हिमालय में बर्फबारी के साथ मानसून के बारिश में कमी आएगी तो मैदानी इलाकों की नदियों के अस्तित्व पर खतरा और बढ़ जाएगा। आईएमडी ने वर्ष 2026 में मानसून की बारिश में कमी रहने की आशंका जताई है। इसके साथ ही जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट से भी जल संकट के गहराने के संकेत मिल रहे हैं। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Water Crisis in India: हिमालय में बर्फबारी की कमी (Shortage of Snowfall in Himalaya) से पर्यावरण का संकट गहराता जा रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों से 12 नदी बेसिनों को पानी मिलता है। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में बर्फबारी के साथ यदि मानसून की बारिश (Monsoon Rain Shortage) में कमी आएगी तो मैदानी इलाकों की नदियों के अस्तित्व पर खतरा और बढ़ जाएगा। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जल निकायों (Water Bodies Lost in Bihar And Delhi) में विशेषकर बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में लगातार कमी आ रही है। वहीं आईएमडी की रिपोर्ट (IMD Prediction for Monsoon 2026) में इस वर्ष मानसून सामान्य से 8 फीसदी कम रहने का अनुमान है। जाहिर सी बात है कि इससे जल संकट को गति मिलेगी।
जल शक्ति मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष असम, बिहार, दिल्ली, लद्दाख और सिक्किम के लिए कराए गए जल निकायों की दूसरी जनगणना के अनुसार, बिहार में 2018-19 में दर्ज 45,793 जल निकायों में से अब केवल 36,856 ही मौजूद हैं। करीब 9,000 जल निकाय गायब हो चुके हैं।
जनगणना के अनुसार, इन जल निकायों में से 45 प्रतिशत बिहार सरकार के स्वामित्व में हैं। हालांकि राज्य के राजस्व और भूमि सुधार विभाग के पास यह जानकारी नहीं है कि इनमें से कितने अतिक्रमण के शिकार हैं। वर्ष 2023 में पटना उच्च न्यायालय के एक आदेश में कहा गया था कि राज्य में राज्य में 1,045 तालाब अतिक्रमण के शिकार हुए हैं। हालांकि, भू-माफिया का जल निकायों पर अतिक्रमण पूरे देश में ही कमोबेश एक जैसा ही है। हाल ही में बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सार्वजनिक जल निकायों के गायब होने के सवाल पर, राजस्व और भूमि सुधार मंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि केवल पांच तालाबों पर ही अतिक्रमण हुआ है।
जनगणना से पता चलता है कि बिहार में 85 प्रतिशत जल निकाय ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इनमें से लगभग 91 प्रतिशत तालाब हैं, जबकि बाकी झीलें, टैंक, जलाशय, चेक डैम और परकोलेशन डैम हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में बिहार में 35,027 तालाब थे, जिनमें से अब केवल 33,618 बचे हैं। यानी 1,409 पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
बिहार में टैंकों की संख्या 4,221 से घटकर 859 रह गई है, झीलें 2,693 से घटकर 258 हो गई हैं, और जलाशय 2,156 से घटकर 315 रह गए हैं। राज्य के कुल जल निकायों में से सबसे अधिक (40.4 प्रतिशत) पंचायतों के पास हैं, इसके बाद राज्य जल संसाधन विभाग/सिंचाई विभाग (22.3 प्रतिशत) का स्थान है।
