Uma Bharti Exclusive Interview: बीजेपी की फायर ब्रांड उमा भारती के साथ पत्रिका की खास बातचीत, मध्यप्रदेश के ज्वलंत मुद्दों और राजनीति पर की बेबाकी से की बात, बोलीं- मैं जानती हूं इंटरव्यू सामने आने पर कई बातें उठेंगी.... patrika.com पर पढ़ें UMA BHARTI Exclusive Interview
Uma Bharti Exclusive Interview: मध्य प्रदेश में शराबबंदी की मुहिम छेड़ने वाली पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती कभी अपने बयान, कभी पार्टी और उसके नेताओं को नसीहत देकर सुर्खियों में रहती हैं। अब वे शराब बेचने को सरकारी मजबूरी मानती हैं। उनका कहना है कि लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है। इसलिए अब सरकार चाहकर भी शराब बेचना बंद नहीं कर पा रही है। सरकार के रेवन्यू में शराब से आने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा है। उमा भारती मानती हैं कि शराब बेचना सामूहिक नरसंहार है। प्रदेश के ऐसे अनेक ज्वलंत मुद्दों और राजनीति पर अपनी बेबाकी के लिए जानी जाने वाली फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती से नितिन त्रिपाठी की विशेष बातचीत-
ऐसा लग सकता है कि मैं लाड़ली बहना का विरोध कर रही हूं, मैं उससे भयभीत भी नहीं हूं, लेकिन अब महिलाओं को ही आगे आकर कहना होगा कि भले ही योजना का पैसा देना बंद कर दिया जाए, लेकिन उस शराब को बेचना बंद कर दें जो उनका परिवार बिगाड़ रही, पति-बेटों की जिंदगी को मौत की तरफ धकेलती है। शराब का नुकसान सबसे ज्यादा महिलाएं ही झेलती हैं। कई मामले हैं, पति हो या बेटा, लाड़ली बहना के पैसे से शराब पी जाते हैं। फिर बीमार पड़ते हैं तो महिलाओं को मिलने वाली राशि उनके इलाज में लग जाती है। जेवर, जमीन गिरवी रखने पड़ते हैं, इसलिए महिलाओं को ही आगे आकर शराब का विरोध करना होगा।
मेरी पहल पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आबकारी नीति के ड्राफ्ट से सहमत थे। प्रस्तावित नीति अमल में आए तो मंदिर, स्कूल-कॉलेज और अस्पताल ही नहीं, जनविरोध पर भी शराब दुकान बंद करनी पड़ेगी। ओरछा में मैंने खुद दुकान बंद करवाई। बल्देवगढ़ में तो अफसरों से कहा कि दुकान बंद नहीं कराई तो ट्रॉली में गोबर-कंडे लाकर फेंकेंगे। ऐसा करना अपराध में नहीं आता और दुकान को गोबर से पूर देंगे। मैंने एक बार यह शुरुआत की तो जहां जनविरोध है, वहां शराब दुकान पर कंडे फेंकना शुरू हो जाएगा। तत्काल दुकान बंद करा दी गई।
नहीं, ऐसा नही है। कई बड़े अधिकारी, उनकी पत्नियां और परिवार भी शराब से परेशान हैं। जब शराब को लेकर नई नीति बनाने की बात आई, तो वहां मौजूद एक शीर्ष अधिकारी ने मुझे कहा, दीदी आप अच्छा काम कर रही हैं। पहले उनकी पत्नी आइस्क्रीम खाने जाती थी, अब कार से भी नहीं निकल पाती है। बाद में मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। संवेदनशील हैं, प्रदेश में अहाते बंद कर दिए गए। सरकार की आमदनी के और भी स्रोत हो सकते हैं, लेकिन नागरिकों के प्राणों से खेलना, जिंदगी संकट में डालकर राजस्व कमाना अधर्म है। इसके विकल्प हो सकते हैं।
आपने जनता से वादा किया है, तो उसे पूरा करिए। अपनी बात को पूरा कराने पैटर्न बदलना पड़ता है। आपकी आस्था है तो अधिकारी वैसे सुझाव देने लग जाएंगे। उस समय आबकारी विभाग को करीब 900 से 1000 करोड़ की आय शराब से होती थी। मैंने परिवहन विभाग में कुछ सुधार कराए, तो उसकी आय 1500 से 1600 करोड़ थी। अगर परिवहन में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगा दिया होता, गौपालन जैसी योजना लाते, तो इनमें शराब से कहीं अधिक आय सरकार को हो जाएगी। मैं इसे घोषणा पत्र में नहीं ला पाई। नर्मदा नदी और केन-बेतवा जैसे प्रोजेक्ट प्लान करें। गुजरात के आणंद की तरह दुग्ध क्रांति की जाए। मोहन यादव गोपालन को बढ़ावा दे रहे हैं, इसे बड़े पैमाने पर किया जाए तो अच्छा रहेगा।
