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घटती हरियाली और बढ़ते कंक्रीट के बीच ‘अंगूर वाली आंटी’ की अनोखी पहल, रायपुर की छत पर उग रही उम्मीद की बेल, जानें कैसे?

Urban Gardening In CG: आज के दौर में बढ़ती आबादी और तेजी से फैलते शहरीकरण ने पर्यावरण को गहरी चोट पहुंचाई है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, कंक्रीट के जंगल और प्रदूषण ने हमारे पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बिगाड़ दिया है। हालांकि इस चुनौतीपूर्ण समय में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपने छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण की मिसाल पेश कर रहे हैं।

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Feb 18, 2026
रायपुर में ‘अंगूर वाली आंटी’ बनीं हरियाली की मिसाल (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Urban Gardening: बढ़ती आबादी, तेजी से फैलता शहरीकरण और कंक्रीट के जंगल आज के दौर में शहरों की पहचान बन चुके हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ते प्रदूषण ने पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कभी जहां खुली हवा और हरियाली हुआ करती थी, वहां अब धुएं और धूल का साया नजर आता है।

लेकिन इसी बदलते दौर में राजधानी रायपुर से एक सकारात्मक तस्वीर सामने आ रही है। जगह की कमी के बावजूद यहां कई लोग अपने घरों की छतों और बालकनियों में फलदार पौधे उगाकर शहरी बागवानी की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सार्थक कदम है, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रही है।

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“अंगूर वाली आंटी” बनीं प्रेरणा

रायपुर के प्रियदर्शनी नगर में रहने वाली लक्ष्मी यादव को लोग प्यार से “अंगूर वाली आंटी” के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने घर की छत पर अंगूर की बेल लगाकर शहरी बागवानी की शुरुआत की। लक्ष्मी यादव बताती हैं कि अगस्त महीने से बेल में फूल आने लगते हैं और अक्टूबर-नवंबर तक अंगूर पककर तैयार हो जाते हैं। इस पहल की प्रेरणा उन्हें भोपाल प्रवास के दौरान मिली, जहां उन्होंने पहली बार किसी घर में अंगूर की बेल देखी। रायपुर लौटने के बाद उन्होंने नर्सरी से पौधा लाकर अपने घर में लगाया।

इंटरनेट और अनुभवी लोगों से ली जानकारी

शुरुआती दौर में उन्हें असफलता भी मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इंटरनेट और अनुभवी लोगों से जानकारी लेकर मिट्टी का संतुलन सुधारा, जैविक खाद का उपयोग किया और नियमित देखभाल की। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और छत पर अंगूर की हरी-भरी बेल लहलहाने लगी।

आज वे करीब 20 लोगों को अंगूर की कलमें दे चुकी हैं, ताकि वे भी अपने घरों में हरियाली और ताजे फलों का आनंद ले सकें। इतना ही नहीं, वे अब अपने घर में सेब और संतरे जैसे फलदार पौधे भी उगा रही हैं। लक्ष्मी यादव के घर की अंगूर से लदी बेल की तस्वीर पिछले सीजन की है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं।

धूप-छांव का संतुलन जरूरी

भाठागांव के डी.के. तिवारी ने अपनी छत पर चीकू, जामुन, एप्पल बेर, आम और चेरी जैसे पौधे लगाए हैं। उनका कहना है कि गमलों में फलदार पौधे उगाने के लिए नियमित पोषण, ऊंचाई नियंत्रण और पौधे की प्रकृति के अनुसार धूप-छांव का संतुलन बेहद जरूरी है। वे बताते हैं कि जमीन में लगे पौधों को प्राकृतिक पोषण मिल जाता है, लेकिन टेरेस गार्डनिंग में अतिरिक्त देखभाल करनी पड़ती है। बड़े आकार के गमले, अच्छी जल निकासी और जैविक खाद का उपयोग सफलता की कुंजी है।

ग्रॉफ्टिंग तकनीक से मिल रही सफलता

महावीर नगर की मनीषा त्रिवेदी गमलों में चीकू और शहतूत उगा रही हैं। उनका कहना है कि सही ग्रॉफ्टिंग तकनीक अपनाकर सीमित स्थान में भी फलदार पौधे सफलतापूर्वक लगाए जा सकते हैं। इस तकनीक से पौधे जल्दी फल देने लगते हैं और उनकी ऊंचाई नियंत्रित रहती है, जिससे वे छत या बालकनी में आसानी से विकसित हो जाते हैं।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा संदेश

विशेषज्ञों के अनुसार, छतों पर हरियाली बढ़ाने से घर का तापमान 2 से 4 डिग्री तक कम हो सकता है। इससे बिजली की खपत घटती है और हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यदि हर घर की छत पर कम से कम एक फलदार पौधा लगाया जाए, तो शहर के वातावरण में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

रायपुर में बढ़ती शहरी बागवानी की यह पहल केवल फल उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को आत्मनिर्भर बनने और प्रकृति के करीब आने का अवसर भी दे रही है। कंक्रीट के बीच उगती ये हरी बेलें उम्मीद का संदेश देती हैं कि मजबूत इरादों से हर छत को हरा-भरा बनाया जा सकता है। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े बदलाव की नींव रखते हैं, और रायपुर की ये छतें उसी सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत हैं।

Published on:
18 Feb 2026 03:46 pm
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