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Doctor Shopping in India : भारत में ‘डॉक्टर शॉपिंग’ एक अनकहा संकट या बेहतर इलाज की तलाश?

Doctor Shopping: क्या आप भी बीमारी ठीक न होने पर तुरंत डॉक्टर बदल लेते हैं? सावधान! इसे 'डॉक्टर शॉपिंग' कहते हैं और यह आपकी सेहत और जेब दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। एक्सपर्ट्स से जानें, क्यों बार-बार डॉक्टर बदलना जानलेवा हो सकता है और कैसे ABHA कार्ड जैसे डिजिटल समाधान इस संकट को रोक सकते हैं।

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Apr 22, 2026

Doctor Shopping in India : स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभरी है 'डॉक्टर शॉपिंग' (Doctor Shopping)। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा जटिल है, यह व्यवहार न केवल मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है, बल्कि उनकी सेहत के लिए भी एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि डॉक्टर शॉपिंग क्या है, भारत में इसके पीछे के कारण क्या हैं, और इसके परिणाम कितने घातक हो सकते हैं।

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डॉक्टर शॉपिंग क्या है? (Understanding Doctor Shopping)

हम इसे आसान शब्दों में समझ सकते हैं। कोई मरीज जब अपनी एक ही बीमारी के लिए थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर कई अलग-अलग डॉक्टरों या स्वास्थ्य विशेषज्ञों के पास जाता है, तो इसे 'डॉक्टर शॉपिंग' कहा जाता है। अक्सर मरीज पहले डॉक्टर की सलाह से संतुष्ट नहीं होता, या उसे लगता है कि इलाज का असर तुरंत नहीं हो रहा, इसलिए वह दूसरे, तीसरे और फिर चौथे डॉक्टर के पास जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीज अक्सर नए डॉक्टर को अपने पिछले इलाज या दवाओं के बारे में पूरी जानकारी नहीं देता।

'सेकंड ओपिनियन' और 'डॉक्टर शॉपिंग' में अंतर

हमें इन दोनों के बीच के बारीक अंतर को समझना होगा

सेकंड ओपिनियन (Second Opinion): यह एक जागरूक प्रक्रिया है जहां मरीज किसी गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर या बड़ी सर्जरी) की पुष्टि के लिए दूसरे विशेषज्ञ की सलाह लेता है। इसमें मरीज पारदर्शी ( Transparency) होता है।

डॉक्टर शॉपिंग: यह अक्सर हताशा, अविश्वास या दवाओं के प्रति व्यसन (Addiction) के कारण किया जाता है। यहां मरीज जानकारी छुपाता है और बिना किसी ठोस योजना के डॉक्टर बदलता रहता है।

भारत में डॉक्टर शॉपिंग के पीछे के प्रमुख कारण

भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण यहां डॉक्टर शॉपिंग के कारण अन्य देशों से थोड़े अलग हैं।

धैर्य की कमी और 'इंस्टेंट रिलीफ' की चाहत : आज के दौर में हर कोई तुरंत परिणाम चाहता है। यदि बुखार दो दिन में ठीक नहीं हुआ, तो मरीज को लगता है कि डॉक्टर 'अक्षम' (Incapable Doctor) है। वे भूल जाते हैं कि शरीर को ठीक होने में समय लगता है।

डॉक्टरों पर अविश्वास (Lack of Trust) : चिकित्सा क्षेत्र के बढ़ते व्यवसायीकरण ने मरीजों के मन में डर पैदा कर दिया है। अनावश्यक टेस्ट और महंगी दवाइयों के डर से मरीज एक डॉक्टर की सलाह को संदिग्ध नजर से देखता है और 'सस्ते' या 'बेहतर' विकल्प की तलाश में भटकता रहता है।

डिजिटल रोल (The Role of Internet) : डिजिटल क्रांति के कारण हर मरीज 'डॉक्टर इंटरनेट' से अपनी बीमारी के लक्षण पहले ही सर्च कर लेता है। जब असली डॉक्टर की सलाह इंटरनेट की जानकारी से मेल नहीं खाती, तो मरीज को लगता है कि डॉक्टर गलत है।

