
Crop Diversity: आज बाजार जाइए तो खाने के विकल्प कम नहीं दिखते। चावल, गेहूं, दालें, सब्जियां, फल, मोटे अनाज और पैकेट में मिलने वाले दर्जनों खाद्य पदार्थ आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन खेतों की तस्वीर बाजार से अलग कहानी बता रही है। देश के कई हिस्सों में खेती धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा फसलों पर ज्यादा निर्भर होती जा रही है। इसका असर सिर्फ किसान की आय या खेत की मिट्टी पर नहीं पड़ेगा, बल्कि आने वाले समय में हमारी थाली तक पहुंच सकता है।
2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत के 711 जिलों में 1997 से 2019 के बीच 56 फसलों की खेती के आंकड़ों का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने फसल विविधता, फसलों की समान हिस्सेदारी और अलग-अलग फसलों की संख्या जैसे संकेतकों के आधार पर बदलाव को समझा। नतीजा दिलचस्प भी है और चिंता पैदा करने वाला भी। अध्ययन में करीब 18 प्रतिशत जिलों में फसल विविधता बढ़ने की स्पष्ट प्रवृत्ति मिली, लेकिन लगभग 15 प्रतिशत जिलों में विविधता घटने की महत्वपूर्ण प्रवृत्ति सामने आई।
इसे आसान भाषा में समझें तो जिस खेत या इलाके में सिर्फ एक-दो फसलों का दबदबा हो, वहां फसल विविधता कम मानी जाएगी। इसके उलट जहां किसान अनाज, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, नकदी फसल और दूसरी फसलें अलग-अलग मात्रा में उगाते हैं, वहां विविधता ज्यादा होती है। यह अंतर सिर्फ कृषि विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है।
मान लीजिए किसी इलाके में किसान लगातार एक ही फसल पर निर्भर हैं। अगर अचानक मौसम बिगड़ गया, किसी बीमारी ने फसल को प्रभावित किया या उस फसल का बाजार भाव गिर गया, तो किसान के पास दूसरा विकल्प सीमित हो सकता है। लेकिन अलग-अलग फसलों का मिश्रण ऐसे झटकों के सामने कुछ सुरक्षा दे सकता है। यही वजह है कि शोध में फसल विविधता को कृषि की जलवायु-लचीलापन क्षमता से भी जोड़ा गया है।
फसल विविधता का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसका असर खेत से कहीं आगे जाता है। भारत में भोजन की आदतें भले ही क्षेत्र के अनुसार अलग हों, लेकिन अनाज, दालें और मोटे अनाज हमारी खाद्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सरकार के हाउसहोल्ड कंजम्शन एक्सपेंडिचर (Household Consumption Expenditure Survey)2023-24 में भी चावल, गेहूं और मोटे अनाज की अलग-अलग श्रेणियों को घरेलू उपभोग के आंकड़ों में दर्ज किया गया है। मोटे अनाज की श्रेणी में ज्वार, बाजरा, मक्का, जौ, रागी और छोटे मिलेट्स शामिल हैं।
इसका मतलब है कि खेत में कौन-सी फसल कितनी जगह ले रही है, यह अंततः इस बात से जुड़ सकता है कि बाजार में कौन-से खाद्य पदार्थ कितनी मात्रा में उपलब्ध होंगे और किस कीमत पर मिलेंगे।
अध्ययन में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर सामने आया। दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्र के कई हिस्सों में फसल विविधता अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। दूसरी ओर उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में विविधता कम थी।
शोध में एक महत्वपूर्ण उदाहरण यह भी सामने आया कि कुछ क्षेत्रों में फसल संरचना का 86 प्रतिशत हिस्सा चावल से जुड़ा था, जो वहां एक तरह की मोनोकल्चर यानी सीमित फसल-निर्भरता की ओर संकेत करता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि चावल या गेहूं जैसी प्रमुख फसलें समस्या हैं। असली सवाल यह है कि किसी क्षेत्र की पूरी कृषि व्यवस्था कितनी फसलों पर निर्भर हो गई है।
यह फैसला हमेशा किसान की पसंद भर नहीं होता। जिस फसल का बाजार मजबूत हो, जिसकी खरीद आसान हो, जिसके लिए सिंचाई और तकनीक उपलब्ध हो या जिसकी सरकारी खरीद का भरोसा ज्यादा हो, किसान स्वाभाविक रूप से उसी ओर ज्यादा जा सकता है। लेकिन लंबे समय में अगर बड़ी संख्या में किसान एक ही दिशा में चले जाते हैं तो, स्थानीय कृषि व्यवस्था में विविधता कम हो सकती है। यहीं पर खेती, बाजार और उपभोक्ता की थाली एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
पहला जोखिम मौसम का है। जलवायु परिवर्तन के दौर में अत्यधिक गर्मी, अनियमित बारिश, सूखा या बाढ़ जैसी घटनाएं किसी खास फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। अगर किसी इलाके की खेती कुछ सीमित फसलों पर बहुत ज्यादा निर्भर है तो, ऐसे झटके का असर व्यापक हो सकता है।
दूसरा जोखिम कीमत का है। किसी एक फसल का उत्पादन कम हुआ तो उसकी कीमत बढ़ सकती है और इसका असर सीधे उपभोक्ता की रसोई पर पड़ सकता है।
तीसरा जोखिम पोषण से जुड़ा है। अलग-अलग फसलों का उत्पादन और सेवन खाद्य विविधता को बढ़ाता है। इसलिए खेतों की विविधता को केवल किसान की समस्या मानना अधूरा होगा।
अध्ययन बताता है कि भारत के सभी इलाकों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ जिलों में विविधता बढ़ी, जबकि कुछ में घटती गई। पुराने शोध में भी यह सामने आया था कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में फसल विविधता की दिशा अलग-अलग रही है। यानी असली कहानी यह नहीं कि पूरे देश की खेती एक जैसी हो गई है। असली कहानी यह है कि कुछ इलाकों में खेती के विकल्प सिमट रहे हैं, जबकि दूसरे इलाकों में विविधता बढ़ रही है। और यही वह बदलाव है जिस पर आम उपभोक्ता की नजर शायद ही जाती है।
आज हमारी थाली में किसी चीज की कमी दिखाई नहीं देती। बाजार में विकल्प मौजूद हैं। लेकिन खाद्य व्यवस्था की मजबूती सिर्फ बाजार की अलमारियों से तय नहीं होती। उसकी शुरुआत खेत से होती है।
अगर खेतों में अलग-अलग फसलों की जगह सीमित फसलों का दबदबा बढ़ता गया तो, भविष्य में मौसम, बीमारी या बाजार के झटकों का असर ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए फसल विविधता की चर्चा सिर्फ किसानों की आय या कृषि नीति की चर्चा नहीं है। यह उस थाली की कहानी है जिसमें, हम आज खाना खा रहे हैं और वह भविष्य की थाली कैसी होगी, इसका फैसला कहीं दूर खेत में हो रहा है।