
UPI Payment : भारत में रिटेल वित्तीय लेन-देन के तौर-तरीके पिछले कुछ वर्षों में बुनियादी रूप से बदल चुके हैं। चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक क्यूआर कोड के विस्तार ने नकदी पर निर्भरता को कम किया है। भारतीय रिज़र्व बैंक और वित्तीय संस्थाओं के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) की लोकप्रियता ने पारंपरिक बैंकिंग ढांचे, विशेष रूप से एटीएम नेटवर्क पर गहरा असर डाला है। वहीं, शून्य लागत पर चलने वाले इस डिजिटल मॉडल में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर हो रही बहस और नए शुल्कों की चर्चाओं ने बैंकिंग सिस्टम, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के सामने नई पेचीदगी खड़ी कर दी हैं।
आरबीआई की आधिकारिक रिपोर्ट (रिपोर्ट ऑन ट्रेंड एंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग इन इंडिया) और हालिया आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वित्तीय वर्षों में बैंकिंग के बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव आया है।
देश में मार्च 2023 में कुल एटीएम एवं कैश रीसायकलर्स (सीआरएम) की संख्या लगभग 2.53 लाख थी। वित्त वर्ष 2024-25 के अंत (मार्च 2025) तक यह आंकड़ा गिरकर 2,51,057 पर आ गया। हालिया आंकड़ों (2025-26) के अनुसार यह नेटवर्क और घटकर लगभग 2.15 लाख से 2.10 लाख के दायरे में सिमट रहा है। पिछले दो वर्षों में बैंकों ने मुख्य रूप से ऑफ-साइट एटीएम (शाखाओं से बाहर बाज़ारों, मॉल और सार्वजनिक स्थानों पर लगे एटीएम) को बंद किया है। निजी बैंकों ने अपने एटीएम नेटवर्क में सबसे ज्यादा कटौती की। दूसरी ओर, केवल गैर-बैंक संस्थाओं द्वारा संचालित 'व्हाइट-लेबल एटीएम' (डब्ल्यूएलए) की संख्या में ही हल्की बढ़त देखी गई।
कहा जा रहा था कि यूपीआई के बाद बैंकों ने शाखाएं बंद कर दी हैं, लेकिन आरबीआई के आंकड़े इसके उलट एक दिलचस्प बदलाव दिखा रहे हैं। देश में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की शाखाएं घटने के बजाय करीब 2% से 2.8% की दर से बढ़ी हैं। वर्तमान में देश में कुल बैंक शाखाओं की संख्या 1.64 लाख से अधिक है। हालांकि बदलाव बैंक शाखाओं में हुई है। शाखाओं की उपयोगिता पूरी तरह बदल गई है। पहले जहां शाखाओं में 70 प्रतिशत भीड़ पासबुक प्रिंटिंग, चेक जमा करने और नकदी निकासी के लिए होती थी, वह काम अब डिजिटल हो चुका है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) ने अपनी दो-तिहाई नई शाखाएं ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में खोली हैं। शहरी इलाकों में शाखाओं का आकार छोटा किया जा रहा है और वे अब 'कैश काउंटर' के बजाय 'क्रेडिट, इन्वेस्टमेंट और लोन प्रोसेसिंग हब' के रूप में काम कर रही हैं।
भारत में होने वाले कुल रिटेल डिजिटल भुगतान की वॉल्यूम (संख्या) में यूपीआई निर्विवाद रूप से सबसे बड़ा मंच है। आरबीआई और एनपीसीआई के आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुल रिटेल डिजिटल पेमेंट्स में यूपीआई की हिस्सेदारी 84% से 85% तक पहुंच गई है। डेबिट कार्ड, मोबाइल वॉलेट और नेट बैंकिंग के कुल ट्रांजेक्शन मिलकर भी इसके आसपास नहीं टिकते। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान यूपीआई ने सालाना 240 अरब से अधिक लेनदेन दर्ज किए हैं, जिनका कुल मूल्य 310 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा है।