जब सरकार में रहते, तब कई संकट और चुनौतियां होते हैं, बाहर रहते हैं, तब बात अलग होती है। मैं मेधा पाटकर का बहुत सम्मान करती हूं। जब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उनके आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रहे थे, तब वे मेरे पास आईं। हमने दिग्विजय सरकार का विरोध किया। लेकिन जब मैं मुख्यमंत्री बनी तो मेधा दीदी और दिग्विजय सिंह मेरे पास आए। मैंने उनसे कहा कि मैं बांध की ऊंचाई से समझौता नहीं कर सकती। मध्यप्रदेश को बिजली चाहिए, सरकार बाहर से महंगी बिजली नहीं खरीद सकती। लेकिन इतना कर सकती हूं कि आप प्रभावित गांवों की सूची दे दें, उनका पुनर्वास और मुआवजा अच्छा करा दूंगी। हरसूद में दीदी, अरुंधति राय और दिग्विजय मेरा विरोध करने पहुंचे थे।
मेरे तेवर वही हैं, लेकिन खुद को तीस मार खां नहीं समझती। हां, अपने मनुराज्य की राजा हूं, मुझे उसमें आनंद है। उस समय आंदोलन ही ऐसे थे, जिनमें अग्रेसिव होना था। मीठी-मीठी बातें बोलकर नहीं रह सकते थे। मैं ही कार सेवा का नेतृत्व कर रही थी। वहां जान हथेली पर रखकर जाना था। 84 से 89 में सुविधाओं में कमी होते हुए भी कड़ी मेहनत की। केन्द्र में सरकार बनी तो खुशी का ठिकाना न रहा। पार्टी से हटाया गया, अब फिर लौट आई। इसलिए पार्टी में बात करती हूं।
जब मैं राजनीति में आई, तब मेरा रेशम जैसा मन था। छोटी उम्र थी, 60-70 देश घूम चुकी थी। अमरीका और अफ्रीकी देशों में मैंने शोषण देखा। समझ आया कि शोषण और अन्याय हर जगह है। मैंने अपने गांव डूंढ़ा में भी ऐसा ही पाया। इस सर्वव्यापी अन्याय के खिलाफ ईश्वर की शक्ति लेकर आगे बढ़ी। राजनीति में इसी अन्याय और शोषण का विरोध मेरा मंतव्य बन गया। एक समय परिस्थितियां ऐसी बनीं कि मुझे पार्टी ने हटा दिया। मैंने कभी भाजपा नहीं छोड़ी।
''(मैं जानती हूं कि इंटरव्यू सामने आने पर कई बातें उठेंगी)''इसके लिए कुछ हद तक मैं ही जिम्मेदार हूं। मैंने कभी पार्टी नहीं छोड़ी, लेकिन पार्टी ने मुझे निकाला। मैंने जनशक्ति पार्टी बनाई और राजनीति में फिर उतरी। पार्टी का विस्तार हो रहा था। बुंदेलखंड मेरा गृह क्षेत्र था, यहां जड़ें गहरी थीं। यहां चुन-चुनकर सामंतियों को मेरे सामने लाया गया, जिनको मैंने पाताल में पहुंचा दिया था। इस बार मेरा मुकाबला करना मुश्किल था, क्योंकि मैं सर्वहारा वर्ग की नेता थी। मुझे आम जनता पसंद करती थी। तब मेरे मुकाबले सामंतवादियों को उतारा गया। अब इनको रोकना मुश्किल है। यह सत्ता का खून पी चुके हैं। पार्टी में कई जगह निर्णायक भूमिका में हैं। यह पार्टी के लिए भस्मासुर बनेंगे। इसलिए पार्टी को ही उन्हें अपने से अलग करना होगा। ऐसा नहीं किया तो नुकसान उठाना पड़ेगा।
मुझे खुद भी सरकार चलाने में स्ट्रेस हो रहा था। मैं स्वतंत्र होकर काम करना चाहती थी। वैसे ही जैसा मोदीजी को गुजरात में मौका मिला था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा में सत्ता को संगठन से सांमजस्य बनाना होता है। यह शिवराज सिंह और मोहन यादव कर सकते हैं, मैं नहीं कर सकती थी। मैं अपनी सोच और पॉलिसी पर काम नहीं कर पा रही थी। जैसा राज्य, पार्टी और अपने कार्यकर्ता के लिए करना चाहती थी, वह नहीं कर पा रही थी।
