Naxalite Commander Story: सुकमा के पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सली कमांडर की जिंदगी बदल रही है। बंदूक छोड़ अब वह हुनर सीखकर नया भविष्य बना रहा है और परिवार बसाने का सपना देख रहा है।
Naxalite Commander Story: सुकमा के एक पुनर्वास केंद्र में चल रही यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के बदलाव की नहीं, बल्कि पूरे बस्तर के बदलते दौर की गवाही है। यहां ईंट-गारे के बीच एक शख्स अपने जीवन को फिर से जोड़ना सीख रहा है। यह केवल दीवार खड़ी करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस टूटी हुई जिंदगी को संवारने की कोशिश है, जिसे कभी बंदूक और विचारधारा की आग ने झुलसा दिया था।
यह कहानी है मड़कम सेमरू की—एक समय का नक्सली कमांडर, जिसके हाथों में कभी एके-47 हुआ करती थी। जंगलों में संघर्ष, हमले और छिपकर जीने की जिंदगी ही उसकी पहचान थी। लेकिन आज वही हाथ खाली हैं, और उन खाली हथेलियों में अब एक नया सपना पल रहा है— अपने आने वाले बच्चे की किलकारियों का। सेमरू की जिंदगी उस दौर से गुजरी है, जहां “जल, जंगल और जमीन” के नाम पर उन्हें एक ऐसे रास्ते पर धकेल दिया गया, जिसने उनसे उनका बचपन, जवानी और निजी जीवन सब कुछ छीन लिया।
2007 में जब उन्होंने संगठन जॉइन किया, तब उन्हें लगा था कि वे अपने समाज और अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। इसी दौरान उनकी मुलाकात सुक्की से हुई और दोनों ने विवाह कर लिया। लेकिन नक्सली संगठन की कठोर विचारधारा ने उनके वैवाहिक जीवन पर भी नियंत्रण कर लिया। (Naxalite Commander Story) संगठन ने पारिवारिक रिश्तों को कमजोरी मानते हुए उनकी जबरन नसबंदी करवा दी, ताकि वे पूरी तरह संगठन के प्रति समर्पित रहें। यह एक ऐसा निर्णय था, जिसने उनसे पिता बनने का अधिकार छीन लिया—एक सपना जो हर इंसान के जीवन में गहरे भावनात्मक महत्व रखता है।
आज भी जब सेमरू इस घटना को याद करते हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। वे कहते हैं—“मेरी पत्नी अभी जेल में है। जब वह लौटेगी, तो हम डॉक्टर से मिलेंगे। मैं अब एक सामान्य जीवन जीना चाहता हूं, अपना परिवार बसाना चाहता हूं।” साल 2025 में सेमरू ने आत्मसमर्पण किया। वे बताते हैं कि जंगलों में बदलते हालात, सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और संसाधनों की कमी ने संगठन के भीतर भी निराशा पैदा कर दी थी। धीरे-धीरे उन्हें यह एहसास हुआ कि हिंसा का यह रास्ता किसी मंजिल तक नहीं पहुंचाता।
आत्मसमर्पण के बाद अब सेमरू पुनर्वास केंद्र में रहकर राजमिस्त्री का काम सीख रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत है। वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं—“अब मैं अपने हाथों से निर्माण करना चाहता हूं, विनाश नहीं।”
पुनर्वास केंद्र की प्रभारी अधिकारी के अनुसार, यहां 15 से 20 ऐसे दंपति हैं, जिनकी जिंदगी नक्सली संगठन की कठोर नीतियों का शिकार बनी। (Naxalite Commander Story) कई लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गई थी, जिससे उनका पारिवारिक जीवन प्रभावित हुआ। अब प्रशासन इनकी जिंदगी में फिर से खुशियां लौटाने के लिए विशेषज्ञों की मदद ले रहा है, ताकि वे भी सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।
यह पहल केवल शारीरिक पुनर्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। यहां रहने वाले लोग धीरे-धीरे समाज के साथ जुड़ना सीख रहे हैं, नई पहचान बना रहे हैं और अपने अतीत को पीछे छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
मड़कम सेमरू की कहानी इस बात का प्रतीक है कि अगर सही अवसर और मार्गदर्शन मिले, तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बदलाव संभव है। यह कहानी बस्तर के उस नए चेहरे को सामने लाती है, जहां अब बंदूक की आवाज नहीं, बल्कि विकास और पुनर्वास की गूंज सुनाई दे रही है, जो हाथ कभी हिंसा के प्रतीक थे, वे आज निर्माण की नींव रख रहे हैं। जो जिंदगी कभी अंधेरे में खो गई थी, वह अब उजाले की ओर बढ़ रही है।