रेफरल सिस्टम की कमी (Referal System) : विकसित देशों में आप सीधे विशेषज्ञ (Specialist) के पास नहीं जा सकते, आपको पहले फैमिली डॉक्टर (General Practitioner ) के पास जाना होता है। भारत में कोई भी मरीज सीधे न्यूरोलॉजिस्ट (Neurologist) या कार्डियोलॉजिस्ट (Cardiologist) के पास जा सकता है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

डॉक्टर शॉपिंग के जोखिम

यह व्यवहार केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि इसके परिणाम जानलेवा भी हो सकते हैं ।

ड्रग इंटरेक्शन (Drug Interaction) :जब आप अलग-अलग डॉक्टरों से मिलते हैं, तो वे अपनी पसंद की दवाएं लिखते हैं। यदि आपने पिछले डॉक्टर की दवा की जानकारी नहीं दी, तो दो अलग-अलग ब्रांड की दवाएं शरीर के अंदर जाकर जहरीली प्रतिक्रिया कर सकती हैं।

एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antibiotic Resistance) : भारत में यह एक बड़ी समस्या है। मरीज एक डॉक्टर का कोर्स अधूरा छोड़कर दूसरे के पास जाता है, जो नया एंटीबायोटिक शुरू कर देता है। इससे शरीर में बैक्टीरिया उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) हो जाते हैं, और भविष्य में साधारण संक्रमण भी लाइलाज हो सकता है।

आर्थिक नुकसान ( Financial Crises) : हर नया डॉक्टर नई कंसल्टेशन फीस लेगा और अक्सर वही लैब टेस्ट दोबारा करवाने को कहेगा जो आप पहले करवा चुके हैं। इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च (Out-of-pocket expenditure) बेतहाशा या ज्यादा बढ़ जाता है।

मेडिकल हिस्ट्री का अभाव ( Medical History) : इलाज के लिए मरीज की मेडिकल हिस्ट्री (पुरानी बीमारियों का रिकॉर्ड) सबसे महत्वपूर्ण होती है। बार-बार डॉक्टर बदलने से कोई भी डॉक्टर आपकी स्थिति को गहराई से नहीं समझ पाता, जिससे गलत निदान (Misdiagnosis) की संभावना बढ़ जाती है।

क्या इन समस्याओं का डिजिटल समाधान हो सकता है?

भारत सरकार और निजी क्षेत्र अब इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। डिजिटल इंडिया के तहत कुछ ऐसे समाधान आए हैं जो डॉक्टर शॉपिंग को नियंत्रित कर सकते हैं।

ABHA (Ayushman Bharat Health Account): यह भारत सरकार की एक क्रांतिकारी पहल है। इसके तहत हर नागरिक का एक डिजिटल हेल्थ आईडी कार्ड (Digital Health Card) होगा, जिसमें मरीज की सारी मेडिकल हिस्ट्री, टेस्ट रिपोर्ट और दवाओं का विवरण होगा। यदि मरीज डॉक्टर बदलता भी है, तो नया डॉक्टर पुराने रिकॉर्ड्स को तुरंत देख सकेगा।

टेलीमेडिसिन (Telemedicine) : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अब मरीज अपने रिकॉर्ड्स एक ही जगह स्टोर कर सकते हैं और विशेषज्ञों से परामर्श ले सकते हैं, जिससे अनावश्यक भागदौड़ कम होती है।

ई-प्रिस्क्रिप्शन (E-prescription) : डिजिटल पर्चे होने से दवाओं की डुप्लीकेसी (Duplication) को ट्रैक करना आसान हो जाता है।

एक जिम्मेदार मरीज कैसे बनें?

