Teejan Bai: छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव गनियारी से निकलकर पूरी दुनिया में पंडवानी की पहचान बनाने वाली महान लोकगायिका तीजन बाई का जीवन संघर्ष और प्रेरणा की अनोखी मिसाल है।
रायपुर@ लक्ष्मी विश्वकर्मा। Teejan Bai: छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव गनियारी से निकलकर पूरी दुनिया में पंडवानी की पहचान बनाने वाली महान लोकगायिका तीजन बाई का जीवन संघर्ष और प्रेरणा की अनोखी मिसाल है। बचपन में गरीबी, संघर्ष और समाज की बंदिशों के बीच उन्होंने पंडवानी को अपनाया। उस समय यह कला पुरुषों के वर्चस्व वाली मानी जाती थी, लेकिन तीजन बाई ने अपनी जिद, मेहनत और प्रतिभा से इस सोच को बदल दिया।
बिना किसी औपचारिक शिक्षा के उन्होंने महाभारत की कहानियों को अपने अनोखे अंदाज में इस तरह प्रस्तुत किया कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। आज समय ने करवट ली है। वही महान कलाकार अब बिस्तर पर हैं और बहुत कम बोल पाती हैं। अधिकतर अपनी बात इशारों में ही कहती हैं। भिलाई के पास स्थित उनके गांव गनियारी में परिवार के लोग उनकी देखभाल कर रहे हैं। डॉक्टरों की टीम नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की जांच कर रही है।
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई के संघर्ष और सफलता की कहानी अब बड़े पर्दे पर दिखाई देगी। उनके जीवन पर एक बॉलीवुड फिल्म बनाई जा रही है, जो उनकी कला, संघर्ष और उपलब्धियों को दर्शकों तक पहुंचाएगी।
फिल्म की शूटिंग के लिए कुछ साल पहले मुंबई से पूरी टीम भिलाई के पास स्थित गनियारी गांव पहुंची थी। यहां करीब 40 दिनों तक शूटिंग का शेड्यूल चला। फिल्म को वास्तविकता से जोड़ने के लिए गांव की एक स्थानीय लड़की को भी इसमें किरदार दिया गया है, जिससे कहानी और अधिक जीवंत नजर आएगी।
शूटिंग के दौरान फिल्म की टीम ने तीजन बाई से मुलाकात भी की थी। उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें एक सम्मानजनक राशि भी दी गई है।फिल्म में तीजन बाई के जीवन के महत्वपूर्ण संघर्षों और उपलब्धियों को दिखाया जाएगा। बताया जा रहा है कि फिल्म में उनके जीवन की मुख्य भूमिका बॉलीवुड की एक जानी-मानी अभिनेत्री निभा रही हैं, जो उनके संघर्ष, मेहनत और कला को बड़े पर्दे पर जीवंत करेंगी। इस फिल्म का निर्माण आलिया सिद्दीकी कर रही हैं, जो अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की पूर्व पत्नी हैं।
यह फिल्म केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष और जुनून की कहानी है जिसने एक साधारण गांव की महिला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। यह फिल्म आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि कैसे तीजन बाई ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई।
विश्वविख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई का जीवन जितना गौरवशाली रहा, उतना ही संघर्षों से भरा भी रहा। उनके पिता का नाम हुनुकलाल पारधी और माता का नाम सुखवती देवी था। छह भाई-बहनों के इस साधारण परिवार में पली-बढ़ी तीजन बाई ने बेहद कठिन परिस्थितियों में अपनी कला का सफर शुरू किया।
तीजन बाई की छोटी बहन रंभा बाई बताती हैं कि उनका बचपन बेहद अभावों में गुजरा। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार ठीक से खाने और रहने तक की व्यवस्था भी मुश्किल हो जाती थी। इसके बावजूद तीजन बाई के भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव था। गनियारी गांव की मिट्टी में पली-बढ़ी तीजन बाई बचपन से ही गुनगुनाती रहती थीं और यही शौक धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया।
पढ़ाई-लिखाई का अवसर नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को कभी कमजोर नहीं होने दिया। पंडवानी गायन के माध्यम से उन्होंने महाभारत की कथा को इतने जीवंत अंदाज में प्रस्तुत किया कि देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग उनकी कला के दीवाने हो गए। उनकी दमदार आवाज़ और अभिनय शैली ने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।
रंभा बाई के अनुसार आज भी परिवार में कोई ऐसा नहीं है जो पंडवानी की उस परंपरा को उसी स्तर पर आगे बढ़ा सके, जिस ऊंचाई तक तीजन बाई ने इसे पहुंचाया। उनका मानना है कि तीजन बाई जैसी संघर्षशील, समर्पित और प्रतिभाशाली कलाकार इस परिवार में शायद पहली और आखिरी पीढ़ी हैं।
रंभा बाई की बातों में एक ओर गर्व झलकता है कि उनकी बहन ने छत्तीसगढ़ की लोककला को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई, वहीं दूसरी ओर एक पीड़ा भी है कि उस विरासत को उसी रूप में आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है। तीजन बाई की कहानी यह साबित करती है कि संघर्ष भरे हालात में भी यदि जुनून और मेहनत हो तो एक साधारण परिवार की बेटी भी पूरी दुनिया में अपनी कला का परचम लहरा सकती है।
छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को विश्व मंच तक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान तीजन बाई का माना जाता है। पंडवानी केवल एक लोकगायन शैली नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और आत्मा है। तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज़, प्रभावशाली अभिनय और अद्भुत प्रस्तुति शैली से इस लोककला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उन्होंने महाभारत की कहानियों को पंडवानी के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शक खुद को उस कथा का हिस्सा महसूस करने लगते थे। उनके गायन और अभिनय में इतनी जीवंतता होती थी कि महाभारत के पात्र जैसे मंच पर सजीव हो उठते थे। यही कारण है कि उनकी कला ने देश ही नहीं, विदेशों में भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
पद्म श्री – 1988: लोककला के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार ने 1988 में तीजन बाई को पद्म श्री से सम्मानित किया। यह भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार – 1995: संगीत, नृत्य और नाटक के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पद्म भूषण – 2003: पंडवानी को देश-विदेश में लोकप्रिय बनाने के लिए भारत सरकार ने 2003 में तीजन बाई को पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
डी.लिट. (मानद उपाधि) – 2003: बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास विश्वविद्यालय ने उनके सांस्कृतिक योगदान को देखते हुए उन्हें मानद डी.लिट. (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की उपाधि प्रदान की।
एम.एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार – 2016
फुकुओका पुरस्कार – 2018
पद्म विभूषण – 2019: भारत सरकार ने 2019 में तीजन बाई को पद्म विभूषण से सम्मानित किया, जो भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
हाल ही में राज्योत्सव के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फोन कर तीजन बाई का हालचाल जाना था। यह इस बात का प्रमाण है कि उनकी कला और योगदान को पूरे देश में कितना सम्मान मिलता है। छत्तीसगढ़ सरकार भी उनके इलाज और देखभाल के लिए हर संभव सुविधा उपलब्ध करा रही है। सरकारी अस्पताल से डॉक्टरों की टीम रोजाना उनके स्वास्थ्य की जांच के लिए पहुंचती है और उनके खान-पान का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है।
आज भले ही तीजन बाई बोलने में असमर्थ हों, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी कला और उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। एक ऐसी महिला जिसने बिना पढ़े-लिखे अपनी कला से दुनिया को महाभारत सुना दी और छत्तीसगढ़ की पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई- यही है तीजन बाई की असली विरासत। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर जुनून सच्चा हो तो पूरी दुनिया को अपनी आवाज़ सुनाई जा सकती है।