
US-Iran Islamabad Agreement : बीते सप्ताह की शुरुआत में अमेरिका और ईरान आखिरकार युद्ध रोकने के लिए एक समझौते पर पहुंचे। इस समझौते में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सराहा और उसकी प्रशंसा की। लेकिन क्या यहीं पर पाकिस्तान की भूमिका खत्म हो जाती है? क्या शहबाज शरीफ की सरकार वैश्विक स्तर पर बनी नई कूटनीतिक पहचान और प्रभाव को उस दुर्लभ अवसर में बदल सकती है, जो वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की दिशा में को लाभ पहुंचाए?
युद्ध में 60 दिनों की राहत!
अमेरिका और ईरान के बीच कई हफ्तों की गहन कूटनीतिक बातचीत के बाद भी यह समझौता कोई स्थायी शांति संधि नहीं है। यह केवल एक अंतरिम व्यवस्था है, जिसने एक खतरनाक टकराव को अस्थायी रूप से रोक दिया है और 60 दिनों की बातचीत के लिए समय दिया है। इस दौरान सबसे कठिन मुद्दों जैसे प्रतिबंधों में राहत, परमाणु प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा करनी होगी।
देश की सिर्फ भौगोलिक स्थिति के चलते उसके पड़ोसी देश या दुनिया के दूसरे मुल्कों के साथ व्यापारिक संबंध (Trade relationships) नहीं बनते। दो देशों के बीच विश्वसनीयता और बेहतर व्यवस्था के कारण व्यापारिक रिश्ते बनते हैं। अगर पाकिस्तान अपने पक्ष में पैदा हुई नई परिस्थितियों में यह चाहता है कि वह उन व्यापारिक गतिविधियों को अपनी ओर आकर्षित करे, जो अभी स्थापित खाड़ी मार्गों से होकर गुजरती हैं, तो उसे निवेशकों और व्यापारियों को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस्लामाबाद में किए गए वादे वास्तव में जमीन पर लागू होंगे। अन्यथा ये अवसर आसानी से किसी और देश की ओर चले जाएंगे।
अमेरिकी नाकाबंदी के दौरान ऐसी खबरें सामने आई थीं कि सैकड़ों ईरानी जहाज, जिनमें जरूरी सामान था, वे सभी कराची और आसपास के समुद्री क्षेत्र में इंतजार कर रहे थे। सच तो यह है कि कराची के बंदरगाह पर खड़े अधिकांश जहाज को अभी तक ईरान लौटने की पूरी तरह से मंजूरी नहीं मिल पाई है। इस घटना से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर तैयार हुई अलग परिस्थितियों में पाकिस्तान की समुद्री स्थिति कितनी बड़ी संभावनाएं रखती हैं।
इस समय ईरान के मशहद शहर से एक व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आया हुआ है, जो पाकिस्तान से मांस उत्पादों के आयात और अन्य व्यापारिक व्यवस्थाओं की संभावनाएं तलाश रहा है। यह सच है कि इन दौरों से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था रातोंरात नहीं बदलेगी। लेकिन हजार कदम चलने के लक्ष्य में इसे पहला व्यावहारिक और व्यापारिक कदम तो माना ही जा सकता है। बड़े आर्थिक संबंध केवल बड़ी घोषणाओं से नहीं बनते। वे सैकड़ों छोटे-छोटे व्यावसायिक फैसलों से विकसित होते हैं, जिनमें आयातक, निर्यातक, लॉजिस्टिक्स कंपनियां, बैंक और सरकारी संस्थाएं शामिल होती हैं। पाकिस्तान अक्सर अपनी अर्थव्यवस्था के ढांचागत दिक्कतों के कारण यहीं पिछड़ने लगता है।
पाकिस्तान ने दरवाजा खोलने का कठिन काम तो कर लिया है, लेकिन अब असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वह खुद बाहर खड़ा होकर अपनी उपलब्धि का बखान न करता रह जाए और दूसरे देश अंदर इन नई परिस्थितियों को अपने हित में एकतरफा लाभ न उठा लें। पाकिस्तान के पास अमेरिका-ईरान समझौते में मध्यस्थता के बाद अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत करने और आर्थिक अवसर हासिल करने का मौका है। लेकिन केवल कूटनीतिक सफलता पर्याप्त नहीं होगी। उसे अपनी नीतियों को तेजी से लागू करना होगा, व्यापारिक भरोसा बनाना होगा और ग्वादर जैसे रणनीतिक स्थानों को वास्तविक आर्थिक केंद्र में बदलना होगा।
इस समझौते की नाजुक स्थिति इसके अंतिम रूप लेने से पहले ही दिखाई दे रही थी। लेबनान से जुड़े मतभेदों ने अंतिम समय में इस प्रक्रिया को पटरी से उतारने की धमकी दी थी। हालांकि बाद में कतर ने इसके क्रियान्वयन और वित्तीय आश्वासनों के लिए सहायता प्रदान की।
पाकिस्तान ने केवल परोपकार या मानवता के आधार पर इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया था। जाहिर सी बात है कि पाकिस्तान के खुद के भी हित इस समझौते की सफलता से जुड़ा हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष और मध्य पूर्व एशियाई देशों के बीच आपसी तनाव से सीधे तौर पर पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता था।