डॉक्टर शॉपिंग की आदत को छोड़कर एक सही 'हेल्थकेयर जर्नी' अपनाने के लिए इन सुझावों का पालन करें।

कम्युनिकेशन (Communication) : अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें। यदि दवा असर नहीं कर रही, तो उन्हें बताएं बजाय इसके कि आप बिना बताए डॉक्टर बदल लें।

पुराने रिकॉर्ड साथ रखें: डॉक्टर के पास हमेशा अपनी पुरानी फाइल, रिपोर्ट्स और दवाओं के रैपर साथ ही जाएं।

धैर्य रखें (Patience): पुरानी बीमारियों (Diabetes, Hypertension, Arthritis) के इलाज में समय लगता है। इस तरह की बीमारियों में रातों-रात चमत्कार की उम्मीद न करें।

फैमिली डॉक्टर की परंपरा: एक स्थायी फैमिली डॉक्टर रखें जो आपकी पूरी फैमिली हिस्ट्री को जानता हो। वे आपको बेहतर गाइड कर सकते हैं कि आपको विशेषज्ञ की जरूरत है या नहीं।

डॉ. मिहिर थानवी के साथ पत्रिका की खास बातचीत

डॉक्टर शॉपिंग, 'सेकंड ओपिनियन' लेने जैसा है या उससे कुछ अलग?

पत्रिका के साथ बात करते हुए डॉ. मिहिर ने बताया कई बार मरीज हमारे पास आते है और उसके पास पहले से ही चार अलग-अलग डॉक्टरों के पर्चे होते हैं। इसी स्थिति को हम 'डॉक्टर शॉपिंग' कहते हैं। सरल भाषा में कहें तो, जब कोई मरीज एक ही स्वास्थ्य समस्या के लिए, बहुत कम समय के भीतर, बिना किसी ठोस कारण के एक के बाद एक कई डॉक्टरों को बदलता है, तो इसे डॉक्टर शॉपिंग कहा जाता है। इसमें अक्सर मरीज का उद्देश्य सही इलाज पाना कम और अपनी पसंद का 'डायग्नोसिस' या 'दवाई' पाना ज़्यादा होता है। अगर किसी मरीज को कैंसर जैसी बड़ी बीमारी बताई गई है या किसी बड़े ऑपरेशन (सर्जरी) की सलाह दी गई है, तो वह पुष्टि के लिए किसी दूसरे विशेषज्ञ के पास जाता है। यहां मरीज पारदर्शी होता है वह दूसरे डॉक्टर को बताता है कि पहले डॉक्टर ने क्या कहा और वह क्या दवा ले रहा है। यह मरीज का अधिकार है और एक डॉक्टर के तौर पर हम भी इसकी सराहना करते हैं।

भारत में लोग एक ही बीमारी के लिए बार-बार डॉक्टर क्यों बदलते हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वजहों का मिश्रण है।

धैर्य की कमी और 'क्विक फिक्स' (The 'Quick Fix' Mentality) : भारत में लोग चाहते हैं कि आज दवाई खाई और कल बीमारी जड़ से खत्म हो जाए। खासकर सर्दी, जुकाम या बदन दर्द जैसी छोटी बीमारियों में भी लोग दो दिन से ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते। अगर तीसरे दिन आराम नहीं मिला, तो वे मान लेते हैं कि 'डॉक्टर साहब की दवाई सूट नहीं कर रही' और तुरंत दूसरे डॉक्टर की तलाश शुरू कर देते हैं। वे यह नहीं समझते कि शरीर को रिकवर होने में समय लगता है।

'जादुई राहत' की तलाश (Can Pill creates Magic Effect) : कई बार मरीज ऐसे डॉक्टर के पास जाना पसंद करते हैं जो भारी स्टेरॉयड या बहुत तेज एंटीबायोटिक्स दे देते हैं जिससे तुरंत आराम मिल जाता है। जब एक ईमानदार डॉक्टर धीरे-धीरे और सही तरीके से इलाज करने की कोशिश करता है, तो मरीज को लगता है कि इलाज असरदार नहीं है। वे उस 'चमत्कार' की तलाश में डॉक्टर बदलते रहते हैं।