मुझे कोई मलाल नहीं है। मेरी विदाई में, मैं अपनी गलती मानती हूं। मैं उस समय गुरुवर (अटल बिहारी वाजपेयी), दादा (लालकृष्ण आडवाणी) और जसवंत सिंह जी से खूब लड़ती थी। जो मीडिया के सामने आया, वह कुछ भी नहीं। मैंने उससे कहीं ज्यादा टीस इन्हें पहुंचाई। यह इस हद तक पहुंच गई कि इनको मुझे निकालने का निर्णय लेना पड़ा। उस समय बिहार की प्रभारी थी, वहां की जीत के श्रेय के बजाय पार्टी से बाहर कर दिया गया। इतना जरूर है कि 2008 में मध्यप्रदेश में अगर कांग्रेस की सरकार बन जाती तो मलाल होता।
मेरे अपनों का विश्वासघात नहीं था, उनकी हैसियत भी नहीं थी कि वो ऐसा कर पाते। यह सिर्फ कहानियां हैं। संगठन और मेरे मंत्री-विधायक अपने मन की बात मुझसे कर सकते थे। मैं उनके और ब्यूरोक्रेसी के बीच तालमेल बैठाती थी। शिकायत मिलने पर तत्काल दोनों को बुलाकर समाधान करती थी। मेरा इस्तीफा षड्यंत्र से नहीं लिया गया। यह स्वभाविक था। जो सत्ता (बाबूलाल गौर) में आ गए, वह पद क्यों छोड़ते। उनके समय जो मनमानी की छूट मिली, वह मेरे साथ नहीं मिलती। इसलिए सभी ने उसको स्वीकार कर लिया।
हां, मैं जब मुख्यमंत्री बनी, तब सिंहस्थ पर्व नजदीक था। मुझे तैयारियों के लिए सिर्फ तीन महीने मिले थे। मैंने इतने कम समय में बेहतर काम करके दिखाया। पहला सिंहस्थ था, जिसमें एक भी मौत नहीं हुई थी। इसमें पुलिस-प्रशासन की बड़ी भूमिका होती है। मैंने पुलिस से कहा था कि, आप खाकी वर्दी में साधु हो। किसी को डंडा नहीं दिखाना, रास्ता दिखाना। कोई नाराज हो जाए तो हाथ जोड़ लेना। मैं किसी अधिकारी को डराती नहीं थी। मैंने अच्छे अधिकारियों की टीम बनाई थी। झाबुआ की घटना को संभालना हो या भिंड में मौतों का सिलसिला रोकना हो, कई काम विवेक से किए। आपको बताती हूं, मैंने स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारी को आदेश दिया कि आप भिंड में रहेंगे जब तक मौतें थमती नही हैं। तीन दिन में हालात संभल गए। किसी ने पूछा आपने उनको क्यों भेजा, मैंने कहा कि अपना प्रभाव दिखाने नहीं, उनके प्रभाव से स्थिति नियंत्रित करने के लिए भेजा था।
आमतौर पर बयान काट-छांट कर दिए जाते हैं। आप मेरी पूरी बात को छापना। वो तो एक बार वहां स्टेशन पर मुझसे कहा कि आप यहां से चुनाव क्यों नहीं लड़ती। मैंने कहा, पार्टी कहेगी तो लड़ूंगी। यह बात उल्टी हो गई कि मैंने झांसी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। तीन बातें हैं, पहली तो अनुराग शर्मा (मौजूदा सांसद) को कोई परेशानी न हो, तो झांसी से चुनाव लड़ूंगी। दूसरा अगर पार्टी कहेगी तभी चुनाव लड़ूंगी। तीसरी बात झांसी के अलावा कहीं से चुनाव नहीं लड़ूंगी।
मैंने कहा ना। झांसी के अलावा कहीं से चुनाव नहीं लडूंगी, वह भी तीन बातें पूरी होने पर। पार्टी चाहेगी तो, राज्यसभा सदस्य बनाकर भी सदन में भेज सकती है, लेकिन मैं गवर्नर या राज्यसभा के रास्ते नहीं जाना चाहती। मैंने पार्टी को यह बता दिया है। 2019 और 2024 में पार्टी मुझे लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती थी, सीट भी बताई। लेकिन मैं तैयार नहीं हुई। मोदीजी मेरे इनकार की वजह से नाराज हुए। तब मैंने कहा कि रामजन्म भूमि का निष्ठा से काम कर रही थी। मां गंगा के लिए काम करना चाहती हूं।
