
El Nino Predictions:प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान कुछ डिग्री बढ़ना दुनिया के मौसम का रुख बदल सकता है। यही है एल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना, जिसके संकेत मिलते ही मौसम वैज्ञानिक, सरकारें और राहत एजेंसियां सतर्क हो जाती हैं। कारण साफ है कि इसका असर मानसून, सूखा, बाढ़, हीटवेव, कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा तक फैल सकता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एल नीनो आएगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या हम उसके प्रभाव का समय रहते सही अनुमान लगा सकते हैं?
एल नीनो का पूर्वानुमान किसी एक संकेत से नहीं लगाया जाता। वैज्ञानिक कई प्रकार के डेटा को एक साथ विश्लेषित करते हैं।
एल नीनो का समय रहते अनुमान मिल जाता है तो सरकारें और एजेंसियां इससे होने वाले नुकसानों को कम करने की तैयारी पहले से ही कर सकती हैं।
यही वजह है कि मौसम पूर्वानुमान अब केवल वैज्ञानिक जानकारी नहीं, बल्कि नीति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं।
भारत में सामान्य तौर पर एल नीनो के दौरान मानसून कमजोर या अनियमित रहने की संभावना बढ़ जाती है। इसका असर कृषि, जल भंडार और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि हर एल नीनो वर्ष में समान प्रभाव नहीं होता, क्योंकि Indian Ocean Dipole (IOD) जैसी अन्य जलवायु प्रणालियां भी परिणाम बदल सकती हैं। हाल के आकलनों में WMO ने संकेत दिया है कि सकारात्मक IOD कुछ हद तक एल नीनो के प्रभाव को संतुलित कर सकता है।
कहना होगा कि एल नीनो का पूर्वानुमान भविष्य बताने का दावा नहीं करता, बल्कि संभावित जोखिमों के लिए समय रहते तैयारी का अवसर देता है। जितनी सटीक और समय पर भविष्यवाणी होगी, उतना ही बेहतर तरीके से देश कृषि, जल प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा राहत की योजना बना सकेंगे। बदलती जलवायु के दौर में एल नीनो की निगरानी अब केवल मौसम विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।