अविश्वास और 'कट-प्रैक्टिस' का डर (Erosion of Trust) :आजकल स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते खर्च और कुछ अस्पतालों की 'अनावश्यक टेस्ट' वाली छवि ने मरीजों के मन में डर पैदा कर दिया है। मरीज को जब भी कोई महंगा टेस्ट लिखा जाता है, तो उसे लगता है कि डॉक्टर कमीशन कमा रहा है। इसी अविश्वास (Trust Deficit) के कारण वह दूसरे डॉक्टर के पास जाकर रेट और सलाह 'क्रॉस-चेक' करना चाहता है।

अलग-अलग डॉक्टरों से दवाइयां लेने पर 'ड्रग इंटरेक्शन' (दवाओं का आपस में बुरा असर) का कितना खतरा रहता है?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा जब आप एक डॉक्टर को यह बताए बिना कि आप दूसरे डॉक्टर की दवा ले रहे हैं, नई दवाएं शुरू करते हैं, तो आपके शरीर के भीतर एक रासायनिक युद्ध (Chemical War) शुरू हो सकता है। दवाएं शरीर में जाकर आपस में प्रतिक्रिया करती हैं। इसे हम तीन तरह से देखते हैं।

प्रभाव का खत्म होना: एक दवा दूसरी दवा के असर को शून्य कर देती है। यानी आप दवाई तो खा रहे हैं, पर वह शरीर पर काम ही नहीं कर रही।

प्रभाव का खतरनाक रूप से बढ़ जाना: दो दवाएं मिलकर शरीर पर इतना तेज़ असर करती हैं कि वह 'टॉक्सिक' (जहरीला) हो जाता है।

नए साइड इफेक्ट्स: दो सुरक्षित दवाएं मिलकर एक तीसरा ऐसा रसायन बना सकती हैं जो आपके किसी अंग, जैसे किडनी या लिवर को तुरंत नुकसान पहुंचाए।

इसके प्रमुख खतरे क्या हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा इंटरनल ब्लीडिंग (आंतरिक रक्तस्राव): मान लीजिए आप एक डॉक्टर से खून पतला करने की दवा ले रहे हैं और दूसरे डॉक्टर ने आपको बिना जाने कोई दर्द निवारक (Painkiller) दे दी। इन दोनों का मेल पेट में ब्लीडिंग शुरू कर सकता है, जो कई बार जानलेवा साबित होता है।

किडनी और लिवर फेलियर: हमारी किडनी और लिवर ही दवाओं को प्रोसेस करते हैं। जब उन पर अलग-अलग डॉक्टरों द्वारा दी गई दवाओं का भारी ओवरलोड पड़ता है, तो वे काम करना बंद कर सकते हैं।

हार्ट रिदम में गड़बड़ी: कुछ एंटीबायोटिक्स और मानसिक रोगों की दवाएं अगर साथ ले ली जाएं, तो दिल की धड़कन अचानक अनियंत्रित हो सकती है।

डॉ. जितेंद्र गोस्वामी के साथ पत्रिका की खास बातचीत

क्या बार-बार डॉक्टर बदलने से मरीज की मेडिकल हिस्ट्री खराब हो सकती है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा भारत के ज्यादातर लोग डॉक्टर क्यो बदलते है] यह जानना ज्यादा जरुरी है। पहला रीज़न Communication barrier (संचार बाधाएं) , दूसरा सोशल मीडिया। लोग सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी प्राप्त करके खुद ही डॉक्टर बन जाते है। जागरुकता सही दिशा में होनी बहुत जरुरी है। बार-बार डॉक्टर बदलना आपकी 'मेडिकल लाइफ लाइन' को काट देने जैसा है। मेडिकल हिस्ट्री कोई कागज़ का टुकड़ा नहीं है, यह आपकी सेहत की कहानी है।

