Chakravarti Rajagopalachari : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसी हफ्ते राष्ट्रपति भवन में सी. राजगोपालाचारी के प्रतिमा का अनावरण किया। आइए जानते हैं कि राजाजी का देश के लिए क्या योगदान रहा है। दलितों के मंदिरों में प्रवेश में उनकी क्या भूमिका रही? इसके साथ ही मंदिर में दलितों के प्रवेश के संघर्षों के बारे में भी पढ़िए।
Chakravarti Rajagopalachari : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) ने इस हफ्ते राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण में सी. राजगोपालाचारी (Chakravarti Rajagopalachari) की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा की जगह स्थापित की गई है। राजाजी के सामाजिक सुधार कार्यों में से एक दलितों के मंदिर में प्रवेश का पुरजोर समर्थन देना भी रहा है।
Dalit Entry History in Hindu Temple: अगस्त 1938 में एम.सी. राजाह (M. C. Rajah) द्वारा सामाजिक भेदभाव समाप्त करने के विधेयक का उन्होंने समर्थन किया। इस कानून ने रोजगार, कुओं, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों में भेदभाव को दंडनीय बनाया। राजाह वैद्यनाथ अय्यर ने मिलकर मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में 8 जुलाई 1939 को दलितों को प्रवेश दिलाया। उनके इस पहल का घनघोर सामाजिक विरोध हुआ। हालांकि इस साहसिक कदम को काफी सफलता भी मिली। इसके बाद मंदिर प्रवेश अधिकृत और क्षतिपूर्ति विधेयक लाया गया, जिसने अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की।
एम.सी. राजाह दक्षिण भारत के प्रमुख दलित नेता और सामाजिक सुधारक थे। वे मद्रास प्रेसीडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) से संबंधित थे और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति) के अधिकारों की आवाज़ को राजनीतिक मंच तक पहुंचाने वाले अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं। वे मद्रास विधान परिषद के सदस्य रहे और शिक्षा, रोजगार तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान अवसर की मांग करते रहे।
मंदिरों में दलितों के प्रवेश के प्रश्न पर राजाह की सोच बिल्कुल साफ थी। उनका कहना था कि मंदिरों में दलितों का प्रवेश कोई धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और समान नागरिक अधिकार का मुद्दा है। उन्होंने अगस्त 1938 में मद्रास प्रेसीडेंसी में एक विधेयक प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य दलितों पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंधों को समाप्त करना था। इस प्रस्ताव में सार्वजनिक स्थानों, कुओं, स्कूलों, रोजगार और धार्मिक स्थलों में भेदभाव को दंडनीय बनाने की बात की गई थी। उस समय के प्रीमियर सी. राजागोपालचारी (C. Rajagopalachari) ने इस पहल का समर्थन किया।
राजाह ने मंदिर प्रवेश को सामाजिक समानता की दिशा में एक निर्णायक कदम माना। उन्होंने यह तर्क दिया कि यदि दलितों को मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता है, तो यह उन्हें समाज से अलग-थलग रखने का प्रतीक है। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप मद्रास प्रेसीडेंसी में मंदिर प्रवेश और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी कदम उठाए गए। यद्यपि उन्हें कई बार निराशा और विरोध का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा। राजाह ने दलितों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण विधायी और राजनीतिक पहल की, जिसने आगे चलकर व्यापक सामाजिक सुधार आंदोलनों को मजबूती प्रदान की।
सी. राजगोपालाचारी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से राजाजी या सीआर कहा जाता है, का जन्म दिसंबर 1878 में तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी) के कृष्णगिरि जिले के थोरापल्ली गांव में एक तमिल भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता उन्हें “राजन” कहकर पुकारते थे। उन्होंने गांव के स्कूल में पढ़ाई की और 1896 में कानून की पढ़ाई के लिए मद्रास गए।
मद्रास में पढ़ाई के दौरान उनका राजनीतिक आंदोलनों से परिचय हुआ। उन्होंने दिसंबर 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया और दिसंबर 1907 में सूरत अधिवेशन में भी शामिल हुए। 1911 में 32 वर्ष की आयु में वे सलेम नगर परिषद के लिए चुने गए। 1916 में उन्होंने एनी बेसेंट की होम रूल लीग में प्रवेश किया और सलेम में इसकी इकाई संगठित की। जून 1917 में वे सलेम नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गए। जनवरी 1919 में उन्होंने सलेम को अपने विस्तृत सार्वजनिक जीवन के लिए सीमित मानते हुए मद्रास जाने का निर्णय लिया। यहीं उनकी गांधीजी से मुलाकात हुई।
