहता है। नतीजा यह होता है कि अगली सुबह बच्चा चिड़चिड़ा रहता है और नई चीजें सीखने की उसकी क्षमता कम हो जाती है।

एकाग्रता (Attention Span) की कमी : अधूरी नींद के कारण बच्चे का 'अटेंशन स्पैन' बहुत छोटा हो जाता है। क्लास में या घर पर बातचीत के दौरान वह ज्यादा देर तक ध्यान नहीं दे पाता। स्पीच डिले के मामलों में हमने देखा है कि जो बच्चे ठीक से नहीं सोते, वे थेरेपी के दौरान भी बहुत जल्दी थक जाते हैं और निर्देशों का पालन नहीं कर पाते। सीखने के लिए दिमाग का 'अलर्ट' होना जरूरी है, जो केवल अच्छी नींद से ही संभव है।

पेरेंट्स के लिए मेरी सलाह

- नींद कोई 'लक्जरी' नहीं, बल्कि दिमाग के लिए 'ईंधन' है।

-सोने से कम से कम 2 घंटे पहले घर के सभी मोबाइल और गैजेट्स बंद कर दें।

- बच्चे के सोने का एक निश्चित समय तय करें।

कैसे बच्चों का स्क्रीन टाइम जीरो करें?

यह रातों-रात नहीं होगा, इसके लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' रणनीति चाहिए। सबसे पहले, माता-पिता को 'रोल मॉडल' बनना होगा। अगर आप बच्चे के सामने फोन चलाएंगे, तो उसके मन में भी आपके जैसा करने की इच्छा जगेगी। बच्चे अपने आसपास की चीजों को ही देखकर सीखना शुरू करते हैं। घर में 'नो फोन जोन' और 'डिजिटल कर्फ्यू' (सोने से 2 घंटे पहले) लागू करें। मोबाइल की जगह बच्चे को 'विकल्प' दें जैसे मिट्टी के खिलौने, पेंटिंग या कहानियां। जब आप मोबाइल छीनते हैं, तो उसे आपका 'समय' चाहिए होता है। शुरुआत में बच्चा रोएगा, लेकिन हार न मानें। याद रखें, स्क्रीन टाइम जीरो करना उसे 'म्यूट' होने से बचाने का एकमात्र तरीका है।

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