Work From Home: पीएम मोदी की अपील के बाद वर्क फ्रॉम होम कल्चर एक बार फिर चर्चा में है। कोरोना में परिस्थितिवश शुरू की गई यह सुविधा अब ट्रेंड में भी आ चुकी है, लेकिन इसके फायदों के साथ ही नुकसान भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में patrika.com ने की एक्सपर्ट्स से बात, जानिए आपका भविष्य, कैसे रह सकते हैं फिजिकली फिट एंड मेंटली कूल
Work From Home side effects: सुबह आंख खुलते ही लेपटॉप से होती है आपके दिन की शुरुआत, ऑफिस मीटिंग खत्म होते ही उसी कमरे में खाना और फिर देर रात तक स्क्रीन से चिपके रहना…। कोरोना के बाद शुरू हुआ वर्क फ्रॉम होम का ये ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। परिस्थितिवश शुरू की गई कंपनियों की यह व्यवस्था अब सुविधा के बजाय नया वर्क कल्चर बन गई है।
देश-दुनिया में कई कंपनियां इसे फॉलो कर रही हैं और लाखों लोग इससे राहत भी महसूस कर रहे हैं। हर दिन न सड़क के ट्रैफिक जाम से जूझना पड़ता है, न घर से घंटों पहले निकलने और ऑफिस पहुंचने तक का समय आने-जाने में बर्बाद होता है। नतीजा ऑफिस देर से पहुंचने की टेंशन और काम को लेकर मानसिक प्रेशर भी नहीं झेलना पड़ रहा।
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या घर से काम करना हकीकत में उतना ही सुरक्षित और आसान है, जितना कि देखने और सुनने में महसूस होता है? patrika.com पर पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
दरअसल, पिछले दिनों पीएम नरेंद्र मोदी ने वक्त की नजाकत को देखते हुए देशवासियों से अपील की है कि वर्क फ्रॉम होम शुरू करें। पश्चिमी देशों में बढ़ते संकट को देखते हुए यह अपील की गई है, लेकिन सवाल मन में आ ही गया कि अगर इस व्यवस्था को पूरी तरह से फॉलो किया जाता है, तो ये कितना फायदेमंद है या फिर इसके कोई साइड/निगेटिव इफेक्ट्स (Work From Home) भी हैं…
एक मल्टीनेशनल IT कंपनी में काम कर रहे सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरनव सिंह बताते हैं कि उन्हें जॉब करते हुए 6 साल हो चुके हैं। वे शुरुआत से ही ही वर्क फ्रॉम होम कल्चर फॉलो कर रहे हैं। सप्ताह में एक दिन ऑफिस मीटिंग के लिए उन्हें और पंचिंग एंट्री से उपस्थिति दर्ज करवाने ही ऑफिस जाना होता है। अर्णव कहते हैं कि उन्हें वर्क फ्रॉम होम का कॉन्सेप्ट अच्छा लगता है।
लेकिन इसके लिए वे हिदायत भी देते हैं कि घर पर काम ईमानदारी से करें। ऑफिस टाइमिंग का ध्यान रखें। लेकिन इसके साथ आपको अपने खान-पान का समय और फिजिकल एक्टिविटी का भी ध्यान रखना होता है। चूंकि मेरी अक्सर नाइट ड्यूटी रहती है, तो मुझे दिन में प्रॉपर नींद की जरूरत होती है। WFH अनुशासन मांगता (Work From Home) है, ऑफिस और पर्सनल लाइफ दोनों का बैलेंस करके चलना होता है।
अरनव का कहना है कि इसका एक निगेटिव असर (Work From Home) यह दिखता है कि मैं सोशल नहीं रहा, बंद कमरे में अकेले बैठकर काम करने की आदत हो गई है। ऐसे में परिवार के बीच बैठकर भी बातें करने की आदत धीरे-धीरे कम हुई है। अब ज्यादातर चुप रहने लगा हूं। घर में आने वाले मेहमानों या रिश्ते-नातेदारों से बातचीत में कंफर्ट महसूस नहीं कर पाता।
मेरा ऑफिस गुड़गांव में है, लेकिन में मोदी नगर में रहता हूं। घर से ऑफिस जाने में 1 से 2 घंटा लगना चाहिए। लेकिन ट्रैफिक इतनी भारी समस्या है कि घंटों लग जाते हैं। कभी दो घंटे तो कभी ढाई घंटे भी। इस पर किराया इतना भारी पड़ जाता है कार या टैक्सी का कि अगर डेली ऑफिस जाना हो तो बचत भी न हो पाए। ऐसे में कहना चाहूंगा कि मेरा समय और पैसा दोनों की बचत तो होती है।
