
World Tiger Day : बाघों की संख्या बढ़ाकर भारत ने दुनिया के सामने संरक्षण का मॉडल पेश किया, लेकिन अब उसी सफलता के भीतर एक नया खतरा सिर उठाने लगा है। अप्रेल- मई 2026 के दौरान कान्हा नेशनल पार्क में एक महीने के भीतर आठ बाघों की मौत हुई। इनमें चार शावक और पर्यटकों के बीच लोकप्रिय बाघ 'महावीर' भी शामिल था। जांच में सभी के कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से संक्रमित होने की पुष्टि हुई। शुरुआती चर्चाओं में वायरस के स्रोत के रूप में कुत्तों का जिक्र हुआ, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ इसे इससे कहीं बड़ी समस्या का संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि कई टाइगर रिजर्व वर्षों से आनुवंशिक अलगाव का सामना कर रहे हैं, जहां सीमित रक्तरेखा में लगातार अंत:प्रजनन से जीन पूल सिकुड़ रहा है। यदि समय रहते नई आनुवंशिक विविधता नहीं जुड़ी, तो भविष्य में संक्रमण, जन्मजात विकृतियों और प्रजनन क्षमता में गिरावट जैसी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
लंबे समय से बाघ संरक्षण से जुड़े एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि मध्यप्रदेश के अधिकांश टाइगर रिजर्व और अभयारण्य व्यवहारिक रूप से 'जेनेटिक द्वीप' बनते जा रहे हैं। वर्षों से बाघों की प्राकृतिक आवाजाही सीमित होने के कारण कई इलाकों में एक ही रक्तरेखा के बीच प्रजनन की पुनरावृत्ति हो रही है। इससे आनुवंशिक विविधता घटने का जोखिम बढ़ता है। उनके अनुसार, असली चुनौती अब बाघों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी आनुवंशिक गुणवत्ता और दीर्घकालिक अस्तित्व है। शिकारियों से बचाने के बाद अब बाघों को आनुवंशिक अकेलेपन से बचाना होगा।
अगर किसी समुदाय में पीढिय़ों तक सीमित रक्त संबंधों के भीतर ही विवाह होते रहें तो कुछ आनुवंशिक बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। मानव समाज में सिकल सेल जैसी आनुवंशिक बीमारियों के उदाहरण इस सिद्धांत को समझाते हैं। इसी तरह यदि किसी टाइगर रिजर्व में लंबे समय तक नए नर या मादा बाघ नहीं पहुंचते और लगातार एक ही वंश में प्रजनन होता रहता है, तो आनुवंशिक विविधता घटने लगती है। यही स्थिति इनब्रीडिंग (अंत:प्रजनन) कहलाती है, जिससे कमजोर जीन अगली पीढिय़ों में अधिक तेजी से स्थानांतरित हो सकते हैं।
बाघों की मौत का पोस्टमार्टम होता है, जांच बैठती है और रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन गर्भपात, भ्रूण मृत्यु या असफल प्रजनन जैसी घटनाओं की व्यवस्थित निगरानी लगभग नहीं के बराबर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण हो तो प्रजनन संबंधी कई महत्वपूर्ण संकेत सामने आ सकते हैं, जो फिलहाल रिकॉर्ड का हिस्सा ही नहीं बन पाते।
मुंबई के अधिवक्ता सुब्रत बनर्जी द्वारा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर बाघों की मौत पर चिंता से अवगत कराया है। इस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से बाघों की बीमारियों, वायरस अटैक और उपचार के बारे में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं।
कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा, पन्ना, संजय-दुबरी और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व भौगोलिक रूप से बड़े जरूर हैं, लेकिन प्राकृतिक आवाजाही सीमित होने से कई स्थानों पर वे आनुवंशिक दृष्टि से अलग-थलग आबादी में बदलते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अलग-अलग रिजर्व के बीच नर और मादा बाघों का प्राकृतिक आदान-प्रदान बढ़े तो जीन पूल मजबूत होगा और बीमारी का जोखिम भी कम होगा। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक वन कॉरिडोर बनाना कई जगह भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के कारण कठिन है। इसके बजाय नदियों और बड़े नालों के किनारे हरित पट्टियां विकसित कर प्राकृतिक ग्रीन पैसेज तैयार किए जाएं तो बाघों की आवाजाही आसान हो सकती है।
संभावित प्राकृतिक संपर्क
कान्हा - पेंच
पेंच - सतपुड़ा
बांधवगढ़ - संजय
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक मल, बाल और अन्य जैविक नमूनों के आधार पर डीएनए प्रोफाइलिंग और आनुवंशिक विश्लेषण करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन अध्ययनों से महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं, लेकिन संरक्षण की नीतियों में उनका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रहा। अब समय केवल 'टाइगर काउंट' बढ़ाने का नहीं, बल्कि 'जीन काउंट', 'जीन फ्लो' और 'कॉरिडोर कनेक्टिविटी' को भी संरक्षण रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाने का है।