जल शक्ति मंत्रालय की जल निकायों की दूसरी जनगणना में दिल्ली का डेटा एक अलग और चिंताजनक कहानी कहता है। यहां गिनती में जल निकायों की संख्या तो 893 है, लेकिन इनमें से अधिकांश या तो सूख चुके हैं या अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। दरअसल, दिल्ली में तेजी से बढ़ती चली गई आबादी ने शहरीकरण को विस्तार दिया और इसके चलते यहां के पारंपरिक जल निकायों को नष्ट कर दिया गया। यहां के कई जल निकाय कचरा और सीवेज में तब्दील हो चुके हैं। दिल्ली का उदाहरण दिखाता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं रखा गया। दिल्ली में पिछले दो दशकों में रोहिणी, द्वारका और नई बसावटों में भी कई तालाबों में बरसात के दिनों का जल इकट्ठा करने और भूजल रिचार्ज (Groundwater Recharge) करने के काम आते थे, अब वहां मॉल या अपार्टमेंट बन चुके हैं।
पर्यावरण के जानकार और 'जल, थल, मल' पुस्तक के लेखक सोपान जोशी दिल्ली की यमुना नदी को 'काली नाग' यानी ज़हरीली मानते हैं। दिल्ली के लोग कालिया नाग हैं जो सीवर का पानी यमुना में डाल रहे हैं। वह चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं कि यमुना शहर के सीवर और कचरे से मर रही है। वे बताते हैं कि वजीराबाद के बाद यमुना का पानी पूरी तरह काला हो जाता है, क्योंकि दिल्ली अपना सारा मलमूत्र उसमें डाल देती है।
वह बताते हैं कि दिल्ली में 22 किलोमीटर की यमुना का पानी वजीराबाद बांध पर ऊपर जहां हरा और नीला दीखता है, वहीं से यमुना का सारा पानी दिल्ली निकाल लेती है और मलमूत्र मिला हुआ अपना सारा सीवर उसके ठीक नीचे यमुना में ही मिला देती है, कभी इसी जगह पर साही नाम की एक बहुत पुरानी नदी आकर यमुना से मिलती थी, गूगल मैप पर आज भी देखिये तो वजीराबाद के ऊपर का पानी हर नीला है और उसके नीचे का पानी काला है।
इस बारे में'आज भी खरे हैं तालाब' के लेखक अनुपम मिश्र इन पंक्तियों के लेखक से कई बार देश के गायब हो रहे तालाबों के बारे में चिंता जाहिर करते हुए कहते थे- 'आजादी मिलने के बाद देश के हर राज्य में तालाब या पारंपरिक पानी के प्रबंधन व्यवस्था नष्ट की गई है। अकेले राजधानी दिल्ली में ही 350-400 बड़े तालाब थे, लेकिन अब चार भी ढूंढ़ने पर नहीं मिलते हैं। आखिर, तालाब कहां गायब हो गए? इसपर ठहरकर समाज को सोचना होगा। क्या उन तालाबों को दिल्ली की जमीन निगल गई?'
हिमालय में साल दर साल सर्दियों में बर्फबारी में कमी दर्ज की जा रही है। इससे हमारे ऊपर क्या संकट आएगा? इस सवाल के जवाब में नेटवर्क साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल, एसएनडीआरपी से जुड़े हिमांशु ठाकुर ने पत्रिका से बताया, 'हिमालय में बर्फबारी कम होने से बर्फ के स्टॉक में लगातार कमी आ रही है। इसका असर यह होगा कि गर्मी के दिनों की संख्या में लगातार इजाफा होगा। गर्मी की तीव्रता बढ़ेगी। मतलब लू के दिनों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। बर्फ कम होने से ग्लेशियर पिघलने की दर कम होती चली जाएगी और नतीजा यह होगा कि गर्मियों में नदियों को जल मिलना बंद हो जाएगा। इससे भूजल में कमी आएगी और खेतों की सिंचाई के लिए पानी कम पड़ जाएगा। पेयजल संकट भी गहराएगा।'
वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय ने पत्रिका से बताया, 'हिमपात में कमी आना गंभीर चिंता की बात है लेकिन इससे 25-50 सालों में फर्क नहीं पड़ने वाला। लेकिन, हिमपात की कमी मानसून पर प्रभाव डालती है तो तबाही मचेगी। धरती पर मानसून ही पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। करीब 80 फीसदी पानी मानसून से हासिल होता है।'
गौरतलब है कि आईएमडी की ताजी रिपोर्ट में यह बताया गया है कि अल नीनो प्रभाव के चलते 2026 में मानसून सामान्य से 8 फीसदी कम रह सकता है। इसके चलते मध्य भारत, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में खेती प्रभावित हो सकती है।