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कैश कांड मामला: संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा, जांच टीम ने माना दोषी, जानें पूरी घटना

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के घर 14 मार्च 2025 की रात बड़ी मात्रा में कैश मिला था। कैश कांड मामले की जांच कर रही कमेटी ने जस्टिस यशवंत वर्मा को दोषी माना है। आइए जानते हैं, क्या है पूरा मामला?
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 12, 2026

Delhi high court former judge yashwant verma

कैश कांड मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा दोषी (फोटो सोर्स- Chatgpt)

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रहे बहुचर्चित ‘कैश कांड’ मामले में बुधवार को बड़ी जानकारी सामने आई है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत गठित 3 सदस्यीय इंक्वायरी कमेटी ने यशवंत वर्मा को दोषी माना है। जांच कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में औपचारिक रूप से पेश कर दी गई है। इस रिपोर्ट में कमेटी ने जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोपों को सही और साबित माना है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद पिछले साल 14 मार्च 2025 की रात शुरू हुआ था, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास-30, तुगलक क्रिसेंट में आग लगी थी। आग बुझाने पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम को घर के स्टोररूम से 500-500 रुपये के नोटों से भरे बोरे मिले, जिनमें से कुछ नोट जले हुए, कुछ अधजले और कुछ गीले थे। घर में नकदी की बरामदगी के समय जस्टिस वर्मा खुद मौजूद नहीं थे।

घटना के दौरान घर में ताला लगा हुआ था और यशवंत वर्मा कहीं बाहर गए थे। इस घटना के सामने आते ही हड़कंप मच गया और जस्टिस वर्मा से दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायिक कामकाज वापस ले लिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी जस्टिस यशवंत वर्मा को न्यायिक कार्य से दूर रखा गया।

जांच प्रक्रिया और इंक्वायरी कमेटी का गठन

दिल्ली स्थिति घर में नोट मिलने की घटना के बाद शुरुआत में तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना ने इस मामले की जांच के लिए एक इन-हाउस कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने साक्ष्य जुटाए और मई 2025 में अपनी रिपोर्ट CJI को सौंप दी। जस्टिस वर्मा ने इस आंतरिक जांच और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

इसके बाद संसद के 146 से अधिक सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को याचिका सौंपकर जस्टिस वर्मा को पद से हटाने (महाभियोग) की मांग की और बाद में यह संख्या 200 से अधिक हो गई। इसी आधार पर स्पीकर ओम बिरला ने अगस्त 2025 में न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के प्रावधानों के तहत 3 सदस्यीय जजेज इंक्वायरी कमेटी का गठन किया। इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार ने की, जबकि बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य इसके सदस्य थे।

जांच कमेटी को क्या मिला?

लंबी जांच के बाद कमेटी ने 18 मई 2026 को अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी। इस रिपोर्ट को औपचारिक रूप से बुधवार को संसद की पटल पर रखा गया। लोकसभा में महासचिव उत्पल कुमार सिंह और राज्यसभा में महासचिव पीसी मोदी ने यह रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के दो खंड हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पेश किए गए। इसके साथ ही जांच के दौरान दर्ज सभी मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य भी सदन के पटल पर रखे गए।

जांच कमेटी जस्टिस वर्मा को दोषी माना

कैश कांड की जांच करने वाली कमेटी ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे तीनों आरोपों (आर्टिकल I, II और III) को साबित माना। पहले आरोप पर कमेटी ने कहा कि आधिकारिक आवास के स्टोररूम में मिले भारी मात्रा में 500 रुपये के नोटों की मौजूदगी, स्रोत या मालिकाना हक को लेकर जस्टिस वर्मा संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाए। दूसरे आरोप में कमेटी ने पाया कि अहम सबूतों को न तो सुरक्षित रखा गया और न ही संरक्षित किया गया।

स्टोररूम को कानूनी रूप से सील किए जाने और जांच से पहले ही वहां की स्थिति बदल चुकी थी। बाद में करेंसी नोट भी उपलब्ध नहीं रहे, जिसका कोई संतोषजनक कारण सामने नहीं आया। हालांकि, कमेटी ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष इस आधार पर नहीं है कि जस्टिस वर्मा ने व्यक्तिगत रूप से नोट हटाए। यह सबूत सुरक्षित रखने में विफलता और परिसर से जुड़े स्टाफ के जरिए स्थिति में बदलाव होने देने पर आधारित है।

तीसरे आरोप पर कमेटी ने जस्टिस वर्मा के 22 मार्च 2025 के जवाब और उसके बाद के रुख की समीक्षा की। कमेटी ने पाया कि जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण में वह स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी नहीं दिखी, जिसकी अपेक्षा की जाती है। स्वतंत्र गवाहों के साक्ष्य के आधार पर कमेटी ने उनके जवाब को टालमटोल भरा और असंतोषजनक पाया।

जस्टिस वर्मा पर कार्रवाई होगी?

कमेटी ने जांच से जुड़े सभी दस्तावेज, साक्ष्य और सामग्री कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई के लिए सौंप दी है। बुधवार को मानसून सत्र के 18वें दिन दोनों सदनों में हंगामे के बीच यह रिपोर्ट पेश हुई। जस्टिस वर्मा ने पद से हटाए जाने की आशंका के चलते इस साल अप्रैल में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन राष्ट्रपति की ओर से अब तक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। ऐसे में अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रिपोर्ट के आधार पर संसद में आगे संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया यानी महाभियोग प्रस्ताव किस दिशा में बढ़ती है।