महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, नारीशक्ति ने लीक से हटकर चुने काम, आर्थिक बदलाव लाईं....
एमपी में चौका-चूल्हे तक सिमटी रहने वाली महिलाओं ने आर्थिक तरक्की की ओर लंबी छलांग लगाई है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से उन्होंने गैर परंपरागत कार्य शुरू किए और खुद कारोबार स्थापित कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की धुरी बन रही हैं। वैसे आपने 'पैडमैन' फिल्म के बारे में काफी कुछ सुना होगा।
साल 2018 में रिलीज हुई मूवी 'पैडमैन' ने लोगों को जो सामाजिक संदेश दिया वही अब एमपी की महिलाएं कर रही हैं। बता दें कि खरगोन जिले के महेश्वर शहर में नर्मदा किनारे फिल्म के अधिकांश हिस्से की शूटिंग हुई है। आज हम आपको एमपी की रियल लाइफ 'पैड वुमैन' के बारे में बताने जा रहे हैं….
मध्यप्रदेश में अटेर के ग्राम गजना में संगिनी स्व-सहायता समूह का संचालन करने वाली रेखा शुक्ला ने करीब आठ साल पहले सेनेटरी पैड बनाने का काम शुरू किया तो सामाजिक तौर पर उपहास का सामना करना पड़ा। गैर परंपरागत इस कारोबार में ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से प्रशिक्षण लिया और सेनेटरी पैड का निर्माण शुरू कर दिया। आज 10 समूहों का व्यवस्थित नेटवर्क है और निर्माण एवं आपूर्ति का कार्य भिण्ड जिले के अलावा ग्वालियर एवं मुरैना तक फैला लिया।
रेखा जी बताती है कि वे भिण्ड के एक गांव में गई थी जहां पर सेनेटरी पैड की एमआरपी 40 रुपए थी लेकिन महिलाओं को ये 60 रुपए में बेचे जा रहे थे। जरूरत होने के चलते महिलाएं इन्हें बढ़े हुए दाम में खरीद रही थीं। वहीं से मुझे आइडिया आया कि ये जो बढ़े हुए रेट में महिलाएं खरीद रही है, रेट कम होंगे तो सभी महिलाएं इसका यूज कर सकेंगी। तब खुद इसे बनाना शुरु किया और महिलाओं को 10 रुपए में पैकेट बेचना शुरु किया।
इससे महिलाओं को कपड़े की जगह सेनेटरी पैड यूज करने की आदत पड़ने लगी। फिर यहीं से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैनें इस काम को आगे बढ़ाने की सोची। छोटे स्तर से शुरु हुआ ये काम धीरे-धीरे बढ़ता गया। दूसरे की कंपनी के साथ जुड़कर पहले ये काम किया। फिर मार्केटिंग भी की। धीरे-धीरे इस काम को आगे बढ़ाती गई।
सेनेटरी पेड को बनाने का काम लगभग 100 महिलाएं कर रही है। ये सेनेटरी पैड भिंड से मुरैना, उरई, ग्वालियर, जालौन, विदिशा तक पहुंचाए जाते है। रेखा जी बताती है कि इस काम से वे महीने में 25 से 30 हजार रुपए कमा लेती है। एक महीने में लगभग 2 लाख रुपए का माल निकल जाता है।
आगे वे बताती है कि इस काम को देखते हुए कलेक्टर और सीईओ साहब ने कहा है कि गर्ल्स हॉस्टल और गवर्मेंट सप्लाई दिलाने का बोला गया है। अभी हम अपनी प्राइवेट सप्लाई करते रहते है। आंगनवाड़ियों और स्कूलों में जाकर भी मिलते है। सभी को जागरुक करने का काम करते हैं। आगे विचार है कि जल्द ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इसको लाया जाए। जिससे हमारा काम और तेजी से आगे बढ़ेगा।
आज इस समूह की महिलाएं सालाना 24 लाख रुपए का मुनाफा कमा रही हैं। औसतन महिलाओं को छह से 10 हजार रुपए तक हर माह अपने घरेलू कार्य के अतिरिक्त मिल रहे हैं। वे बताती हैं कि 2017 में डॉ. उमा शर्मा ने इसके बारे बताया था, प्रशिक्षण में सहयोग किया तो घर से बाहर निकलीं और यहां तक पहुंचीं, जिससे घर की आर्थिक स्थिति भी सुधरी।
महिलाएं शहद उत्पादन भी कर रही हैं। प्रशिक्षण के बाद मधुमक्खी पालन सीखकर आज छह से 10 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रही हैं। भीखमपुरा में महिला समूह की प्रमुख मनोज को क्षेत्र सरसों एवं फूल वाली अन्य खेती की वजह से शहद उत्पादन का आइडिया मिला। उन्होंने पांच बॉक्स से मुधुमक्खी पालन शुरू किया।
आज 10 समूहों की 100 महिलाएं मधुमक्खी पालन एवं शहद उत्पादन से जुड़ी हैं। 100 बॉक्स में मधुमक्खी पालन करके यह महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं। घरेलू कामकाज के साथ यह अतिरिक्त कार्य कर आमदनी प्राप्त कर रही हैं। ऐसे ही मशाला निर्माण में मानपुरा की पम्मी जादौन एवं गोहद के इकहरा-गुरीखा की लता सीजनल अचार बनाने का काम कर रही हैं।
जिले में चार हजार 700 से अधिक स्व-सहायता समूह संचालित हैं। 50 प्रतिशत समूह निष्क्रिय हैं। बाकी में अधिकांश मध्यान्ह भोजन एवं पोषण आहार का काम ही करते हैं। लेकिन 50 के करीब समूह ऐसे हैं जो मशाला, शहद, सेनेट्री पैड, अचार के साथ सजावट का सामान बनाने का काम करके आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रही हैं।