B. R. Ambedkar Jayanti: डॉ. भीमराव अंबेडकर की समय के साथ लोकप्रियता बढ़ती चली जा रही है। अंबेडकर ने देश हित में कई काम किए, जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। दलित चिंतकों का मानना है कि उनके बारे में जैसे-जैसे लोगों को पता चलता जाएगा, उनकी चमक बढ़ती चली जाएगी। आइए उनके जीवन संघर्ष के साथ उनके देशहित और समाज हित में किए गए कार्यों को जानते हैं।
B. R. Ambedkar Birth Anniversary: डॉ. भीमराव राव अंबेडकर (B. R. Ambedkar) की आज 135वीं जयंती पूरी दुनिया में मनाई जा रही है। डॉ. अंबेडकर को उनके चाहने वाले आदर से 'बाबा साहेब' (Baba Saheb) के नाम से पुकारते हैं। डॉ. अंबेडकर की चमक समय के साथ बढ़ती ही जा रही है। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खासकर 90 के दशक तक आते-आते अंबेडकर का नाम उन पार्टियों ने से भी लेना शुरू कर दिया, जो उनके विचारों की पहले आलोचना किया करते थे।
Ambedkar's Popularity: प्रगतिशील विचारक उन्हें 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा सितारा बताते हैं। आइए, उनके जीवन संघर्ष और विचारों के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही उनके द्वारा किए गए उन कामों के बारे में जानते हैं, जो आम लोगों को नहीं पता है या कम पता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास के उन महान व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवन के संघर्षों को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानव अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गया है।
डॉ. अंबेडकर का जन्म (B. R. Ambedkar Birth Place) मध्य प्रदेश के तत्कालीन महू में 14 अप्रैल 1891 को हुआ। अब महू का नाम बदलकर उनके नाम पर यानी डॉ. अंबेडकर नगर कर दिया गया। उनका जन्म महार (दलित) परिवार में हुआ। गुलाम भारत में दलित परिवार में पैदा हुए बच्चों को सामाजिक रूप से बहुत छुआछूत का सामना करना पड़ता था। उन्हें स्कूल में अन्य बच्चों से अलग बैठाया जाता था। उन्हें स्कूल में पानी की सार्वजनिक व्यवस्था का भी उपयोग नहीं करने दिया जाता था। उन्हें प्यास लगती तो उन्हें तथाकथित ऊंची जाति का व्यक्ति ही पानी देता था। अपने साथ बचपन में अपमानजनक व्यवहार ने उनके मन पर गहरा असर किया और आगे चलकर उन्होंने यह ठान लिया कि वह इन कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। हालांकि, आजाद भारत में आज भी दलित उत्पीड़न के कहानियां अक्सर देखने और सुनने को मिल जाती हैं। डॉ. अंबेडकर और आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले उनके सहयोगियों और समकक्ष के नेताओं ने आजादी के बाद ऐसा संविधान रचा जिसमें सामाजिक बराबरी की व्यवस्था की गई। उसे सुरक्षित करने के लिए कानून की व्यवस्था की।
Discriminations with B. R. Ambedkar: स्कूली पाठ्यक्रमों में यह बात बहुत पढ़ी-पढ़ाई जाती रही है कि शिक्षा मन की खिड़कियां खोलती हैं। लेकिन, बालक अंबेडकर ने तो पाया कि शिक्षा का जरिया बने स्कूलों में जिनका कब्जा है, उन्होंने इसे खास जाति या लोगों के लिए सीमित कर दिया है। उस दौर में दलितों के लिए शिक्षा प्राप्त करना बेहद कठिन था, लेकिन अंबेडकर ने कभी हार नहीं मानी। भेदभाव पैदा करने वाली व्यवस्था अंबेडकर को बचपन से ही उद्वेलित करती थी। यही वजह है कि अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार बताया। उनका मानना था कि शिक्षा के माध्यम से ही समाज में समानता और न्याय स्थापित किया जा सकता है।
यही वजह है कि अंबेडकर ने प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में बी.ए. में दाखिला लिया। यह उस जमाने के लिए दलित समाज के छात्रों के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। उनकी प्रतिभा को देखकर बड़ौदा राज्य के महाराजा ने उन्हें विदेश में पढ़ाई करने के लिए छात्रवृत्ति दी। उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय (Columbia University) से 1915 में अर्थशास्त्र में एम. ए. किया और इसके बाद वहीं से 'नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया - ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी' पर पीएचडी (PhD) की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (London School of Economics) से अर्थशास्त्र, राजनीति और कानून में उच्च शिक्षा प्राप्त की। विदेश में पढ़ाई के दौरान उन्हें पहली बार समानता का अनुभव हुआ, जिसने उनके विचारों को और मजबूत किया।