दुनिया भर में हुई नई रिसर्च अब वर्क फ्रॉम होम (work from home) मॉडल को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलुओं को सामने ला रही हैं। हैरान करने वाली बात ये है इस हाइब्रिड वर्क यानी कुछ दिन घर और कुछ दिन ऑफिस से काम करना ज्यादा हेल्दी माना जा रहा है।
घर से काम करने वाले हाइब्रिड मॉडल ने कर्मचारियों को समय के साथ ही परिवार के साथ रहने का वक्त भी दिया है। लंबी ट्रेवलिंग की टेंशन को खत्म किया है। इसका सकारात्मक असर यह कि कर्मचारी खुद को पहले से ज्यादा प्रोडक्टिव मान रहा है और कंपनियां भी उनके काम से खुश हैं।
नाम न छापने की शर्त पर एक पब्लिशिंग हाउस के एडिटर ने बताया कि 'वर्क फ्रॉम होम का सबसे बड़ा बदलाव मेरी जिंदगी में यह रहा कि काम और निजी जीवन के बीच की लाइन लगभग खत्म हो गई। बाहर से देखने पर यह काफी सुविधाजनक लगता है, क्योंकि रोज ऑफिस जाने की भागदौड़ नहीं रहती, आने-जाने में खर्च होने वाला समय और ऊर्जा दोनों बचते हैं।
घर में काम करने से अपने हिसाब से काम करने की कुछ आजादी भी महसूस होती है। मेरे प्रोफेशन में काम ज्यादा महत्वपूर्ण था, फिक्स टाइमिंग उतनी नहीं। लेकिन कंप्यूटर के सामने हर समय उपलब्ध रहना जरूरी होता था, क्योंकि कभी भी ऑफिस से कॉल आ सकता था या फिर जरूरी जानकारी मांगी जा सकती थी।
लेकिन धीरे-धीरे महसूस हुआ कि वर्क फ्रॉम होम में मानसिक दबाव अलग तरह का होता है। ऑफिस में आप कुछ समय के लिए अपनी सीट छोड़ सकते हैं, कलीग से बात कर सकते हैं या अपने आसपास का माहौल बदल जाता है, लेकिन घर से काम में हमेशा 'अलर्ट मोड' में रहना पड़ता है। ऐसे में लगता है कि आप काम खत्म करने के बाद भी पूरी तरह काम से बाहर नहीं निकल पा रहे। इससे मानसिक थकान और तनाव बढ़ता है।
शारीरिक रूप से भी मैंने देखा कि WFH का असर पड़ता है। लगातार एक ही जगह बैठे रहना, बाहर निकलना कम होना और एक तय रूटीन का टूट जाना फिटनेस और नींद दोनों को प्रभावित करता है। कई बार काम का समय भी खिंचता चला जाता है, क्योंकि घर और ऑफिस एक ही जगह बन जाते हैं।
मुझे निजी तौर पर लगता है कि लंबे समय तक लगातार वर्क फ्रॉम होम हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं है। ऑफिस का वातावरण काम करने का एक अलग अनुशासन और फोकस देता है। घर में उतना फोकस बना पाना मुश्किल होता है, खासकर जब परिवार, बच्चे या घरेलू जिम्मेदारियां साथ हों। बीच-बीच में डिस्ट्रेक्शन आना नई बात नहीं हैं।
वर्क फ्रॉम होम से आपकी सोशल लाइफ भी प्रभावित होती है। धीरे-धीरे लोगों से मिलना-जुलना कम हो जाता है। कई बार ऐसा महसूस होता है कि आप घर पर होते हुए भी वास्तव में 'घर' में नहीं होते, क्योंकि दिमाग लगातार काम में लगा रहता है। अगर किसी जरूरी काम से बाहर जाना हो तो, भी पहले ऑफिस को इसकी जानकारी देनी पड़ती है, क्योंकि बॉस को हर समय उपलब्ध रहने की अपेक्षा बनी रहती है।
मेरे हिसाब से भविष्य में Hybrid Work Model ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है, जहां कुछ दिन ऑफिस और कुछ दिन घर से काम हो। इससे सुविधा भी बनी रहती है और इंसान पूरी तरह सामाजिक और प्रोफेशनल माहौल से कटता भी नहीं है।
वर्क फ्रॉम होम कर रहीं पब्लिशिंग हाउस की अंजना शर्मा कहती हैं कि वे 4 साल से वर्क फ्रॉम कर (Work From Home side effects) रही हैं। ज्यादातर ऐसा होता है कि ऑफिस के लिए घर पर ही ऑफिस से ज्यादा समय निकालना पड़ता है। ऐसे में बच्चों को कम समय दे पाती हूं। कई बार बच्चे शिकायत करते हैं आप टाइम नहीं देते। इवन कभी-कभी तो पति भी नाराज हो जाते हैं। कई बार समय पर खाना न बन पाना, घर को संभालने में परेशानियां होती हैं। इस परिस्थिति में कई बार मैं मानसिक रूप से थकी और खुद को हारा हुआ महसूस करती हूं। जॉब स्विच करने के बारे में भी सोचने लगती हूं। लेकिन फिर ये भी लगता है कि कहीं और मेरे मुताबिक काम नहीं मिल पाया तो क्या करूंगी?