  • 'निरंतरता' (Continuity of Care) का टूटना: इलाज केवल लक्षणों को दबाना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि समय के साथ आपका शरीर दवाओं पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है। जब आप एक ही डॉक्टर के पास रहते हैं, तो उसे पता होता है कि छह महीने पहले आपकी स्थिति क्या थी और आज क्या है। जब आप नया डॉक्टर चुनते हैं, तो वह 'शून्य' से शुरू करता है। उसे आपके शरीर के उन उतार-चढ़ावों का पता नहीं होता जो पिछले डॉक्टर ने नोट किए थे।
  • गलत निदान (Wrong diagnosis) का खतरा: कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो 'पैटर्न' दिखाती हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, डॉक्टर समझ पाता है कि यह साधारण दर्द है या किसी बड़ी बीमारी का संकेत। आप जब बार-बार डॉक्टर बदलते हैं, तो कोई भी डॉक्टर उस पैटर्न को नहीं पकड़ पाता। हर नया डॉक्टर आपको केवल 'तात्कालिक लक्षणों' के आधार पर देखता है, जिससे असली बीमारी (Root Cause of Disease) छुप जाती है।
  • 'ट्रायल एंड एरर' का अंतहीन चक्र : एक डॉक्टर ने आपको एक दवा दी जिससे आपको एलर्जी हो गई। आपने डॉक्टर बदल दिया और नए डॉक्टर को यह नहीं बताया। अब नया डॉक्टर अनजाने में फिर से वही या वैसी ही दवा दे सकता है। यानी आप उसी 'ट्रायल एंड एरर' (Trial and Error) के चक्र में फंस जाते हैं जिससे आप पहले ही गुज़र चुके थे। आपकी मेडिकल हिस्ट्री 'खराब' होने का मतलब है कि आपके पुराने अनुभवों का लाभ नए इलाज को नहीं मिल पा रहा।
  • अनावश्यक टेस्ट और शारीरिक तनाव : जब पुराना रिकॉर्ड नहीं होता, तो नया डॉक्टर अपनी तसल्ली के लिए फिर से वही खून की जांचें, एक्स-रे या सीटी स्कैन लिखता है। इससे न केवल आपके शरीर पर रेडिएशन या इंजेक्शन का बोझ बढ़ता है, बल्कि रिपोर्ट आने तक इलाज में जो देरी होती है, वह आपकी बीमारी को और गंभीर बना सकती है।

Medical Extra Financial Burden: डॉक्टर शॉपिंग की वजह से मरीज पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ कितना बढ़ जाता है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के तौर पर मैं इसे 'हिडन टैक्स' (Hidden Tax) कहता हूं जो मरीज अपनी ही गलतियों की वजह से भरता है। लोग सोचते हैं कि वे बेहतर इलाज की तलाश कर रहे हैं, लेकिन असल में वे एक वित्तीय दलदल में फंसते चले जाते हैं। इसे हम कुछ बिंदुओं से समझ सकते हैं।

  • कंसल्टेशन फीस का दोहराव (Repeated Consultation Fees) : यह सबसे प्रत्यक्ष खर्च है। भारत में एक अच्छे विशेषज्ञ की फीस 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक हो सकती है। जब आप एक ही समस्या के लिए महीने भर में चार डॉक्टरों के पास जाते हैं, तो आप केवल 'परामर्श' पर ही 2000-8000 रुपये खर्च कर देते हैं। अगर आप एक ही डॉक्टर के पास 'फॉलो-अप' के लिए जाते, तो शायद आपको आधी फीस देनी पड़ती या वह भी नहीं देनी पड़ती।
  • लैब टेस्ट का बोझ (The Burden of Redundant Tests) : आप जब भी नए डॉक्टर के पास जाते हैं, वह अपनी तसल्ली के लिए और स्थिति को नए सिरे से समझने के लिए फिर से वही बेसिक टेस्ट (जैसे खून की जांच, यूरिन टेस्ट, एक्स-रे) लिखता है। मरीज को लगता है कि पुराने टेस्ट तो अभी हफ्ते भर पहले ही हुए हैं, लेकिन नया डॉक्टर पिछले डॉक्टर की लैब की गुणवत्ता या रिपोर्ट की टाइमिंग पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाता। इससे वही टेस्ट बार-बार होते हैं और बिल बढ़ता चला जाता है।
  • 'दवाओं का ढेर' और बर्बादी (Wastage of Medicines) : डॉक्टर बदलने पर अक्सर पिछले डॉक्टर की लिखी गई दवाइयां इस्तेमाल में नहीं आती हैं, क्योंकि नया डॉक्टर नई दवाइयां लिखता है। अधूरे इस्तेमाल में लाए गए दवाइयों के पत्तों को केमिस्ट वापस लेने में आनाकानी करता है। बीपी और शूगर की दवाइयां वापस लेने से केमिस्ट साफ मना कर देता है। इस तरह घर में दवाइयों का ढेर इक्कठा होता जाता है। पुराने डॉक्टर की लिखी दवाइयां एक्सपायर हो जाती हैं और मरीज का पैसा बर्बाद हो जाता है। यह मरीज का सीधा आर्थिक नुकसान है।

