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क्या आपके कपड़े ही आपकी त्वचा के दुश्मन हैं ? जानें ‘Textile Dermatitis’ का सच ?

Textile Dermatitis: अक्सर हम फैशन के चक्कर में 'टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस' को दावत दे बैठते हैं। नए कपड़ों की डाई, सिंथेटिक फैब्रिक और केमिकल फिनिशिंग आपकी स्किन पर लाल चकत्ते और खुजली की वजह बन सकते हैं। डॉ. पुनीत अग्रवाल से जानिए कैसे आपका पसंदीदा आउटफिट आपकी स्किन के लिए 'साइलेंट किलर' हो सकता है और इससे कैसे बचा जा सकता है।

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Apr 11, 2026

Textile Dermatitis: फैशन के इस दौर में हम अक्सर कपड़ों का रंग, डिजाइन और फिटिंग तो देखते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि वही कपड़ा हमारी त्वचा के लिए कितना सुरक्षित है। क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि नया सूट या टाइट जींस पहनने के बाद शरीर पर लाल चकत्ते पड़ गए हों या अचानक खुजली शुरू हो गई हो? अगर हां, यह सामान्य खुजली नहीं बल्कि 'टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस' हो सकती है। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों हमारे पसंदीदा कपड़े कभी-कभी हमारी त्वचा के लिए 'जहर' बन जाते हैं।

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What is Textile Dermatitis: क्या है टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस?

टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस त्वचा की एक ऐसी स्थिति है जिसमें कपड़ों के सीधे संपर्क में आने से जलन, खुजली या सूजन होने लगती है। आसान शब्दों में कहें तो यह कपड़ों के रेशों या उनमें मौजूद रसायनों से होने वाली एलर्जी है। डिजिटल युग में जहां हम ऑनलाइन शॉपिंग के जरिए नए-नए फैब्रिक ट्राई कर रहे हैं, वहां इस बीमारी के बारे में जानना बहुत जरूरी हो गया है। यह एलर्जी दो कारणों से हो सकती है

  • कपड़ों के रेशें जैसे ऊन (Wool) या सिंथेटिक फाइबर (Synthetic Fibre )।
  • कपड़ों को रंगने के लिए इस्तेमाल होने वाली डाई, फिनिशिंग एजेंट और ग्लू (Glue)।

इसके मुख्य लक्षण क्या है?

  • त्वचा पर लाल दाने या चकत्ते पड़ना।
  • तेज खुजली होना।
  • त्वचा का रूखा और पपड़ीदार हो जाना।
  • गंभीर मामलों में त्वचा पर छोटे-छोटे छाले या सूजन आना।
  • शरीर के उन हिस्सों पर ज्यादा असर होना, जहां पसीना ज्यादा आता है (जैसे बगल, घुटने के पीछे या कमर)।

कपड़ों में छिपे 'साइलेंट किलर'

  • हर कपड़ा हर किसी के लिए बुरा नहीं होता, लेकिन कुछ फैब्रिक एलर्जी के लिए बदनाम हैं।
  • ऊन से बने कपड़े या ऊनी रेशे प्राकृतिक होने के बावजूद संवेदनशील त्वचा को बुरी तरह चुभ सकते हैं।
  • सिंथेटिक कपड़े जैसे पॉलिएस्टर, नायलॉन और रेयान पसीना नहीं सोखते, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं और खुजली होती है।
  • टाइट फिटिंग वाले कपड़े में स्किनी जींस या टाइट जिम वियर त्वचा से रगड़ खाते हैं, जिससे डर्मेटाइटिस का खतरा बढ़ जाता है।

बचाव के आसान तरीके

  • नया कपड़ा धोकर ही पहनें। नए कपड़ों में फिनिशिंग केमिकल्स और एक्स्ट्रा डाई होती है। पहनने से पहले एक बार धोने से ये निकल जाते हैं।
  • सूती (Cotton) और लिनन (Linen) जैसे प्राकृतिक रेशे त्वचा को 'सांस' लेने देते हैं और पसीना सोखते हैं।
  • गहरे रंगों के मुकाबले हल्के रंगों के कपड़ों में डाई का इस्तेमाल कम होता है।
  • पसीने और रगड़ को कम करने के लिए थोड़े ढीले कपड़े चुनें।

कपड़ों के वजह से त्वचा की एलर्जी के बारे में एसएमएस के सीनियर डॉ. पुनीत अग्रवाल से पत्रिका की खास बातचीत।

टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस सामान्य स्किन एलर्जी या एक्जिमा से कैसे अलग है? क्या इसके कोई विशिष्ट 'पैटर्न' होते हैं जिन्हें देखकर पहचाना जा सके?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर ने कहा कि सामान्य स्किन एलर्जी या जिसे हम 'एटोपिक एक्जिमा' कहते हैं, वह अक्सर जेनेटिक होती है या आपके शरीर के अंदरूनी इम्यून सिस्टम से जुड़ी होती है। लेकिन टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस पूरी तरह से 'बाहरी संपर्क' का मामला है। इसे पहचानने का सबसे आसान तरीका है 'रिएक्शन की जगह'। सामान्य एक्जिमा शरीर के किसी भी हिस्से में, खासकर कोहनी या घुटनों के अंदरूनी मोड़ पर हो सकता है। लेकिन टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस केवल वहीं होगा जहां कपड़ा आपकी त्वचा को सीधा छू रहा है। यहीं इसका सबसे बड़ा सबूत है।

आजकल 'जिम वियर' और 'स्पैन्डेक्स' (Spandex) का इस्तेमाल बढ़ा है। क्या पसीने और टाइट सिंथेटिक कपड़ों का मेल इस समस्या को गंभीर बना देता है?

जिम वियर या स्पैन्डेक्स को शरीर से चिपके रहने के लिए बनाया जाता है, ताकि वे शरीर को शेप दे सकें। लेकिन त्वचा के स्वास्थ्य के नजरिए से यह एक 'डेंजरस कॉम्बिनेशन' है। इसके पीछे तीन मुख्य वैज्ञानिक कारण हैं-

  • पसीने का ट्रैप (Sweat Trapping): सिंथेटिक कपड़े जैसे नायलॉन और स्पैन्डेक्स 'नॉन-ब्रीदेबल' होते हैं। यानी ये त्वचा को सांस नहीं लेने देते। जब आप वर्कआउट करते हैं और पसीना निकलता है, तो ये कपड़े उसे सोखने के बजाय त्वचा और कपड़े के बीच एक नमी की परत बना देते हैं। यह नमी कपड़ों में मौजूद रसायनों और डाई (Dye) को घोलने का काम करती है, जिससे वे त्वचा के अंदर आसानी से समा जाते हैं।
  • घर्षण (Friction): टाइट फिटिंग का मतलब है लगातार कपड़े में रगड़ लगना। जब आप दौड़ते हैं या एक्सरसाइज करते हैं, तो यह सिंथेटिक फाइबर त्वचा की ऊपरी परत (Epidermis) को छील देता है। इससे त्वचा का 'नेचुरल बैरियर' टूट जाता है और केमिकल्स सीधे अंदरूनी सेल्स तक पहुंचकर सूजन और खुजली पैदा करते हैं।
  • बैक्टीरियल ग्रोथ (Bacterial growth) : पसीना, गर्मी और रगड़ ये तीनों मिलकर बैक्टीरिया और फंगस को बढ़ाते हैं। यही कारण है कि जिम जाने वाले लोगों में केवल डर्मेटाइटिस ही नहीं, बल्कि 'फॉलिक्युलाइटिस' (बालों की जड़ों में संक्रमण) के मामले भी बहुत देखे जा रहे हैं।

क्या कुछ खास रंग (जैसे गहरा नीला या काला) अन्य रंगों की तुलना में अधिक एलर्जी पैदा करते हैं? इसके पीछे क्या वैज्ञानिक कारण है?

जी हां, यह पूरी तरह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। क्लिनिक में हमारे पास आने वाले टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस के 70-80% मामलों में देखा गया है यह गहरे रंग के कपड़ों की वजह से होता है। इसमें सबसे बड़ा विलेन का काम 'डिस्पर्स डाई' (Disperse Dyes) करता है।

इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को हम तीन बिंदुओं में समझ सकते हैं:

  • केमिकल बॉन्डिंग की कमी: हल्के रंगों (जैसे सफेद, क्रीम या पेस्टल शेड्स) में डाई की मात्रा बहुत कम होती है और वे रेशों के साथ मजबूती से जुड़े होते हैं। लेकिन गहरे रंगों (खासकर डिस्पर्स ब्लू 106 और 124) के कण कपड़े के रेशों के साथ ठीक से नहीं बंध पाते। वे कपड़े की सतह पर 'तैरते' रहते हैं।
  • पसीने के साथ रिएक्शन (Leaching): जब हम गहरे रंग के सिंथेटिक कपड़े पहनते हैं और हमें पसीना आता है, तो पसीना एक 'विलायक' (Solvent) का काम करता है। यह पसीना कपड़े से उस कच्ची डाई को खींचकर बाहर निकाल लेता है और डाई सीधे हमारी त्वचा के रोमछिद्रों (Pores) में समा जाती है। गहरा नीला , गहरा काला और सुर्ख लाल रंग इस मामले में सबसे ज्यादा 'लीचिंग' (रंग छोड़ना) करते हैं।
  • एज़ो डाई का खतरा (Azo Dyes): गहरे रंगों को पक्का करने के लिए अक्सर 'एज़ो डाई' का इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि जब यह डाई त्वचा के संपर्क में आती है, तो हमारे पसीने के बैक्टीरिया इसे तोड़कर 'एरोमैटिक एमाइन्स' में बदल देते हैं, जो न केवल एलर्जी करते हैं बल्कि लंबे समय में त्वचा के लिए बहुत हानिकारक भी हो सकते हैं।

जो लोग ऑफिस में पूरे दिन फॉर्मल (टाइट फिटिंग और सिंथेटिक मिक्स) कपड़े पहनते हैं, उनके लिए आपकी क्या सलाह है?

