Birth decline: भारत, चीन जैसे देशों में कभी 'जनसंख्या विस्फोट' की समस्या प्रायोरिटी लिस्ट में थी, आज 'खाली होते पालनों' की चिंता है! क्या करियर और बदलती जीवनशैली हमें एक बुजुर्ग समाज की ओर ले जा रही है? पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट।
Birth decline : बीसवीं सदी के अंत तक दुनिया 'जनसंख्या विस्फोट' के डर में जी रही थी। विशेषज्ञों का मानना था कि बढ़ती आबादी संसाधनों को खत्म कर देगी। लेकिन आज, 2026 में तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आ रही है। दुनिया के नक्शे पर एक नई और खामोश चुनौती उभर रही है- फर्टिलिटी कोलैप्स (fertility collapse) यानी प्रजनन दर (Fertility Rate)। वैश्विक आंकड़ों (UN World Population Prospects) के अनुसार, दुनिया की 70% से अधिक आबादी अब उन देशों में रहती है, जहां जन्म दर जनसंख्या को स्थिर रखने के आवश्यक स्तर (2.1) से नीचे चली गई है। यह आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी है। आखिर इस 'ग्रैंड शटडाउन' (Grand Shutdown) की वजह क्या है और हमारा भविष्य कैसा दिखेगा?
अगर यह गिरावट जारी रही, तो भविष्य में समाज को तीन बड़े झटकों का सामना करना पड़ेगा:
आज के दौर में Assisted Reproductive Technology (ART) एक उम्मीद की किरण बनकर उभरी है।
आजकल कपल्स में देरी से परिवार शुरू करने का चलन बढ़ रहा है। आप 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े किन जोखिमों के बारे में बताना चाहेंगी?
उन्होंने बताया कि आजकल करियर और स्थिरता के कारण 'लेट पेरेंटहुड' ( Late Parenthood) आम है, लेकिन एक डॉक्टर के तौर पर हमें महिलाओं को जैविक सच्चाई (biological reality for Pregnancy) से अवगत कराना होता है। 35 की उम्र के बाद महिला की फर्टिलिटी में तेज़ी से गिरावट आती है क्योंकि अंडों (Eggs) की संख्या और गुणवत्ता (Quality) दोनों कम होने लगती हैं। मुख्य जोखिमों में शामिल हैं- गर्भधारण में देरी, गर्भपात (Miscarriage) की संभावना बढ़ना और गर्भकालीन मधुमेह या हाई बीपी जैसी जटिलताएं। साथ ही, भ्रूण में क्रोमोसोमल असामान्यताएं (जैसे डाउन सिंड्रोम) का खतरा भी बढ़ जाता है। मैं ऐसी महिलाओं को सलाह देती हूं कि वे समय पर 'फर्टिलिटी टेस्टिंग' (Fertility Testing) कराएं और यदि वे अभी तैयार नहीं हैं, तो 'एग फ्रीजिंग' जैसे आधुनिक विकल्पों पर विचार करें।
क्या आपको लगता है कि बदलती जीवनशैली (जैसे तनाव, खराब खान-पान) गिरती प्रजनन दर का एक प्रमुख कारण है? इसे सुधारने के लिए आप मरीजों को क्या सलाह देंगे?
उन्होंने बताया, बदलती जीवनशैली गिरती प्रजनन दर का एक सबसे बड़ा 'साइलेंट किलर' है। अत्यधिक तनाव शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा करता है, जो ओव्यूलेशन और स्पर्म काउंट दोनों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, प्रोसेस्ड फूड और मोटापे से 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' बढ़ता है, जो सीधे तौर पर प्रजनन क्षमता को कम करता है।
मरीजों को मेरी सलाह है कि वे 'बैक टू बेसिक्स' फॉर्मूला अपनाएं:
प्रजनन दर में गिरावट के बीच, बांझपन (infertility) के उपचार जैसे IVF या एग फ्रीजिंग की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
उन्होंने बताया, जहां सामाजिक और करियर कारणों से परिवार नियोजन में देरी हो रही है, वहां IVF और एग फ्रीजिंग जैसी तकनीकें एक 'लाइफलाइन' की तरह उभरी हैं। एग फ्रीजिंग महिलाओं को अपनी 'बायोलॉजिकल क्लॉक' को रोकने की सुविधा देती है, जिससे वे भविष्य के लिए अपनी स्वस्थ प्रजनन क्षमता सुरक्षित रख सकती हैं। वहीं, प्रजनन दर में गिरावट के बीच IVF उन दंपत्तियों के लिए वरदान है जो प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि, हमें यह समझना होगा कि ये तकनीकें शत-प्रतिशत सफल होने की गारंटी नहीं हैं, लेकिन ये गिरती जन्म दर को संभालने और पेरेंटहुड का सपना पूरा करने में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक स्तंभ (Scientific Pillar) की भूमिका निभा रही हैं।
भारत जैसे देश में जहां कुछ राज्यों में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट ( Replacement Level Fertility) लेवल से नीचे है और कुछ में ऊपर, आप एक समान स्वास्थ्य नीति लागू करने की क्या चुनौतियां देखते हैं?
