
MP High Court indore(फोटो: X)
MP High Court Judgement: सड़क दुर्घटना के एक मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला कोर्ट ने सड़क हादसे में मृत युवक के परिजन को क्लेम के तौर पर 32 लाख 20 हजार रुपए देने का आदेश बीमा कंपनी को दिया था। युवक निजी लिमिटेड कंपनी में ब्रांच मैनेजर था। क्लेम राशि से नाखुश परिजनों ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने 27 पन्नों का आदेश जारी कर जिला अदालत के आदेश में संशोधन कर क्षतिपूर्ति राशि बढ़ाकर 1 करोड़ 42 लाख रुपए कर दी। वहीं इस मुआवजा राशि के भुगतान के लिए बीमा कंपनी को निर्देश भी दे दिए हैं।
हाई कोर्ट ने जिला अदालत के फैसले में संशोधन करते हुए 27 पेज का आदेश (MP High Court Judgement) जारी किया है। इसमें कहा गया है कि इनकम टैक्स रिटर्न में दर्शाई गई आय को नहीं, व्यक्ति को प्राप्त होने वाली अंतिम सैलेरी स्लिप की आय को मान्य किया जाना चाहिए। प्रोविडेंट फंड, हाउस रेंट अलाउंस, मेडिकल समायोजन, विशेष भत्ता, लीव ट्रेवल अलाउंस के तौर पर मिली राशि इनकम टैक्स फ्री होती है। इन सभी मदों से प्राप्त राशि का लाभ केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को मिलता है। इसलिए इन सभी मदों में मिलने वाली राशि को क्लेम राशि में जोड़ना चाहिए।
मृतक के परिजन को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति राशि के लिए दुर्घटना के पूर्व जमा आयकर रिटर्न निर्णयक नहीं है, क्योंकि उसने केवल कर योग्य आय बताई है, जबकि अंतिम वेतन पर्ची रिकॉर्ड पर है। ऐसे में क्षतिपूर्ति राशि का निर्धारण करने के लिए अंतिम वेतन पर्ची में वर्णित सभी मदों की राशि जोड़कर प्रदान की जानी चाहिए।
बता दें कि रूपेश कपूर की मौत 8 सितंबर, 2006 को बेंगलुरु से हुगली जाते समय हुई थी। वे जिस टोयोटा टैक्सी में सफर कर रहे थे, उसे एक तेज रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी। मामले में आरोप था कि ट्रक चालक लापरवाही से ट्रक चला रहा था। वहीं इस दुर्घटना में अकेले रूपेश ही नहीं बल्कि दो अन्य लोगों की भी जान चली गई थी।
रूपेश कपूर की मौत के बाद पत्नी, बेटी और माता-पिता ने बाद में MACT से संपर्क किया और परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य के खोने पर मुआवजे की मांग की। अधिकरण ने 31 अक्टूबर, 2008 को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 34.20 लाख रुपए का मुआवजा देने का फैसला सुनाया।
इंदौर के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ भावना कपूर और स्वर्गीय रूपेश कपूर के अन्य कानूनी वारिसों द्वारा एक अपील हाई कोर्ट (MP High Court Judgement) में दायर की गई थी। अक्टूबर 2008 में दायर इस अपील पर जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी सुनवाई कर रहे थे। मामले में अधिकरण ने मृतक की आय का आकलन सालाना 3 लाख रुपए करते हुए 34.20 लाख रुपए का मुआवजा दिया था, जबकि दस्तावेजी सबूतों से पता चल रहा था कि उनकी कमाई इससे कहीं ज्यादा थी।
दरअसल, जब रिकॉर्ड्स जांचे गए तो पता चला रूपेश की सालाना आय 8.3 लाख रुपए दिखाई गई थी। दावेदारों के वकील ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court Judgement) के सामने दलील दी कि मृतक GE India Private Limited में इंजीनियर के तौर पर काम करता था और अपनी मौत से पहले उसे हर महीने 73,312 रुपए सैलरी मिलती थी। यह तर्क भी दिया गया कि ट्रिब्यूनल ने सैलरी सर्टिफिकेट, सैलरी स्लिप और Form-16 को गलत तरीके से खारिज कर दिया और इसके बजाय सिर्फ इनकम टैक्स (I-T) रिटर्न पर भरोसा किया। इसमें सालाना 5.86 लाख रुपए की टैक्सेबल इनकम दिखाई गई थी।
दावेदारों ने दलील दी (MP High Court Judgement) कि सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को मिलने वाले कई भत्ते और फायदे टैक्स फ्री होते हैं और इसीलिए असल कमाई का हिस्सा होने के बावजूद वे इनकम टैक्स रिटर्न में दिखाई नहीं दे सकते।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 7 मई को स्पष्ट कहा कि, 'MV एक्ट का मकसद आर्थिक लाभों के नुकसान की भरपाई करना है, जो इनकम-टैक्स एक्ट के मकसद पूरी तरह से अलग है। इनकम-टैक्स एक्ट के तहत गणना की गई आय उस आय से अलग होती है, जो किसी कर्मचारी को वास्तव में मिलती है। इसीलिए, MV एक्ट के तहत मुआवजा तय करने के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (IT Return) एकमात्र आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजा कानून का मकसद आश्रितों को हुए 'वास्तविक आर्थिक नुकसान' की भरपाई करना है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court Judgement) ने सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के Order XLI Rule 27 (अपीलीय अदालतों में अतिरिक्त सबूत पेश करना) के लागू होने के संबंध में फैसला सुनाया। कोर्तेट ने कहा, 'मोटर वाहन अधिनियम की धारा 173 के तहत अपीलें CPC के तहत पहली अपीलों के समान हैं, इससे ऐसे प्रावधान तब तक लागू होते हैं, जब तक उन्हें साफ तौर पर बाहर न कर दिया जाए।
Updated on:
14 May 2026 10:37 am
Published on:
14 May 2026 10:29 am
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