
रायपुर@ताबीर हुसैन। प्रदेश के युवा नाटककार, निर्देशक और रंगकर्मी घनश्याम साहू को नाट्य लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित किए जाने की घोषणा ने छत्तीसगढ़ के रंगमंच जगत को गौरवान्वित किया है। वर्ष 2007 से रंगमंच से जुड़े घनश्याम साहू ने अपने लेखन और निर्देशन के माध्यम से छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, सामाजिक सरोकारों और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
‘अघनिया’, ‘लाल दुपट्टा’, ‘चैती’, ‘पहटिया’ और ‘बिरसा’ जैसे चर्चित नाटकों के लेखक घनश्याम साहू का मानना है कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद और संस्कृति को संरक्षित करने का सशक्त मंच है। सम्मान की घोषणा के बाद उन्होंने अपनी रंगमंचीय यात्रा, लेखन प्रक्रिया और वर्तमान दौर में नाट्य लेखन की चुनौतियों पर पत्रिका से विस्तार से बात की।
घनश्याम साहू बताते हैं कि कलाकार बनने का सपना उनके भीतर स्कूल जीवन से ही था, लेकिन शुरुआती दिनों में मंच पर काम करने का अवसर नहीं मिला। 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक वर्ष का ब्रेक लेकर कला के क्षेत्र को समझने का फैसला किया। इस दौरान उन्होंने धर्मजयगढ़ में एक एल्बम के लिए पांच गीत लिखे और बाद में रायगढ़ के सत्यनारायण बाबा पर आधारित एक एल्बम का लेखन किया। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए गायक नीलकमल वैष्णव ने उन्हें खैरागढ़ जाने की सलाह दी। परिवार की इच्छा के विपरीत वे खैरागढ़ पहुंचे। शुरुआत में गायन सीखने गए थे, लेकिन लेखन के प्रति बढ़ती रुचि उन्हें रंगमंच की ओर ले आई।
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में योगेंद्र चौबे के मार्गदर्शन में उन्होंने रंगमंच की बारीकियां सीखीं। अध्ययन के दौरान बीए और एमए दोनों में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उनके पहले चर्चित नाटक ‘अघनिया’ ने उन्हें नाट्य लेखन की दुनिया में पहचान दिलाई और यहीं से उनकी रचनात्मक यात्रा आगे बढ़ती चली गई।
घनश्याम साहू के नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें छत्तीसगढ़ की मिट्टी, लोकसंस्कृति और आम लोगों के जीवन की झलक दिखाई देती है। वे बताते हैं कि किसी भी विषय को चुनने के बाद उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पक्षों का गहन अध्ययन करते हैं। उनके अनुसार, वे सत्य घटनाओं और समाज से जुड़े विषयों पर अधिक भरोसा करते हैं। किसी भी नाटक को लिखने से पहले उसके देशकाल, वातावरण, रहन-सहन, संस्कृति और पात्रों को समझने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि उनके नाटक दर्शकों से सीधा जुड़ाव स्थापित करते हैं।
डिजिटल युग में नाट्य लेखन की चुनौतियों पर बात करते हुए घनश्याम साहू कहते हैं कि आज लोग पढ़ने-लिखने से दूर होते जा रहे हैं और त्वरित मनोरंजन की ओर आकर्षित हैं। वे कहते हैं, “आज रील्स का दौर है और हर कोई शॉर्टकट चाहता है, लेकिन नाटक लिखना उतना आसान नहीं है जितना लोग समझते हैं। जब तक पढ़ेंगे नहीं, तब तक विषय कहां से आएंगे। एक अच्छा नाटक लिखने और समझने के लिए नाटक, कहानी और एकांकी का गंभीर अध्ययन जरूरी है। नाटक एक जीवंत विधा है और उसे जीवित रखने के लिए लगातार सीखना और उसे जीना पड़ता है।”
घनश्याम साहू को वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां युवा पुरस्कार भी मिल चुका है। नाटक लेखन, निर्देशन और सांस्कृतिक नेतृत्व के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए यह सम्मान प्रदान किया गया था। उनके प्रमुख नाटकों में ‘अघनिया’, ‘चैती’, ‘लाल दुपट्टा’, ‘बाबागिरी’, ‘पहटिया’ और ‘बिरसा’ शामिल हैं।
इनमें ‘पहटिया’ का मंचन दिल्ली, बेंगलुरु, भोपाल, नागपुर, बालाघाट और चंडीगढ़ जैसे शहरों में हुआ, जिससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली। वहीं उनके लिखे नाटक ‘बिरसा’ का मंचन हाल ही में भारत रंग महोत्सव, रायपुर में किया गया। रंगमंच के साथ-साथ उन्होंने सिनेमा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है। उनके द्वारा लिखित एवं निर्देशित फिल्मों में ‘कुरुक्षेत्र’, ‘झन जाबे परदेस’, ‘दंतेला’, ‘मुरली’ और ‘असुर’ प्रमुख हैं।
संगीत नाटक अकादमी सम्मान की घोषणा को छत्तीसगढ़ी रंगमंच के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह सम्मान न केवल घनश्याम साहू की रचनात्मक साधना का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है, बल्कि उन युवा कलाकारों के लिए भी प्रेरणा है जो रंगमंच के माध्यम से समाज और संस्कृति से जुड़ना चाहते हैं।