मूल्य के आधार पर (Value Share): बड़े मूल्य वाले संस्थागत लेनदेन (आरटीजीएस/एनईएफटी) भले ही मूल्य में बड़े हों, लेकिन खुदरा बाज़ार (P2P और P2M) के कुल वित्तीय टर्नओवर में यूपीआई अब 65% से अधिक का योगदान कर रहा है।
यूपीआई की सफलता की सबसे बड़ी बुनियाद इसका 'शून्य एमडीआर' मॉडल रहा है, यानी न तो ग्राहक को अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है और न ही सामान्य दुकानदार को। लेकिन पिछले दिनों जब से उच्च मूल्य के मर्चेंट ट्रांजेक्शन या प्रीपेड वॉलेट लिंक्ड यूपीआई (पीपीआई-यूपीआई) पर 1.1% तक इंटरचेंज शुल्क और ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट पेमेंट्स पर एमडीआर लगाने संबंधी चर्चाएं और अधिसूचनाएं सामने आईं, बाज़ार में विवाद जैसी स्थिति बनने लगी है। अभी से कई दुकानदार यूपीआई से पेमेंट लेना बंद कर दिए हैं। खासकर 2000 रुपए से अधिक का भुगतान।
दैनिक माइक्रो-ट्रांजेक्शन अप्रभावित: ₹10 से ₹500 तक के सामान्य पर्सन-टू-मर्चेंट लेनदेन पर किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष शुल्क न होने से आम उपभोक्ता के व्यवहार पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है; वॉल्यूम में लगातार वृद्धि जारी है। बड़े मर्चेंट लेनदेनों में खिंचाव दिख रहा है। ₹2,000 से ₹10,000 के बीच के भुगतानों पर जब व्यापारियों को यह आशंका हुई कि सेटलमेंट पर 0.4% से 1.1% तक कटौती हो सकती है, तो टियर-2 और टियर-3 शहरों के मध्यम व्यापारियों ने बड़े डिजिटल बिल के बदले दोबारा नकदी मांगने की प्रवृत्ति शुरू की।
डिजिटल भुगतान के इस अत्यधिक केंद्रीकरण और बुनियादी ढांचे में आ रहे बदलाव से चार बड़ी समस्याएं उभर रही हैं:
अमर परवानी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स कैट का कहना है कि एमडीआर का छोटे और बड़े व्यापारियों पर क्या असर पड़ेगा, इसका अध्ययन कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हमारी टीम संवाद कर फीडबैक ले रही है। ग्राहकों और व्यापारियों में से किसी को नुकसान नहीं होना चाहिए। इसे लेकर केंद्र सरकार से भी आग्रह करेंगे।
प्रिंस मल्होत्रा, सीए, बिलासपुर ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि एमडीआर को समझना होगा। एक ही ट्रांजेक्शन जब तक फ्लो करेगा, उस पर एमडीआर लगता रहेगा। उदाहरण के लिए एक ही फर्म से 75-75 हजार रुपए पेमेंट किया गया तो सभी एमडीआर लगेगा। एक व्यवसायी ने 75 हजार से अपना मार्जिन काटकर दूसरे को देगा, तो फिर उसमें एमडीआर लगेगा। यह टैक्स फ्री है लेकिन हर ट्रांजेक्शन में कट ले रहे हैं। कहा जा रहा है कि फिनटेक कंपनियां अपना ऑपरेशनल कॉस्ट कहां से निकालेंगी लेकिन इनके पास तो कमाई के कई रास्ते हैं। ऑल इंडिया लेवल के एड इनके पास आ रहे हैं। ये लोन देकर कमा रही हैं। इनका ऑपरेशनल कॉस्ट बहुत कम है। एमडीआर से कैश इकॉनोमी फिर से बढ़ेगी। जबकि डिजिटल इंडिया की बात की जा रही है। 300 रुपए कोई एक्सट्रा नहीं देगा। कैश का ज्यादा उपयोग होगा।