क्या भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में 'रेफरल सिस्टम' (Referral System) की कमी डॉक्टर शॉपिंग को बढ़ावा देती है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा अगर हम विकसित देशों (जैसे UK या अमेरिका) की तुलना भारत से करें, तो वहां 'गेटकीपिंग' (Gatekeeping) का एक सिस्टम है। भारत में इस सिस्टम की कमी है।

  • सीधे विशेषज्ञ के पास पहुंचने की आज़ादी (Direct Access to Specialists) : भारत में कोई भी मरीज जिसे सिरदर्द है, वह सीधे एक टॉप न्यूरोलॉजिस्ट के पास अपॉइंटमेंट ले सकता है। विकसित देशों में आपको पहले अपने 'जनरल फिजिशियन' (GP) या फैमिली डॉक्टर के पास जाना होता है। वही तय करता है कि आपको विशेषज्ञ की ज़रूरत है या नहीं। भारत में यह 'फिल्टर' गायब है।
  • जनरल फिजिशियन' की भूमिका का कम होना : आजकल समाज में यह धारणा बन गई है कि 'जनरल फिजिशियन' तो सिर्फ बुखार की दवा देता है। लोग इसे छोटा डॉक्टर समझने लगे हैं। सच्चाई यह है कि एक अच्छा फैमिली डॉक्टर मरीज की पूरी हिस्ट्री जानता है और उसे डॉक्टर शॉपिंग से बचा सकता है। रेफरल सिस्टम की कमी ने फैमिली डॉक्टर की इस 'परामर्शदाता' (Consultant) वाली भूमिका को खत्म कर दिया है।
  • दिशा-निर्देशों का अभाव (Lack of Navigation) : जब मरीज को यह नहीं पता होता कि उसे किस विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए, तो वह दिशाहीन हो जाता है। उदाहरण के लिए, कमर दर्द के लिए कोई मरीज ऑर्थोपेडिक के पास जाता है, तो कोई न्यूरोसर्जन के पास, और कोई फिजियोथेरेपिस्ट के पास। अगर एक तय रेफरल सिस्टम होता, तो उसे सही दिशा दिखाई जाती। मार्गदर्शन की इसी कमी के कारण मरीज एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक भटकता रहता है।
  • रिकॉर्ड शेयरिंग की कमी : एक आदर्श रेफरल सिस्टम में, जब एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर को मरीज भेजता है, तो वह उसकी सारी रिपोर्ट्स और पुरानी हिस्ट्री भी साझा करता है। भारत में चूंकि कोई औपचारिक सिस्टम नहीं है, इसलिए मरीज हर बार एक 'नया केस' बनकर नए डॉक्टर के पास पहुंचता है। पिछला डेटा साझा न होने के कारण डॉक्टर भी उसे नए सिरे से 'शॉपिंग' कराने पर मजबूर हो जाते हैं।

क्या इंटरनेट और गूगल (Self-diagnosis) की वजह से लोग डॉक्टरों की सलाह पर कम भरोसा कर रहे हैं?