राजगोपालाचारी महात्मा गांधी के निकटतम सहयोगियों में थे। 1919 के रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह में उन्होंने भाग लिया। 1920 के असहयोग आंदोलन का उन्होंने तमिलनाडु में नेतृत्व किया। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए अपना जमा-जमाया वकालत का पेशा छोड़ दिया और चुनावों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी पदों के बहिष्कार का समर्थन किया।
उन्होंने अप्रैल 1930 में दक्षिण भारत में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया और तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक मार्च किया। उन्हें गिरफ्तार किया गया, रिहा किया गया और पुनः जेल भेजा गया। हालांकि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने गांधी से मतभेद जताया। उनका मानना था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता “स्वर्ण कुंजी” हो सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने “राजाजी फॉर्मूला” प्रस्तावित किया।
इस योजना में कहा गया कि मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ अस्थायी राष्ट्रीय सरकार बनाए, बशर्ते कि कांग्रेस पाकिस्तान के प्रश्न पर जनमत संग्रह के लिए सहमत हो। जनमत संग्रह उत्तर-पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सत्ता हस्तांतरण के बाद होना था। अलगाव की स्थिति में रक्षा, व्यापार और संचार जैसे विषयों पर समझौते का प्रस्ताव था। अप्रैल 1944 में उन्होंने जिन्ना को गांधी की स्वीकृति की जानकारी दी, लेकिन जिन्ना ने इसे अस्वीकार कर दिया।
राजाजी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन के बाद भारत के गवर्नर-जनरल बने। वे इस पद पर पहुंचने वाले एकमात्र भारतीय थे। वे 1952–54 तक मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
राजाजी गांधी और नेहरू दोनों के सम्मानित सहयोगी थे। गांधी उन्हें अपना “अंतरात्मा का संरक्षक” कहते थे। इसके बावजूद राजाजी ने वर्ष 1959 में उन्होंने स्वातंत्र्य पार्टी की स्थापना की। राजाजी का मानना था कि कांग्रेस की केंद्रीकृत और समाजवादी नीतियां लोकतंत्र के लिए चुनौती हैं। उन्होंने मुक्त उद्यम और सीमित सरकारी हस्तक्षेप का समर्थन किया। नेहरू ने इसे जमींदारों की पार्टी कहा। हालांकि, राजाजी इसे संवैधानिक विपक्ष मानते थे। उनका निधन 1972 में हुआ और उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
केरल के कोट्टायम जिले में 1924–25 में वायकॉम सत्याग्रह चलाया गया। इसका उद्देश्य वायकॉम महादेव मंदिर के आसपास की सड़कों पर दलितों के आने-जाने पर प्रतिबंध को खत्म कराना था। यह भारत के पहले संगठित मंदिर-प्रवेश आंदोलनों में से एक था। इसका नेतृत्व केरल के प्रमुख समाज सुधारक टी. के. माधवन और के. केल्लपन (केरल गांधी) के नाम से प्रसिद्ध ने किया। इस आंदोलन का समर्थन महात्मा गांधी ने किया था।
इस सत्याग्रह का परिणाम यह हुआ कि 12 नवंबर 1936 को त्रावणकोर के महाराजा श्री चिथिरा थिरुनल बलराम वर्मा ने 'मंदिर प्रवेश उद्घोषणा' (Temple Entry Proclamation) जारी किया। यह पहली कानूनी जीत थी जिसने दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिया।
वर्ष 1930 में महाराष्ट्र के नासिक स्थित कालाराम मंदिर सत्याग्रह का नेतृत्व बाबा साहेब आंबेडकर और भाउराव कृष्णाजी गायकवाड ने की। 2 मार्च 1930 को हजारों दलितों ने मंदिर में प्रवेश की मांग की। यह आंदोलन दलित स्वाभिमान का बड़ा प्रतीक बना। डॉ. आंबेडकर ने साफ शब्दों में कहा, 'हम मंदिर में इसलिए नहीं जाना चाहते कि हमें भगवान चाहिए, बल्कि इसलिए कि हमें समानता चाहिए।'
महात्मा गांधी और बी. आर आंबेडकर के बीच 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ था। ब्रिटिश सरकार के 'कम्युनल अवॉर्ड' में दलितों (डिप्रेस्ड क्लासेस) के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान था। गांधी ने इसका विरोध करते हुए यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। इसके बाद समझौते में पृथक निर्वाचन की जगह सामान्य हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी। इस पैक्ट ने दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया, पर पृथक चुनाव की मांग समाप्त हो गई। इसके बाद अस्पृश्यता उन्मूलन की दिशा में सामाजिक अभियान तेज हुए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (जाति के आधार पर भेदभाव निषिद्ध) और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता समाप्त) के बाद सामाजिक बराबरी और मानवीय गरिमा की लड़ाई में तेजी आई। हालांकि आजादी के बाद भी मंदिर प्रवेश को लेकर कई राज्यों से संघर्ष की खबरें आती रहीं हैं।