
भारत में एथेनॉल की बढ़ती उत्पादन क्षमता और घरेलू ब्लेंडिंग लक्ष्य अब वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा को नए आयाम दे रहे हैं। इस बदलाव का भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव होगा, कौन से अवसर और चुनौतियां सामने हैं, और आगे की राह क्या हो सकती है।
भारत ने एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत 2013‑14 में मात्र 1.5 प्रतिशत ब्लेंडिंग से शुरुआत की थी, लेकिन 2025‑26 तक यह लक्ष्य 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का हासिल कर लिया गया - वह भी पांच साल पहले, यानी समय से पूर्व ही। उत्पादन क्षमता भी 2014 में 421 करोड़ लीटर से बढ़कर 2026 में लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई। इस तेज विस्तार ने भारत को अब घरेलू ब्लेंडिंग से कहीं अधिक उत्पादन क्षमता वाला देश बना दिया है।
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा ब्लेंडिंग के लिए एथेनॉल की मांग अपेक्षित मात्रा से कम होने के कारण, 2025‑26 में एथेनॉल की आपूर्ति प्रस्तावित मात्रा लगभग 1,776 करोड़ लीटर रही, जबकि आवश्यकता मात्र 1,050 करोड़ लीटर थी - यानी लगभग 69 प्रतिशत अधिक। इस अतिरिक्त उत्पादन को अब निर्यात के माध्यम से उपयोग में लाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के अनुसार, सरकार इस प्रस्ताव के प्रति सकारात्मक है और नेपाल, बांग्लादेश तथा इंडोनेशिया जैसे पड़ोसी देशों को संभावित निर्यात गंतव्य माना जा रहा है।
लेकिन कुछ बाधाएं भी हैं। सरकार ने खाद्य फसलों से बने ईंधन एथेनॉल के निर्यात पर रोक लगाई है, और वैश्विक बाजार में भारत के अंडेनैचर्ड इंडस्ट्रियल एथेनॉल की प्रतिस्पर्धा सीमित है क्योंकि यह संसाधन-प्रधान फीडस्टॉक्स (जैसे गन्ना और मक्का) से बनता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट बताती है कि भारत की बायोएनर्जी (जिसमें एथेनॉल और CBG शामिल हैं) 2025 से 2030 के बीच 293 पेटाजूल्स से बढ़कर 429 पेटाजूल्स हो सकती है, यानी 50 प्रतिशत से अधिक वृद्धि संभव है।
IEA ने चार प्रमुख सुझाव दिए हैं: दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करना, आपूर्ति श्रृंखला और बुनियादी ढांचे का विकास, नवाचार को बढ़ावा देना, और कार्बन लेखांकन व स्थिरता फ्रेमवर्क तैयार करना - ताकि भारत वैश्विक बाजार में प्रमाणन और निर्यात के अवसर पा सके।
मॉनसून पर एल नीनो का असर गन्ने की पैदावार को प्रभावित कर सकता है, जिससे अगले तीन सीजन तक भारत के पास निर्यात के लिए पर्याप्त चीनी नहीं बच सकती है। इस बीच, गन्ने का एक बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में डाइवर्ट हो रहा है - 2025‑26 में अनुमानित उत्पादन लगभग 30.95 मिलियन टन था, जिसमें से 3.4 मिलियन टन चीनी एथेनॉल में इस्तेमाल हुई। इससे भारत की चीनी निर्यात क्षमता प्रभावित हो रही है, जबकि घरेलू ब्लेंडिंग लक्ष्य को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
इसके अलावा, एपी की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में E20 ब्लेंडिंग ने भारत के कच्चे तेल आयात में लगभग 2.5 प्रतिशत की कमी लाने में मदद की। यह ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा बचत के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
वैश्विक स्तर पर, ब्राजील एथेनॉल उत्पादन और निर्यात में अग्रणी है, जबकि भारत का हिस्सा लगभग 2.3% - 3.7% है। लेकिन भारत की तेजी से बढ़ती उत्पादन क्षमता और ब्लेंडिंग में सफलता इसे वैश्विक बायोफ्यूल बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही है।
| क्षेत्र | वर्तमान स्थिति | आगे की संभावनाएं |
|---|---|---|
| उत्पादन क्षमता | लगभग 2,000 करोड़ लीटर | E25‑E30 ब्लेंडिंग तक विस्तार, ग्रेन-आधारित एथेनॉल |
| घरेलू ब्लेंडिंग | 20% EBP हासिल | E25‑E30 तक बढ़ाना, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा |
| निर्यात | प्रतिबंधित, प्रतिस्पर्धा सीमित | नीति सुधार, प्रमाणन, पड़ोसी देशों में बाजार |
| चुनौतियां | एल नीनो, चीनी निर्यात में कमी, संसाधन दबाव | आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना, जल प्रबंधन, स्थिरता फ्रेमवर्क |
भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से शामिल होने के लिए नीति में लचीलापन, तकनीकी नवाचार और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (जिनमें E85 तक एथेनॉल मिल सकता है) को बढ़ावा देने से मांग बढ़ सकती है, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में संकेत मिलता है।
भारत ने घरेलू ब्लेंडिंग लक्ष्य समय से पहले पूरा कर लिया है और उत्पादन क्षमता में जबरदस्त विस्तार किया है। अब अतिरिक्त उत्पादन को वैश्विक बाजार में ले जाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन इसके लिए नीति, बुनियादी ढांचे, प्रमाणन और पर्यावरणीय संतुलन पर ध्यान देना आवश्यक है। यदि यह संतुलन बना रहा, तो भारत न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक बायोफ्यूल बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ा सकता है।
नीति निर्माताओं, उद्योग और किसानों को मिलकर एक ऐसा रोडमैप तैयार करना होगा जो उत्पादन, निर्यात और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को साथ लेकर चले। यह न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में भी भारत की भूमिका को मजबूत करेगा।