पाकिस्तान की ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा है और वह खाड़ी देशों से मिलने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर काफी निर्भर हैं और यही वजह है कि पाकिस्तान में तेल की कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। खाद्य वस्तुओं की महंगाई में इजाफा हुआ। अगर यह अंतरिम समझौता 60 दिन बाद अंतिम समझौते में नहीं तब्दील हुआ तो समुद्री मार्गों में बाधा फिर जारी रहेगी और क्षेत्रीय अस्थिरता का असर पाकिस्तान पर तुरंत पड़ सकता है। ईरान-अमेरिका के बीच हो रहे समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थता कोरी सदाशयता या शांति की स्थापना कराना कार्य नहीं था, बल्कि कूटनीति के जरिए अपनी रणनीतिक सुरक्षा और हितों की रक्षा करने का प्रयास था।
इस्लामाबाद समझौते का पहला लाभ पहले ही दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान ने दुनिया की बड़े देशों को यह याद दिलाने में सफलता हासिल की है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय वह उपयोगी भूमिका निभा सकता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान की वैश्विक छवि अक्सर आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता या सुरक्षा समस्याओं से जुड़ी रही है, लेकिन इस मध्यस्थता प्रयास ने कुछ समय के लिए इस कहानी को बदल दिया। पाकिस्तान को इस समझौते से पहले सिर्फ एक समस्या के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अब उसे समस्या का समाधान खोजने वाले के बतौर देखा जा रहा है।
अमेरिका में उपयोगिता अक्सर बेहतर संबंधों और पहुंच में बदल जाती है। वहीं खाड़ी देशों में वे देश महत्वपूर्ण माने जाते हैं जो विरोधी गुटों के बीच संवाद बनाए रख सकते हैं। कूटनीति में महत्व केवल धन या सैन्य ताकत से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि कठिन समय में दूसरे देश आपकी भागीदारी को कितना जरूरी समझते हैं। पाकिस्तान ने अपनी भूमिका से कुछ प्रतिष्ठा जरूर हासिल की है, लेकिन यह केवल कूटनीति का परिणाम है, न कि नीतिगत उपलब्धियों का विकल्प।
पाकिस्तान के लिए वास्तविक लाभ दो आपस में जुड़े हुए क्षेत्रों में छिपा है - सुरक्षा और अर्थव्यवस्था। सुरक्षा के क्षेत्र में मिलने वाला लाभ सबसे तुरंत दिखाई देने वाला हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने से पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर दबाव कम होगा और क्षेत्रीय अस्थिरता के सीमाओं के पार फैलने की संभावना भी घटेगी। इसके अलावा अचानक ऊर्जा संकट पैदा होने का खतरा भी कम होगा, जो घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सफल मध्यस्थता से पाकिस्तान के लिए एक ऐसा अवसर पैदा होगा, जिसमें वह बगैर किसी असहज स्थिति में फंसे ही एक साथ ईरान, सऊदी अरब, अबू धाबी, दोहा, चीन और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को संतुलित कर सकता है।
अगर प्रतिबंध धीरे-धीरे हटते हैं और ईरान क्षेत्रीय तथा वैश्विक व्यापार में फिर से शामिल होना शुरू करता है, तो पूरे खाड़ी क्षेत्र के व्यापार मार्गों में बदलाव आना तय है। दशकों से ईरान का अंतरराष्ट्रीय बाजारों के साथ व्यापार प्रतिबंधों और राजनीतिक सीमाओं के कारण प्रभावित रहा है। ऐसे में अगर व्यापार के लिए नया रास्ता खुलता है, तो इससे नए परिवहन मार्गों, वित्तीय चैनलों और लॉजिस्टिक साझेदारियों की मांग पैदा होगी। पाकिस्तान को इस संभावना के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि मौजूदा मध्य पूर्व एशिया संकट ने दुबई पर ईरान की निर्भरता की कमियां उजागर हो गई।
यूएई ने अपने यहां ईरानी व्यवसायों और बैंकों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके बाद से इस रास्ते पर निर्भरता कम करने की चर्चा शुरू हुई। नए पैदा हुए हालात में ग्वादर का महत्व बढ़ जाता है। ग्वादर महत्वपूर्ण समुद्री और जमीनी व्यापार मार्गों के बीच स्थित है और ईरान के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र के काफी करीब है। एक भरोसेमंद व्यापारिक गलियारा बनने के लिए पाकिस्तान को रणनीति, क्षमता और अवसरों को पकड़ने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी। इन मूलभूत चीजों के बिना ग्वादर केवल एक रणनीतिक विचार बनकर रह जाएगा।