
National Mango Day 2026 : आम को यूं ही फलों का राजा नहीं कहा जाता। इसकी मिठास जितनी लोगों के दिलों में बसती है, उतनी ही मेहनत इसकी सफल खेती में लगती है। लेकिन जब खेती जुनून बन जाए तो खेत प्रयोगशाला बन जाते हैं और किसान अपनी पहचान देश-दुनिया तक बना लेता है। आलीराजपुर जिले के ग्राम छोटा उंडवा के किसान युवराजसिंह राठौर इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। उन्होंने महज 60 आम के पेड़ों से शुरू हुआ सफर आज 55 एकड़ में फैले 140 किस्मों के 6000 पेड़ों तक पहुंचा दिया है।
अब उनका बाग केवल आम का बगीचा नहीं, बल्कि देश की दुर्लभ और पारंपरिक आम प्रजातियों का जीवंत संग्रहालय बन चुका है। राष्ट्रीय आम दिवस पर युवराजसिंह की यह कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने खेती को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि नवाचार, संरक्षण और पहचान का मिशन बना दिया। उनके बगीचे में देश-विदेश की दुर्लभ किस्में एक साथ लहलहा रही हैं। इनमें जापान का दुनिया का सबसे महंगा मियाजाकी आम, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है, तो श्रीलंका की टीजेसी किस्म भी शामिल है, जो वर्ष में दो बार फल देती है।
युवराजसिंह ने पत्रिका से बातचीत करते हुए कहा कि वर्ष 2011 तक उनके खेत में केवल 60 आम के पेड़ थे, जिन्हें उनके दादा भवानी सिंह राठौर और पिता देवेन्द्र सिंह राठौर ने लगाया था। बचपन से पेड़ों के बीच पले-बढ़े युवराज ने तय किया कि वे आम की अधिक से अधिक प्रजातियों को एक ही स्थान पर संजोएंगे। इस संकल्प में उनकी मां जयेंद्र बा ने लगातार उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने हर साल कम से कम 500 नए पौधे लगाने का लक्ष्य बनाया और बिना रुके इस अभियान को आगे बढ़ाते रहे। 14 वर्षों की मेहनत का परिणाम आज सबके सामने है। उनके बगीचे में 6000 पेड़ हैं, जिनमें अकेले 5000 पेड़ केसर आम के हैं। शेष हजार पेड़ों में देश और विदेश की दुर्लभ किस्में लगी हुई हैं।
युवराजसिंह का बगीचा किसी शोध केंद्र से कम नहीं है। यहां पूसा, नई दिल्ली द्वारा विकसित दीपशिखा, श्रेष्ठा, लालिमा, मनोहारी, पीतांबरी, प्रतिभा और सूर्या जैसी आधुनिक किस्में हैं तो आईसीएआर-सीआईएसएच, लखनऊ की आम्रपाली, मल्लिका, अंबिका, अरुणिमा, अवध अभया और अवध मधुरिमा जैसी उन्नत प्रजातियां भी हैं। इसके अलावा हापुस, केसर, दशहरी, लंगड़ा, चौसा, नूरजहां, फजली, राजापुरी, हिमसागर, इमामपसंद, टॉमी एटकिंस, केंट, बनाना मैंगो, कोकोनट क्रीम, लेमन जेस्ट, मियाजाकी, कटिमोन, महा चिनोक और दर्जनों विदेशी व देशी किस्में उनके बगीचे की शोभा बढ़ा रही हैं।
युवराजसिंह के बगीचे के आम केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। उनकी उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक इनकी मांग रहती है। विशेष रूप से केसर आम की गुणवत्ता के कारण इंदौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिग बास्केट पर भी इनके आम की अच्छी मांग रहती है। स्वाद, रंग और गुणवत्ता ने उनके आमों को एक अलग पहचान दिलाई है, जिसके कारण व्यापारी पहले से बुकिंग कराने पहुंच जाते हैं।
हाल ही में लखनऊ में आयोजित आम महोत्सव-2026 में युवराजसिंह राठौर ने अपनी विभिन्न आम प्रजातियों का प्रदर्शन किया। यहां उनकी कई किस्मों ने निर्णायकों को प्रभावित किया और उन्हें प्रथम तथा द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुए। प्रथम पुरस्कार उन्हें फजली, रूमानी, नूरजहां, राजापुरी, केसर, मनोहारी और हापुस किस्मों के लिए मिला, जबकि चौसा किस्म को द्वितीय पुरस्कार मिला।
युवराजसिंह का मानना है कि खेती में सफलता केवल परंपरागत तरीके अपनाने से नहीं, बल्कि नई किस्मों के परीक्षण, वैज्ञानिक सोच और धैर्य से मिलती है। वे लगातार देश के विभिन्न राज्यों से नई किस्में लाकर उनका परीक्षण करते हैं और किसानों को भी विविधता आधारित बागवानी अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि यदि किसान बाजार की मांग, गुणवत्ता और नवाचार पर ध्यान दे तो खेती केवल जीविका नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का माध्यम भी बन सकती है।