UAE Exit OPEC: पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन यानी ओपेक से यूएई ने बाहर निकलने का फैसला ले लिया है। वह एक मई से इस संगठन का सदस्य नहीं रहेगा। इसका मतलब अब वह तेल उत्पादन, वितरण और उसकी कीमतें निर्धारित करने के फैसले खुद ही ले सकेगा। आइए जानते हैं कि इस फैसले का भारत और पाकिस्तान पर क्या असर पड़ने वाला है।
UAE Exit OPEC News: मध्यपूर्व में जारी संकट (Middle East Crisis) के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने वैश्विक तेल उत्पादन और तेल निर्यातक देशों के शक्तिशाली संगठन (ओपेक) से बाहर निकलने का फैसला लिया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 1 मई 2026 से ओपेक और ओपेक प्लस से हटने की घोषणा की है। वह ओपेक में लगभग 60 वर्षों तक बना रहा। यूएई का ओपक से निकलने का उसका यह फैसला सिर्फ व्यावसायिक नहीं बल्कि राजनीतिक कदम के बतौर देखा जा रहा है। आइए ओपेक से यूएई के बाहर निकलने के फैसले की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं।
ओपेक की स्थापना 1960 में पांच देशों कुवैत, ईरान, वेनेजुएला, सऊदी अरब और इराक ने मिलकर की थी। ओपेक में धीरे-धीरे 26 देश जुड़ गए और समय के साथ धीरे-धीरे कई देश, संगठन का हाथ छोड़ते चले गए। हालांकि, ओपक में यूएई 1967 में शामिल हुआ। यूएई के ओपेक से हटने के बाद सदस्य देशों की संख्या 11 रह जाएगी। ओपेक से यूएई के बाहर निकलने के फैसले से तेल के बाजार में भूचाल जैसा आ गया है। इस फैसले के बाद यूएई अब तेल की कीमत तय करने और उत्पादन करने के मामले में पूरी तरह स्वतंत्र हो जाएगा।
ओपेक संगठन में अब 11 देश रह गए
यूएई अपना तेल उत्पादन क्षमता को बढ़ाना चाहता था, लेकिन संगठन में शामिल होने की वजह से कोटा सिस्टम के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रहा था। सऊदी अरब का संगठन पर दबदबा होने के चलते यूएई अपना उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहा था। यूएई की सरकारी कंपनी ADNOC के अनुसार, तेल उत्पादन 3.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो सकता है। यूएई तेल का उत्पादन बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर निवेश कर रहा है। फिलहाल, यूएई प्रतिदिन 29 लाख बैरल तेल उत्पादन करता है, जबकि ओपेक के सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी लगभग 90 लाख बैरल तेल उत्पादन करता है। ओपेक का तेल उत्पादन में हिस्सा 48% से घटकर 44% रह गया है। यूएई के बाहर निकल जाने के बाद उत्पादन में कमी आने की वजह ओपेक का प्रभाव घटेगा।
ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल का झगड़ा जारी रहने के चलते ओपेक संगठन में शामिल देशों के तेल उत्पादन में फरवरी के मुकाबले मार्च महीने में कमी आई है। ओपेक सर्वे के अनुसार, फरवरी 2026 में ओपेक देशों का सामूहिक तेल का उत्पादन 28–29 मिलियन बैरल प्रतिदिन होता था, जो मार्च 2026 में घटकर 20.79-21.57 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई। इसका मतलब तेल के उत्पादन में हर रोज 7-8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी दर्ज की गई।
अब बाहर निकलने से यूएई को होगा ये फायदे
अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमले किए जाने के बाद उसने जवाबी कार्रवाई में यूएई को सबसे ज्यादा निशाने पर लिया। ईरान ने यूएई पर 2200 से अधिक ड्रोन और मिसाइल हमले किए। और जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान मध्यस्तता कर रहा था तब उसने खाड़ी देशों पर हमले के लिए ईरान को एक बार भी जिम्मेदार नहीं ठहराया। इसके चलते यूएई, पाकिस्तान से नाराज़ चल रहा है। यूएई के पाकिस्तान से नाराज होने की एक और वजह पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ गहराते रिश्ते हैं। यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर वापस ले लिए। यह राशि पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 20% था।
यूएई के इस फैसले से सऊदी अरब की प्रतिष्ठा को भी चोट पहुंचेगी, क्योंकि इससे तेल कीमतों को नियंत्रित करने की उसकी क्षमता कमजोर हो जाएगी। वहीं दूसरी ओर यूएई, अमेरिका के करीब आ सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ समय पूर्व ओपेक पर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया था। उन्होंने जनवरी में ओपेक देशों को तेल की कीमत कम करने को कहा था।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद की रविवार को मुलाकात हुई थी। इसके बाद आया यूएई का यह निर्णय भारत के लिए भी गेमचेंजर हो सकता है। भारत को यूएई से कम कीमत पर तेल की आपूर्ति हो सकती है। मौजूदा तेल आपूर्ति बेहतर हो सकती है। तेल के आयात बिल भी कम होगा, जिससे महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
ओपेक उत्पादन को नियंत्रित करके बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर या ऊंचा रखने की कोशिश करता है, लेकिन यूएई के बाहर आने के बाद वह अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाएगा। इससे वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा। इसका फायदा भारत जैसे बड़े आयातक देश को मिलेगा। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल आयात करता है। जाहिर सी बात है कि तेल की कीमत कम रहने से आयात बिल कम होगा और चालू खाते का घाटा कम होने की उम्मीद जताई जाती है। भारत को यूएई से कम कीमत पर तेल की आपूर्ति हो सकती है। मौजूदा तेल आपूर्ति बेहतर हो सकती है। तेल के आयात बिल भी कम होगा, जिससे महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।