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कौन थे गुमनामी बाबा, क्या वो सुभाष चंद बोस थे…

1960 के दशक में नेपाल के रास्ते एक गुमनामी बाबा भारत में प्रवेश करते हैं। अयोध्या में चुपचाप जीवन बिताने के बाद उनका अंतिम संस्कार फैजाबाद के गुफ्तार घाट में गुपचुप तरीके से कर दिया जाता है। क्या वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे... पढ़ें पूरी कहानी...

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Jan 23, 2026
नेताजी या गुमनामी बाबा (फाइल फोटो)

1960 के दशक में 'दशनामी सम्प्रदाय के एक संन्यासी नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं। वो उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले के नैमिषारण्य और बस्ती में साधू के तौर पर देखे जाते हैं, एकाकी जीवन बिताते हैं। उन्हें 'भगवानजी के नाम से जाना जाता है। फिर वो अयोध्या में रहने लगते हैं। कई साल वहीं रहते हैं। वहीं उनका निधन भी हो जाता है।

बताया जाता है कि नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे। खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिनों में मिलने-जुलनेवालों की तादाद बढ़ जाती थी। भगवानजी इतने गोपनीय ढंग से रहते थे कि उन्हें 'गुमनामी बाबा का नाम मिल गया, जो गुमनाम ही रहना चाहता हो। उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी ये दावा नहीं किया कि वो नेताजी हैं। 16 सितंबर 1985 को गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार फैजाबाद के गुफ्तार घाट में गुपचुप तरीके से कर दिया जाता है।

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फैजाबाद में नहीं हुआ गुमनामी बाबा का निधन

नेताजी सुभाष चंद्र बोस संबंधी जांच को लेकर बने जस्टिस मनोज मुखर्जी आयोग के सामने कुछ लोगों ने ये भी कहा कि गुमनामी बाबा का निधन फैजाबाद में नहीं हुआ था, बल्कि वो वहां से सितंबर 1985 में कहीं चले गए थे। बहरहाल फैजाबाद के गुफ्तार घाट में जो अंतिम संस्कार हुआ, उसमें पुलिस और फौज के कुछ अफसरों और जवानों की मौजूदगी भी बताई जाती है। तिरंगे में लपेट कर दाह संस्कार कर दिया जाता है। आमतौर पर इस घाट पर सामान्यअंतिम संस्कार नहीं होते। लेकिन गुमनामी बाबा का जरूर हुआ, फिर यहीं पर उनका स्मारकबना, उसपर जन्मतिथि की जगह वही तारीख लिखी है, जिस दिन सुभाष बोस पैदा हुए थे। मरने के दिन को लिखने की बजाए वहां तीन प्रश्नवाचक निशान बना दिये गए।

इसके बाद अगला काम था गुमनामी बाबा के सामानों को देखना। यही वो कड़ी थी, जिसने नेताजी से मृत्यु से जुड़े रहस्य को और गहरा दिया या ये कहिए कि एक नई कड़ी जोड़ दी। उनके सामानों में सारे सामान ऐसे थे, जो केवल और केवल नेताजी से खास रिश्ते की ओर इशारा कर रहे थे। इसमें सुभाष बोस के माता-पिता और परिवार की तस्वीरें, नेताजी के दर्जनों गोल चश्मे, वो सिगार जो वो पिया करते थे,टाइपराइटर, उनके हाथों से लिखे गए खत, 555 सिगरेटऔर शराब की बोतलें,रोलैक्स के साथ वो घड़ियां, जो अक्सरनेताजी के हाथों में देखी जाती थीं।

अखबारों की वो कटिंग्स, जिसमें नेताजी संबंधी खबरें थीं। साथ ही मिलने वाले सामानों में आजाद हिंद फौज की वर्दी, जापानी, जर्मन औरअंग्रेजी साहित्य,सैकड़ों टेलीग्राम, जो उन्हें भगवानजी के नाम से भेजे गए थे। दरअसल इसी के बाद लोगों को और लगने लगा कि गुमनामी बाबा कोई और नहीं बल्कि सुभाष थे। जब सुभाष की भतीजी कोलकाता से आईं और उन्होंने इन सामानों को देखा, तो उनका भी कहना था कि ये सामान सुभाष और उनके परिवार से संबंधित हैं।