ऑफिस की 'ड्रेस कोड' अक्सर हमारी त्वचा की 'सांस' लेने की क्षमता को छीन लेती है। पूरे दिन बंद जूतों, टाइट कॉलर और सिंथेटिक ड्रेस में रहने से त्वचा पर 'क्रॉनिक इरिटेशन' (लगातार जलन) पैदा होती है।

जो लोग ऐसे कपड़े पहनते हैं, उनके लिए मेरी ये 4 मुख्य सलाह हैं

  • कभी भी सिंथेटिक या मिक्स फैब्रिक की शर्ट सीधे त्वचा पर न पहनें। उसके नीचे हमेशा 100% शुद्ध सूती (Cotton) बनियान या वेस्ट पहनें। यह सूती परत आपके पसीने को सोख लेगी और बाहर वाले फॉर्मल कपड़े की डाई और केमिकल्स को सीधे त्वचा के संपर्क में आने से रोकेगी। यह एक 'बफर ज़ोन' की तरह काम करता है।
  • जैसे हम काम के बीच में चाय का ब्रेक लेते हैं, वैसे ही त्वचा को भी 'एयर ब्रेक' दें। लंच टाइम में या जब आप अकेले केबिन में हों, तो अपने जूतों को थोड़ी देर के लिए उतारें और शर्ट के कफ या कॉलर के बटन खोल दें ताकि हवा का संचार हो सके।
  • पूरी तरह से पॉलिएस्टर या नायलॉन पहनने के बजाय 'कॉटन-ब्लेंड' चुनें। आजकल ऐसे फैब्रिक आते हैं जो फॉर्मल दिखते हैं लेकिन उनमें 60-70% कॉटन होता है। ये ऑफिस की लंबी सिटिंग के लिए सबसे बेहतर हैं।

डिटर्जेंट चुनते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि कपड़ों में जलन पैदा करने वाले तत्व न बचें?

यह एक बहुत ज़रूरी पॉइंट है। हम अक्सर 'सफेदी' और 'खुशबू' के पीछे भागते हैं, लेकिन त्वचा के लिए ये दोनों ही चीजें खतरनाक हो सकती हैं। जब हम कपड़े धोते हैं, तो डिटर्जेंट के कण कपड़े के रेशों के अंदर फंस जाते हैं। जब हम वह कपड़ा पहनते हैं और हमें पसीना आता है, तो वह पसीना उन रसायनों को फिर से सक्रिय कर देता है, जिससे 'डिटर्जेंट डर्मेटाइटिस होता है।

मेरी सलाह है कि डिटर्जेंट चुनते और इस्तेमाल करते समय इन 4 बातों का खास ख्याल रखें:

  • खुशबू और रंग से बचें : डिटर्जेंट को 'फ्रेश' खुशबू देने के लिए जो सिंथेटिक परफ्यूम मिलाए जाते हैं, वे एलर्जी का नंबर-1 कारण हैं। कोशिश करें कि 'फ्रेगरेंस-फ्री' और 'डाई-फ्री' (बिना रंग वाला) डिटर्जेंट चुनें।
  • लिक्विड डिटर्जेंट है बेहतर: पाउडर डिटर्जेंट के दाने अक्सर पूरी तरह नहीं घुलते और कपड़ों की सिलाई या रेशों में जमा रह जाते हैं। इसकी तुलना में 'लिक्विड डिटर्जेंट' पानी में आसानी से घुल जाते हैं और कपड़ों से पूरी तरह निकल जाते हैं, जिससे त्वचा पर जलन का खतरा कम हो जाता है।
  • 'एक्स्ट्रा रिंस' का नियम: चाहे आप हाथ से कपड़े धोएं या मशीन से, कपड़ों को कम से कम दो बार सादे पानी से ज़रूर निकालें। अगर पानी निकालने के बाद भी कपड़े में झाग या चिकनाहट दिख रही है, तो वह आपकी त्वचा के लिए 'ज़हर' का काम करेगा।

बच्चों के कपड़ों के लिए क्या अलग सावधानी चाहिए?

बच्चों की त्वचा वयस्कों की तुलना में 30% पतली होती है। उनके लिए हमेशा 'बेबी-सेफ' या 'हाइपोएलर्जेनिक' (Hypoallergenic) डिटर्जेंट का ही उपयोग करें। उनके कपड़ों में कभी भी 'ब्लीच' या कड़क 'नील' का इस्तेमाल न करें।

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