मोदीजी को गंगा के लिए काम करना होगा और वे ही करेंगे। उस काम को पूरा किए बिना कुर्सी नहीं छोड़ पाएंगे। उन्होंने क्यों कहा था कि मां गंगा ने मुझे बुलाया है। गंगा मेरी मां है, वह निर्मल और निर्बाध बहेगी, क्यों कहा था? अब जो कहा, उन्हें पूरा करना होगा। मैं गंगा के लिए काम कर रही हूं, वह अभी नहीं दिखेगा। गंगा के लिए एक्ट बन जाए और फिर प्राधिकरण गठित हो जाए। गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने का मिशन पूरा हो जाएगा। विद्यासागर जी महाराज में मेरी श्रद्धा थी। एक बार उन्होंने कहा था कि वात्सल्य और विनय से गंगा के लिए काम करना। वात्सल्य से तो काम कर रही हूं, लेकिन विनय लाना कठिन हो जाता है।
अब अगर राजनीति में शुचिता चाहिए तो सबसे पहले चुनाव खर्च कम करने पड़ेंगे। भाजपा के हर कार्यकर्ता को मोदी-योगी जैसी जीवनशैली अपनाने तैयार होना होगा। इसमें संगठन मंत्री की भूमिका अहम होगी। अभी तो नैतिकता और शुचिता का अभाव दिख रहा है। अगर इसके लिए प्रयास नहीं करेंगे तो सत्ता में रहकर भी आत्मा मर चुकी होगी। त्याग, तपस्या हमारी आत्मा है। पद की लालसा क्यों, इसके बिना भी काम किए जा सकते हैं। कुशाभाऊ जी, दत्तोपंत जी, अम्मा (राजमाता) जैसे महान लोग पार्टी में रहे। इन्होंने पद छोड़कर भी बड़े काम किए।
आप लोग कहते हैं, विपक्ष इस पर सवाल उठाता है। विपक्ष है कहां? कांग्रेस, सपा, बसपा से चले आ रहे लोग ही अब भाजपा को सिंगल पार्टी नेशन की तरफ बढ़ा रहे हैं। भाजपा में आकर इनका भाव परिवर्तन हो गया है। नाला हो या नाली, जब गंगा में मिलते हैं तो सब पवित्र हो जाते हैं, जल निर्मल हो जाता है। कमलनाथ अच्छे नेता हैं, वे अच्छी सरकार चला रहे थे, लेकिन उनके आसपास के लोग लूट-खसोट करना चाहते थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया आए, तो भाजपा ने फिर सबको साथ लेकर अच्छी सरकार चलाई।
मैं अब भी मानती हूं कि पार्टी को नैतिकता के आधार पर मंत्री विजय शाह और प्रतिमा बागरी का इस्तीफा लेना चाहिए था। इन्होंने पद पर रहते हुए मर्यादा का उल्लंघन किया है। वह मंत्री बने रहें, यह पार्टी के लिए अच्छा नहीं है। अब मोहन यादव को सबके परामर्श से सरकार चलानी है। परामर्श में एससी वर्ग से आने वाली बागरी और एसटी से आने वाले शाह को नहीं हटाने की बात आई होगी। फिर भी प्रदेश में भाजपा को जो बहुमत मिला है, उसमें समझौते की जरूरत नहीं थी। संगठन चाहता तो, बागरी की जगह किसी और एससी को मंत्री बना देता, शाह की जगह किसी और एसटी नेता को विकल्प के तौर पर ले आता।
अभी यूपी में एक्सप्रेस वे, हर घर में नल से जल के जो काम हुए हैं, उससे हमारे हिस्से का बुंदेलखंड बहुत पीछे रह गया है। इसके लिए मैंने जो कहा, उसके बिना विकास नहीं हो पाएगा। यहां बहुत संपदा है, धार्मिक स्थल है। बुंदेलखंड के पर्यटन का मुकाबला तो पूरे भारत में नहीं किया जा सकता है। यह काम अकेले से नहीं होगा, इसके लिए पूरी टीम लगानी पड़ेगी।
बुंदेलखंड के विकास के लिए नीतियां, नीतियों का क्रियान्वयन और क्रियान्वयन में एनजीओ का सहयोग जरूरी है। जो बुंदेलखंड में काम प्रभावित है, जो आपसी संघर्ष के मामले हैं, उन्हें हेमंत जी संभाल लेंगे। बुंदेलखंड के विकास के लिए किसानों को उन्नत खेती के तरीके अपनाने होंगे। मिनरल्स, वनोपज बुंदेलखंड की आत्मा है, इस पर दबंगों का कब्जा हो गया है। इसमें गरीबों की भागीदारी से बुंदेलखंड को खड़ा किया जा सकता है।
पत्रिका की ये खास पेशकश आपको कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। ऐसी ही एक्सक्लूसिव इंटरव्यूज और खबरों के लिए जुड़े रहिए patrika.com के साथ।