इस सवाल के जवाब में उन्होनें कहा डॉक्टर शॉपिंग' भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसके पीछे धैर्य की कमी, इंटरनेट का आधा-अधूरा ज्ञान (गूगल डायग्नोसिस) और डॉक्टरों के प्रति घटता विश्वास मुख्य कारण हैं। भारत में एक मजबूत 'रेफरल सिस्टम' (जैसे फैमिली डॉक्टर की अनिवार्य सलाह) की कमी मरीजों को बिना किसी मार्गदर्शन के सीधे विशेषज्ञों के पास भटकने के लिए उकसाती है। इसका सबसे घातक परिणाम 'ड्रग इंटरेक्शन' है। अलग-अलग डॉक्टरों की दवाएं आपस में मिलकर अंगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके अलावा, बार-बार डॉक्टर बदलने से मरीज की मेडिकल हिस्ट्री बिखर जाती है, जिससे सही इलाज में देरी और गलत निदान का खतरा बढ़ जाता है। आर्थिक रूप से भी यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालता है, क्योंकि मरीज को बार-बार परामर्श शुल्क और लैब टेस्ट के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

भारत में 'डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स' (जैसे ABHA कार्ड) डॉक्टर शॉपिंग की समस्या को कम करने में मदद कर सकते हैं?

उन्होंने कहा, एक डॉक्टर के तौर पर मैं ABHA (Ayushman Bharat Health Account) और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स को भारतीय स्वास्थ्य सेवा के इतिहास में एक 'गेम चेंजर' के रूप में देखता हूं। डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स उस 'अंधेरे' को खत्म कर देंगे, जिसमें मरीज और डॉक्टर दोनों अब तक भटक रहे थे। डॉक्टर शॉपिंग की समस्या अक्सर 'छिपाई गई जानकारी' से पैदा होती है, और तकनीक इसी पारदर्शिता (Transparency) को वापस लाएगी।

क्या डॉक्टरों को मरीज के पुराने पर्चे (Prescriptions) देखने के लिए अधिक सख्ती बरतनी चाहिए?

हां, डॉक्टरों को पुराने पर्चे देखने में सख्ती बरतनी चाहिए, क्योंकि यह 'मरीज की सुरक्षा' से जुड़ा मामला है। जब तक डॉक्टर को पिछली दवाओं की जानकारी नहीं होगी, तब तक ड्रग इंटरेक्शन (दवाओं का आपसी रिएक्शन) का खतरा बना रहता है। सख्ती का मतलब मरीज को डांटना नहीं, बल्कि उसे यह समझाना है कि पुराने रिकॉर्ड के बिना नया इलाज 'अंधेरे में तीर चलाने' जैसा है।

  • 'डॉक्टर गूगल' का प्रभाव (Influence of Self-Diagnosis) : आजकल मेरे केबिन में आने से पहले ही मरीज अपनी बीमारी गूगल कर चुका होता है। अगर डॉक्टर की बताई बात उसके 'गूगल ज्ञान' से मेल नहीं खाती, तो उसे लगता है कि डॉक्टर को कम जानकारी है। इंटरनेट ने लोगों को जिज्ञासु तो बनाया है, लेकिन साथ ही उन्हें भ्रमित और बेचैन भी कर दिया है।
  • सामाजिक दबाव और 'सिफारिश' (Word of Mouth) : भारत में पड़ोसी और रिश्तेदार सबसे बड़े सलाहकार होते हैं। आप एक डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं, तभी कोई परिचित आकर कह देगा 'अरे, उनके पास क्यों गए? फलाने डॉक्टर तो हाथ लगाते ही बीमारी पकड़ लेते हैं। बस, यहीं मरीज का भरोसा डगमगा जाता है और वह अपनी पूरी फाइल लेकर नए डॉक्टर के पास पहुंच जाता है।
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