डॉ. अंबेडकर शिक्षा पूरी करने के बाद जब भारत लौटे, तो उन्हें एक बार फिर से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। बड़ौदा में नौकरी के दौरान उन्हें रहने के लिए किसी ने किराये तक पर घर तक नहीं दिया। इस अनुभव से उन्हें यह बात समझ में आई कि केवल व्यक्तिगत शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में संरचनात्मक बदलाव जरूरी है। इसके बाद उन्होंने सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलाने और बराबरी का समाज बनाने के लिए दलितों और वंचितों के अधिकारों के लिए कई आंदोलन शुरू किए।
महाड़ सत्याग्रह (1927) : यह आंदोलन दलितों को सार्वजनिक जल स्रोतों से पानी लेने का अधिकार दिलाने के लिए था।
मंदिर प्रवेश आंदोलन : उन्होंने दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए भी संघर्ष किया, क्योंकि उन्हें धार्मिक स्थलों में जाने की अनुमति नहीं थी।
डॉ. अंबेडकर ने यह समझा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए राजनीतिक शक्ति हासिल करना जरूरी है। उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (separate electorate) की मांग की, ताकि उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके। इस मुद्दे पर महात्मा गांधी के साथ उनके मतभेद उभकर सामने आए। गांधी जी इसके खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा। आखिरकार 'पूना पैक्ट' हुआ, जिसमें अलग निर्वाचन क्षेत्र की बजाय आरक्षण (Reservation) का प्रावधान किया गया। यह सच है कि उनके सामाजिक बराबरी के लिए किए गए आंदोलनों और संविधान में मौलिक अधिकारों के प्रावधानों के चलते उनकी चमक समय के साथ बढ़ती ही जा रही है।
बाबा साहेब की बढ़ती लोकप्रियता के बारे में कवि और लेखक पंकज चौधरी ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि बाबा साहेब के काम को जैसे-जैसे लोग जानेंगे उनकी चमक वैसे-वैसे बढ़ेगी। निचले तबकों में शिक्षा की रोशनी और जागरूकता का जितना प्रसार होगा उनका महत्व उसी अनुपात में बढ़ता जाएगा। बाबा साहेब के विचार, दर्शन और संघर्ष में सम्पूर्ण भारत का भविष्य अंतर्निहित है, उसके सम्पर्क में जैसे-जैसे लोग आएंगे उनसे प्रभावित और चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाएंगे।
उन्होंने कहा कि यह कितने लोगों को पता है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना बाबा साहेब के शोध ‘द प्रॉब्लम ऑफ रूपी’ पर आधारित है। कितने लोगों को पता है कि बाबा साहेब के प्रयासों से भारत में चार प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (दामोदर घाटी, हीराकुंड, सोन नदी घाटी और भाखड़ा-नांगल परियोजना) की नींव और विकास की प्रक्रिया शुरू हुई। कितने लोगों को पता है कि बाबा साहेब के प्रयासों से महिलाओं को मैटरनिटी लिव मिल रहा है। मजदूरों के लिए काम के 8 घंटे निर्धारित किए गए। आदि आदि…
दलित स्त्रीवादी चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि "बाबा साहेब के द्वारा चलाए गए सामाजिक बराबरी के आंदोलन के कारण उनकी चमक दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। देखा जाए तो समाज में आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है। उन्होंने अपने समय में जिन भेदभावों को देखकर सामाजिक आंदोलन चलाए, उन मोर्चो पर अभी भी बहुत कुछ नहीं बदला है। बल्कि स्थितियां यथावत बनी हुई हैं। यही वजह है कि आज भी उन्हें बड़ी श्रद्धा से याद किया जाता है।
उन्होंने कहा, 'बाबा साहेब ने दलित, शोषित, वंचित, आदिवासी, मजदूरों के अधिकारों, महिलाओं के अधिकारों जैसे प्रश्नों पर अपने विचार खुलकर रखे। आजाद भारत के लिए उन्होंने सबसे बेशकीमती संविधान रचा। उन्होंने संविधान में मजदूरों, गरीबों, महिलाओं, सभी वर्गों के अधिकार सुरक्षित किए और अभी यही वर्ग, जो बहुत समय से वंचित था, संविधान उनकी ताकत बन रहा है। यही वजह है कि बाबा साहेब को देश की बड़ी आबादी याद करती है।' उन्होंने कहा कि संविधान में उन्होंने समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा और सामाजिक न्याय का प्रावधान रखा ताकि एक ही देश के दो व्यक्तियों में भेदभाव नहीं किया जा सके।
उन्होंने बताया कि बाबा साहेब ने महिलाओं के अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल लिखा। उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति में अधिकार और समानता दिलाने की कोशिश की। पानी की समस्याओं के लिए बांधों पर काम किया। कल 14 अप्रैल है और बाबा साहब का जन्मदिन है, तो इस अवसर पर मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगी कि बाबा साहेब ने समाज के लिए जितना काम किया, आज हमें उन्हें याद करने की बहुत जरूरत है। हमें उनके मूल्य, उनके आदर्शों और उनके बताए रास्तों पर चलने की ज़रूरत है।