उन्होंने बताया, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक समान स्वास्थ्य नीति लागू करना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि यहां 'One Size Fits All' का फॉर्मूला काम नहीं करता। जहां केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य 'रिप्लेसमेंट लेवल' से काफी नीचे हैं, वहां चुनौती बुजुर्ग आबादी (Aging Population) और हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रबंधन की है। इसके विपरीत, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चुनौती अभी भी जनसंख्या नियंत्रण और मातृ मृत्यु दर (MMR) को कम करने की है। एक समान नीति बनाने में क्षेत्रीय भाषाई बाधाएं, सामाजिक मान्यताएं और स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता सबसे बड़ी अड़चनें हैं। हमें एक ऐसी 'लचीली नीति' चाहिए जो विकसित राज्यों के लिए 'प्रो-फैमिली' (परिवार को सहारा देने वाली) हो और पिछड़े राज्यों के लिए जागरूकता और संसाधनों पर केंद्रित हो।
गिरती प्रजनन दर का मतलब है भविष्य में बुजुर्गों की आबादी का बढ़ना। स्वास्थ्य प्रणाली को 'एजिंग पॉपुलेशन' (Aging Population) की जरूरतों के लिए अभी से कैसे तैयार होना चाहिए?
उन्होंने बताया, गिरती प्रजनन दर भविष्य में एक 'डेमोग्राफिक शिफ्ट' लाएगी, जिससे हमारा स्वास्थ्य ढांचा 'शिशु देखभाल' से हटकर 'बुजुर्गों की देखभाल' (Geriatric Care) पर केंद्रित होना चाहिए। हमें अभी से तीन स्तरों पर तैयारी करनी होगी:
क्या आपको लगता है कि बेहतर महिला शिक्षा और करियर के अवसरों का Fertility Rate पर सीधा प्रभाव पड़ता है? एक मेडिकल प्रोफेशनल के तौर पर आप इसे कैसे संतुलित देखते हैं?
उन्होंने बताया, वैश्विक डेटा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि महिला शिक्षा और करियर के अवसरों का प्रजनन दर (Fertility Rate) पर सीधा और गहरा प्रभाव पड़ता है। शिक्षित और कामकाजी महिलाएं अक्सर परिवार नियोजन में अधिक सचेत निर्णय लेती हैं और आर्थिक स्थिरता के कारण गर्भधारण में देरी करती हैं। एक मेडिकल प्रोफेशनल के तौर पर मैं इसे 'चुनौती' नहीं, बल्कि 'सशक्तिकरण' के रूप में देखती हूं। संतुलन का रास्ता 'जागरूकता' और 'विकल्पों' से होकर गुजरता है। हमें समाज में ऐसा माहौल बनाना होगा जहां महिलाओं को करियर और मातृत्व के बीच किसी एक को चुनना न पड़े। इसके लिए 'वर्क-लाइफ बैलेंस', समय पर फर्टिलिटी काउंसिलिंग और आधुनिक तकनीक (जैसे एग फ्रीजिंग) को सुलभ बनाना होगा, ताकि महिलाएं अपनी स्वास्थ्य और करियर दोनों प्राथमिकताओं को सुरक्षित रख सकें।
विश्व स्तर पर कई देश गिरती जनसंख्या से निपटने के लिए 'प्रो-नेटालिस्ट' (बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली) नीतियां अपना रहे हैं। क्या आपको लगता है कि भारत को भी ऐसी नीतियों की आवश्यकता है?
उन्होंने बताया, यह एक जटिल सवाल है। भारत वर्तमान में एक 'दोहरी स्थिति' में है। जहां हमारे दक्षिणी और कुछ पश्चिमी राज्य 'रिप्लेसमेंट लेवल' से नीचे जा चुके हैं, वहीं कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अभी भी तेज़ है। विश्व स्तर पर जापान या रूस जैसी 'प्रो-नेटालिस्ट' नीतियों की भारत को शायद पूरे देश के लिए एक साथ आवश्यकता नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय आधार पर इसकी जरूरत महसूस की जा सकती है।भारत को 'संख्या बढ़ाने' के बजाय 'सहायक ढांचा' बनाने वाली नीतियों पर ध्यान देना चाहिए। इसमें बेहतर मातृत्व अवकाश, वर्क-लाइफ बैलेंस, और सस्ती चाइल्डकेयर सुविधाएं शामिल होनी चाहिए। हमें जनसंख्या को केवल संख्या के रूप में नहीं, बल्कि 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' के रूप में देखना होगा, जहाँ फोकस बच्चों की संख्या से ज्यादा उनके स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण पालन-पोषण पर हो।
शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate) में कमी का प्रजनन दर पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या यह जनसंख्या को स्थिर करने में मदद करता है?
उन्होंने बताया, शिशु मृत्यु दर (IMR) में कमी का प्रजनन दर (Fertility Rate) पर सीधा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐतिहासिक रूप से, जब शिशु मृत्यु दर अधिक होती थी, तो माता-पिता इस डर से अधिक बच्चे पैदा करते थे कि शायद कुछ जीवित न बच पाएं। इसे 'रिप्लेसमेंट सर्वाइवल' मानसिकता कहा जाता है। जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होती हैं और बच्चों के जीवित रहने की गारंटी बढ़ती है, परिवार नियोजन के प्रति विश्वास बढ़ता है और लोग कम बच्चे पैदा करने का विकल्प चुनते हैं। हां, यह जनसंख्या को स्थिर करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब शिशु मृत्यु दर गिरती है, तो प्रजनन दर अपने आप नीचे आने लगती है, जिससे जनसंख्या वृद्धि संतुलित और अधिक अनुमानित (predictable) हो जाती है।