इस मामले पर फिजिकल एक्सपर्ट कार्तिक चौहान का कहना है कि आजकल (Work From Home side effects) लगातार कम्प्यूटर वर्क या सिटिंग वर्क ने लोगों की शारीरिक समस्याएं बढ़ाई हैं।
कई रिपोर्ट्स (Work From Home side effects) बताती हैं कि WFH ने जहां लोगों को स्वतंत्रता दी है, वहीं अब स्वतंत्रता कई लोगों को कमरे या स्क्रीन तक ही सीमित भी कर रही है। जो लोग संतुलन बना पाए उनके लिए वर्क फ्रॉम होम वरदान साबित हो रहा है। लेकिन जो लोग दिन-रात ऑनलाइन की इस दुनिया में ओ गए, उनके लिए धीरे-धीरे मानसिक थकान और शारीरिक कमजोरी बड़ी समस्या बनकर उभर रहे हैं।
IIM इंदौर के डायरेक्टर हिमांशु राय कहते हैं कि वर्क फ्रॉम होम कल्चर के मैं बिल्कुल खिलाफ हूं। कोविड काल में लॉक डाउन के दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं कि घर में 24 घंटे साथ रहने वाले पति-पत्नी किस तरह झगड़े हैं। ये सामाजिक तस्वीर भूली नहीं जानी चाहिए। हिमांशु राय के मुताबिक घर ऐसी जगह है जहां ऑफिस से लौटकर आने पर लोग रिलेक्स महसूस कर पाते हैं। लेकिन वर्क फ्रॉम होम के बाद घर 'घर' कम 'ऑफिस प्लेस' ज्यादा बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में मन की शांति और सुकून तलाशना पड़ता है।IIM इंदौर के डायरेक्टर का कहना है कि हर कंपनी या संस्था वर्क फ्रॉम होम शुरू नहीं कर सकती। ऐसे में सबसे पहले उस वर्क को देखना होगा जो घर से बैठकर किया जा सकता है। उसके बाद भी कंपनियों या संस्थाओं को पूरी तरह से वर्क फ्रॉम होम नहीं, बल्कि, हाइब्रिड वर्क कल्चर फॉलो करना चाहिए। तीन दिन ऑफिस तो, तीन दिन वर्क फ्रॉम होम। यही एक आदर्श स्थिति मानी जा सकती है।वहीं अन्य एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाला समय कुछ सेक्टर्स में जहां संभव है, वहां पूरी तरह से हाइब्रिड वर्क कल्चर ही ट्रेंड में होगा।
मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि वैसे तो वर्क फ्रॉम होम मानसिक और शारीरिक दोनों ही हेल्थ को प्रभावित करता है। लेकिन वैश्विक संकट और भारतीय परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए पीएम मोदी की Work From Home अपील पर अमल करना जरूरी है।
इस दौरान सेहत को दुरुस्त रखने मेडिटेशन, एक्सरसाइज का सहारा लिया जा सकता है। अच्छी किताबें पढ़कर और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करते हुए बेहतर लाइफ स्टाइल की जा सकती है।
अमेरिका के कैलिफॉर्निया की स्टैनफॉर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े वर्क फ्रॉम होम एक्सपर्ट निक ब्लूम के मुताबिक आने वाले सालों में रिमोट और हाइब्रिड वर्क स्थायी मॉडल बन सकते हैं। उनका कहना है कि कई कंपनियों को इसका सबसे बड़ा फायदा यह मिला है कि कर्मचारी अब वहां से छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते।
इसका मतलब साफ है कि वर्क फ्रॉम होम ने हमारी जिंदगी को आसान जरूर बना दिया। अब हाइब्रिड वर्क कल्चर का भविष्य कभी खत्म नहीं होने वाला। बल्कि यह कल्चर बढ़ेगा ही। अब बस असली चुनौती यह होगी कि लोग खुद को फिजिकली या मेंटली कमजोर होने से कैसे बचा पाते हैं।