
Wildlife Corridor Genetic Diversity: वन्यजीवों के बेहतर और सुरक्षित संरक्षण का ही नतीजा है कि वन्यजीवों की आबादी लगातार बढ़ रही है। इनकी आबादी का बढ़ना सुखद है, लेकिन इस बढ़ती आबादी ने वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। उन्हें चिंता है कि भविष्य में क्या ये वन्यजीव नया जंगल, नये साथी और नई जेनेटिक विवधता तलाश पाएंगे? इंसानी आबादी और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष या इनके सहअस्तित्व से ज्यादा वैज्ञानिक अब चिंतित हैं कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास टूट रहे हैं। ऐसे में कहीं अगली पीढ़ियां जेनेटिक (Wildlife Corridor Genetic DiversityCrisis) रूप से कमजोर तो नहीं हो जाएंगी? वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स और लैंडस्केप कनेक्टिविटी जैसे विषयों में ही वैज्ञानिकों के इस सवाल का जवाब छिपा है, इन्हीं पर अब वन्यजीव संरक्षण से कहीं ज्यादा फोकस करने की जरूरत समझी जा रही है।
Q. आपने मध्य भारत के जंगलों, लैंडस्केप और वन्यजीव संरक्षण पर लंबे समय से अध्ययन किया है। आपका अनुभव क्या कहता है कि ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ्लिक्ट की बड़ी वजह क्या है?
इस सवाल पर डॉ. अनिरुद्ध कहते हैं, ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ्लिक्ट (Wildlife Corridor wildlife conflict) के लिए एक नहीं कई कारक हैं। इनमें इंसानी आबादी में भारी बढ़ोतरी, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव और प्राकृतिक आवास का टुकड़ों में बंटना महत्वपूर्ण और गंभीर कारण हैं।
Q. वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स क्यों महत्वपूर्ण हैं? क्या ये केवल बाघ-हाथियों जैसी बड़ी प्रजातियों के लिए ही जरूरी हैं?
डॉ. अनिरुद्ध कहते हैं, वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स युवा बाघों के सुरक्षित विस्थापन के लिए अहम कड़ी हैं। हाथियों के लिए भी इनकी उतनी ही अहम भूमिका है। वे इसका बड़ा कारण बताते हुए कहते हैं कि मध्य प्रदेश के इंसानी आबादी वाले इलाकों में भी अब हाथी अपना विस्तार कर रहे हैं। ऐसे में वे इस बात पर जोर देते हैं कि हमें ध्यान देना होगा कि वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स (Wildlife Corridor Development)को टाइगर रिजर्व बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि इन्हें एक ऐसे लैंडस्केप के रूप में विकसित करने की जरूरत है, जिससे वन्यजीवों का सुरक्षित तरीके से आवागमन सुनिश्चित किया जा सके।
अनिरुद्ध आगे कहते हैं कि मेटा पॉपुलेशन डायनामिक यानी छोटी आबादी वाले समूहों के जरिए वन्यजीव एक-दूसरे के संपर्क में आ सकें। क्योंकि किसी भी बड़े भूभाग में वन्य जीव छोटे-छोटे समूह में और अलग-अलग हेबिटेट्स (Wildlife Corridor wildlife habitats)में रहते हैं। इनके आपस में संपर्क से जेनेटिक विविधता बनी रहती है। इसका बड़ा फायदा ये होता है कि यदि किसी छोटे समूह की आबादी उनके हेबिटेट से किसी बीमारी या अन्य कारणों से विलुप्त हो भी जाती है, तो नजदीकी दूसरे आवास से जीव यहां आ सकते हैं और उस हेबिटेट को फिर से आबाद कर सकते हैं।
Q. आपके मुताबिक आज भारत के कौन-कौन से वाइल्डलाइफ लैंडस्केप संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
डॉ. अनिरुद्ध के मुताबिक NTCA-WII द्वारा घोषित सभी टाइगर कॉरिडोर (Wildlife Corridor Tiger Path)बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि उन्हें सही डेटा के साथ वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया गया है। इनमें भी पेंच-कान्हा, पेंच-सतपुड़ा-मेलघाट, बांधवगढ़-संजय डुबरी-गुरु घासीदास-टेमोर, पिंगला और रणथंभौर-कूनो-माधव कॉरिडोर बाघों की आवाजाही के लिए उपयुक्त हैं।
Q. बढ़ते शहरीकरण, विकास परियोजनाओं और जलवायु परिवर्तन के बीच वन्यजीव संरक्षण संतुलन कैसे बनाया जा सकता है?
अनिरुद्ध कहते हैं कि मध्य प्रदेश वन विभाग (Wildlife Corridor human wildlife coexistence) इस दिशा में प्रभावी कदम उठा रहा है। जिस तरह यहां टाइगर रिजर्व के कोर एरिया को इंसानी आबादी से पूरी तरह दूर और सुरक्षित रखा गया है, बफर जोन में ग्रामीणों के साथ समन्वय स्थापित कर काम किया जा रहा है। इसके अलावा सफल ईको टूरिज्म मॉडल विकसित करने होंगे। अनुभूति, बाघ चौपाल, चीता चौपाल जैसे जनजागरुकता कार्यक्रम संचालित करने होंगे। ट्रैंड पशु चिकित्सकों के साथ तुरंत रेस्क्यू, वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से लगातार मॉनिटरिंग और जरूरत पड़ने पर ट्रांसलोकेशन जैसे कदम ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ्लिक्ट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Q. सह अस्तित्व के लिए आपके तीन महत्वपूर्ण सुझाव क्या होंगे? क्या कहता है आपका अनुभव?
डॉ. अनिरुद्ध मजूमदार 'अर्बन-लेपर्ड प्रोजेक्ट इन जबलपुर एंड इंदौर' का उदाहरण देते हैं और बताते हैं कि मेरे अनुभव के आधार पर, मेरी पहली प्राथमिकता लोगों को अवेयर (Wildlife Corridor people awareness) करना होगा। ताकि वे समझ सकें कि वन्यजीवों के सामने आने या टकराव की स्थिति बने तो क्या करना चाहिए? वे कहते हैं कि बेहतर संरक्षण के कारण वन्यजीव आबादी लगातार और तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों को डेवलप करना होगा। वहीं तीसरा एक्शन होगा, राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना। आधुनिक तकनीकों से लगातार मॉनिटरिंग, उनसे अपडेट रहना जरूरी है। इसके लिए मीडिया की भी सकारात्मक भूमिका होनी बेहद जरूरी है।