गुमनामी बाबा के पास से मिले सामान

  • सरकारीखज़ाने में जमा गुमनामी बाबा का सामान-
  • सुभाषचंद्र बोस के माता-पिता/परिवार की निजी तस्वीरें
  • कलकत्तामें हर वर्ष 23जनवरी को मनाए जाने वाले नेताजी जन्मोत्सव की तस्वीरें
  • लीलारॉय की मृत्यु पर हुई शोक सभाओं की तस्वीरें
  • नेताजीकी तरह के दर्जनों गोल चश्मे
  • 555सिगरेट और विदेशी शराब का बड़ा ज़खीरा
  • रोलैक्सकी जेब घड़ी
  • आज़ादहिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म
  • 1974में कलकत्ता के दैनिक 'आनंद बाज़ार पत्रिका' में 24 किस्तों में छपी खबर 'ताइहोकूविमान दुर्घटना एक बनी हुई कहानी' की कटिंग्स
  • जर्मन, जापानी और अंग्रेजी साहित्य की ढेरों किताबें
  • भारत-चीनयुद्ध सम्बन्धी किताबें जिनके पन्नों पर टिप्पणियां लिखी गईं थीं
  • सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु की जांच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें
  • सैंकड़ों टेलीग्राम, पत्र आदि जिन्हें भगवनजी के नाम पर संबोधित किया गया था
  • हाथसे बने हुए नक़्शे,जिनमें उस जगह को इंगित किया गया था जहां कहा जाता है नेताजी का विमान क्रैश हुआ था
  • आज़ादहिन्द फ़ौज की गुप्तचर शाखा के प्रमुख पवित्र मोहन रॉय के लिखे गए बधाई सन्देश नेताजी के निधन के बाद उनकी भतीजी ललिता बोस जब वहां आईं तो उन्होंने इन सामानों को देखा। उसके बाद वो हाईकोर्ट की शरण में गईं। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि एक ऐसा जांच आयोग गठित किया जाए जो इस पहलू की जांच करे कि गुमनामी बाबा कौन थे और उनके नेताजी सुभाष चंद्र बोस से क्या रिश्ते थे। फैजाबाद में गुमनामी बाबा के पास से मिला सामान राम कथा संग्रहालय में रखा है। वहां जाकर इसे देखा जा सकता है। जो भी इन सामानों को देखता है। गुमनामी बाबा से जुड़ी बातों को सुनता है, उसे लगने लगता है कि ये शख्स कोई और नहीं बल्कि नेताजी ही थे।

फैजाबाद में वो 1970 के दशक की शुरुआत में या फिर 60 के दशक के आखिर में पहुंचे थे। कहां से आए थे ये किसी को नहीं पता था। किसी ने उनका चेहरा भी नहीं देखा। आजतक कोई ऐसा शख्स नहीं मिला, जिसने दावा किया हो कि वो गुमनामी बाबा को सामने से देख चुका है।

अयोध्या में थे उनके विश्वस्त लोग

हालांकि अयोध्या औरफैजाबाद में उनके दो तीन ऐसे विश्वस्त लोग थे, जो उनसे मिलते थे, उसमें एक डॉक्टर भी थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपना मुंह बंद किये रखा। गुमनामी बाबा की सेवा के लिए सरस्वती नाम की महिला रहती थी, जिसे वो जगदंबे बोलते थे। उनके निधन के बाद वो वहां से चली गईं। बाद में मुखर्जी आयोग के सामने उनका बेटा राजकुमार शुक्ला पेश हुआ। उसने बताया कि जब साधू जी लखनऊ में ऋंगारनगर में ठहरे थे, तभी उसकी मां से उनकी मुलाकात हुई और फिर वो उनकी तब तक सहायक रहीं, जब तक कि उनका निधन नहीं हो गया। वैसे ये सवाल करने वाले भी कोई कम नहीं हैं, जिन्हेंलगता है कि भला सुभाष जी जैसे शख्स को ऐसी गुमनामी में रहने की क्या जरूरत होती।

कोई करीबी उनसे मिलने क्यों नहीं आया

कुछ इस पर सवाल उठाते हैं कि क्यों कभी इस बाबा से मिलने सुभाष का कोई करीबी या उनके भाई नहीं आए। 70के दशक में जब गुमनामी बाबा पहली बार फैजाबाद आए तो किसी ने उन्हें नोटिस नहीं किया। उसके बाद वो बस्ती चले गए। वहां मन नहीं लगा तो वापस फैजाबाद लौट आए। पहले पहल उन्होंने वहां सब्जीमंडी के एक मकान में रहना शुरू किया। इसके बाद वो एक बड़े अहाते वाले राम भवन में चले गए, फिर निधन तक यानि करीब 15 सालों तक वहीं रहे।

मकान मालिकों ने भी उन्हें नहीं देखा

दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या में वो जिन मकानों में रहे, उनके मकान मालिकों ने भी उन्हें नहीं देखा। किन्हीं असरदार लोगों के जरिए ये मकानगुमनामी बाबा को दिलाए गए थे। आमतौर पर बाबा लोग अपने इर्द गिर्द जमावड़ा औरभक्तों का हुजूम पसंद करते थे। ये बाबा अलग थे, जिन्हें ना तो अपने पास भीड़ पसंद थी और ना ही लोगों का जमावड़ा। बहुत कम लोग ही उन तक पहुंच पाते थे, वो भी वो लोग थे, जिनसे वो मिलना चाहते थे। वो हमेशा लोगों से पर्दे से पीछे मिलते थे। उनका चेहरा कोई नहीं देख पाता था। उनसे मिलने वाले लोगों में आजाद हिंद फौज के लोग हुआ करते थे। कुछ कोलकाता और दूसरे जगहों से आने वाले परिचित, बहुत से लोग रात के अंधेरे में कारों से आते थे। कइयों के साथ उनकी घंटों गंभीर मंत्रणाहोती थी।

