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Garba : उदयपुर में 49 वर्षों से चली आ रही अनोखी परंपरा, सिर्फ ढोलक की थाप पर होता है गरबा

Garba : न डीजे का शोर, न आधुनिक संगीत की चकाचौंध- यहां आज भी माताजी की भक्ति, पारंपरिक गीतों और गुजराती संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिलती है। वर्ष 1978 में युवाओं ने जिस परंपरा की नींव रखी थी, वह आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ रही है। अगले वर्ष इसकी स्वर्ण जयंती मनाई जाएगी। इस बारे में पढ़िए राजीव जैन की खास रिपोर्ट।
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Oct 15, 2026
Garba on Dholak Beats
सहस्त्र औदिच्य समाज की ओर से 49 साल पुरानी परंपरा जारी है। (Photo: Patrika, Designed: ChatGpt)

Garba : जहां आज गरबा बड़े आयोजनों, डीजे और आधुनिक संगीत की धुनों के बीच खेला जाता है, वहीं सहस्त्र औदिच्य समाज का गरबा आज भी धर्म, आस्था और परंपरा की विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। ढोलक की थाप, सामूहिक भक्ति गीत और गरबा कलश की आराधना के साथ शुरू हुआ सफर 49 वर्षों से समाज की धार्मिक विरासत को सहेज रहा है। वर्ष 1978 में सहस्त्र औदिच्य धर्मशाला में समाज के युवाओं ने जिस परंपरा की शुरुआत की, वह आज भी नवरात्रि में उसी श्रद्धा और उत्साह से आगे बढ़ रही है। अगले साल आयोजन के 50 वर्ष पूरे होने पर समाज स्वर्ण जयंती वर्ष मनाएगा।

Photo: Rajasthan Patrika

माताजी की भक्ति से शुरू हुई थी युवाओं की पहल

इस परंपरा की शुरुआत आदर्श संगठन युवा औदिच्य के बैनर तले समाज के युवाओं ने की थी। चंद्रेश औदिच्य, लोकेश द्विवेदी, देवकी वल्लभ दवे, बृजमोहन शर्मा, निरंजन त्रिवेदी, नरेश दीक्षित, दुर्गेश दवे, महेश दवे, राजेंद्र त्रिवेदी, ऋषि नंदन याज्ञिक और गोविन्द प्रसाद द्विवेदी सहित अन्य युवाओं ने इस पहल को साकार किया। शुरुआती दौर में न आधुनिक साउंड सिस्टम था और न बड़े आयोजन की सुविधाएं। ढोलक की थाप पर पारंपरिक गीत गाए जाते और माताजी की आराधना के साथ सामूहिक गरबा होता था। युवाओं की श्रद्धा और समाज के सहयोग ने छोटी-सी पहल को धार्मिक परंपरा का रूप दे दिया।

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जब गरबा दर्शन के लिए पहुंचते थे महाराणा

सहस्त्र औदिच्य समाज की गरबा परंपरा का इतिहास मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है। समाज की परंपरा के अनुसार, रियासतकाल में गरबा चौक पर शारदीय नवरात्रि के दौरान महिलाएं माताजी की आराधना करती थीं। इस धार्मिक आयोजन के दर्शन के लिए तब महाराणा और राजपरिवार के सदस्य भी पहुंचते थे। उस दौर में गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि परिवार की सुख-समृद्धि, मंगलकामना और मातृशक्ति की उपासना का माध्यम था। यही धार्मिक भाव आज भी समाज के गरबा आयोजन की आत्मा बना हुआ है।

गरबा कलश की पूजा, गुजराती संस्कृति की पहचान

गुजरात से आकर मेवाड़ में बसे सहस्त्र औदिच्य समाज ने अपनी मूल सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा है। समाज के गरबा आयोजन में गरबा कलश की स्थापना और उसकी पूजा विशेष महत्व रखती है। माताजी के प्रति श्रद्धा के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। ढोलक की थाप और सामूहिक भक्ति गीतों के बीच खेला जाने वाला गरबा धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है।

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पीढ़ियां बदलीं पर नहीं बदली परम्परा

समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और समाज की कार्यकारिणी भी बदलती रहीं, पर सहस्त्र औदिच्य समाज ने गरबा परंपरा को टूटने नहीं दिया। नई पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जोड़ने वाला यह आयोजन आज भी समाज की सामूहिक पहचान बना है। 1978 में कुछ युवाओं द्वारा शुरू किया सफर अब स्वर्ण जयंती के ऐतिहासिक पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। अगले वर्ष आयोजन के 50 वर्ष पूरे होंगे।

Updated on:
15 Oct 2026 01:44 pm
Published on:
15 Oct 2026 01:44 pm