कद-काठी में नेताजी जितने थे

सुभाष चंद्र बोस और गुमनामी बाबा की कद-काठी में गजब का साम्य होने का भी दावा किया गया। कहा जाता है गुमनामी बाबा का असर ऊपर तक जरूर था। क्योंकि किसी भी बाबा के लिए इतने रहस्यमय ढंग से लंबे समय तक एक जगह रहना मुश्किल होता। जिस समय वो जिंदा थे, उनके गुमनाम बनकर रहने और किसी को चेहरा नहीं दिखाने की वजह से शक भी पैदा हुआ। पुलिस तक शिकायत भी पहुंची। ये रिपोर्ट कितनी सही है ये तो नहीं मालूम लेकिन मीडिया में ये रिपोर्ट्स आ चुकी हैं कि एक बार एक पुलिस अफसर ने उनके रामभवन पर पहुंचकर जबरन कोशिश की कि वो उनके सामने आएं। गुमनामी बाबा सामने तो नहीं आए लेकिन कुछ ही घंटों में उस अफसर का तबादला जरूर हो गया।

बरती जाती थी गोपनीयता

लोगों को लगता है कि बाबा के संपर्क काफी ऊंचे थे। हालांकि वो कहां तक थे और किनसे थे, ये कभी किसी को मालूम नहीं हो पाया। ये तय है कि वो कोई साधारण बाबा नहीं थे। इनके पास मिले सामान भी यही दर्शाते हैं। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जिस तरह की गोपनीयता बनाकर रखी, वो भी चकित करने वाली है। अगर ये शख्स साधारण बाबा या संत थे तो इतनी फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलते थे। उनके पास दुनियाभर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं, साहित्य, सिगरेट और शराब हमेशा कौन पहुंचाता था।

2019 में हैंडराइटिंग के संबंध में दावा

वर्ष 2019 में अमेरिका के जाने माने हैंडराइटिंग (हस्तलेख) एक्सपर्ट कार्ल बैगट ने दावा किया कि गुमनामी बाबा और नेताजी की राइटिंग एक जैसी है। उन्होंने दोनों के लिखे पत्रों का विश्लेषण करने के बाद ये दावा किया। बैगेट 40 साल से ये काम कर रहे हैं। उन्हें दुनिया का ऐसा हैंड राइटिंग एक्सपर्ट माना जाता है, जिसके निष्कर्ष अब तक कभी गलत नहीं हुए हैं। उन्हें कुछ समय पहले बगैर बताए गुमनामी बाबा और सुभाष चंद्र बोस के लिखे पत्रों के दो सेट दिए गए। जिसकी गहन जांच के बाद उन्होंने कहा कि ये दोनों पत्र एक ही व्यक्ति ने लिखे थे। गेट को जो पत्र सौंपे गएथे, वो गुमनामी बाबा ने 1962 से 1982के बीच पवित्र मोहन रॉय को लिखे थे।

रॉय आजाद हिंद फौज (आईएनए) में काम कर चुके थे। हालांकि मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में खासतौर पर एक पूरा चैप्टर गुमनामी बाबा के बारे में लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि जब गुमनामी बाबा की लिखावट को फौरेंसिक और हस्तलेखन विशेषज्ञों के पास भेजा गया तो एक को छोड़कर सभी ने कहा कि नेताजी और गुमनामी बाबा की लिखावट में अंतर है।

मुखर्जी आयोग ने भी माना कि गुमनामी बाबा नेताजी नहीं थे। उसके बारे में आयोग ने कई कारण दिए थे। उसमें दो तीन बड़े कारण ये हैं,जिसका जिक्र जस्टिस मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में किया।

1- बाबा को करीब से जानने वाले लोग स्वर्गवासी हो चुके हैं, अत: वे गवाही के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते।
2- बाबा का कोई छायाचित्र उपलब्ध नहीं है।
3- सरकारी फोरेंसिक लैब ने उनके 'हस्तलेख और 'दाँतों की DNA जांच की रिपोर्ट ऋणात्मक दी है। यानि दोनों रिपोर्ट्स में कहा गया है कि वो नेताजी से मेल नहीं खातीं।

2013 में उत्तर प्रदेश सरकार जस्टिस विष्णु सहाय जांच आयोग का गठन किया। इसका उद्देश्य था कि आयोग पता लगाए कि गुमनामी बाबा कौन थे और उनका नेताजी सुभाष चंद्र बोस से क्या रिश्ता था। सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार के सामने पेश कर दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि बेशक नेताजी और गुमनामी बाबा में काफी समानताएं हैं, लेकिन इससे ये नहीं कहा जा सकता कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। हालांकि ये रिपोर्ट काफी गोलमोल किस्म की है।
(पत्रकार संजय श्रीवास्तव की किताब "सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा" के अंश से)

Updated on:
23 Jan 2026 02:52 pm
Published on:
23 Jan 2026 09:09 am
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