
Genome India Project genetic variants: अगर किसी भारतीय मरीज की जेनेटिक रिपोर्ट में बीमारी का खतरा बताया जाए या किसी दवा की डोज तय की जाए, तो क्या वह प्रेडिक्शन भारतीय आबादी के डीएनए के हिसाब से उतनी ही सटीक है जितनी यूरोपीय आबादी के लिए? यह सवाल अब सिर्फ वैज्ञानिक बहस नहीं रह गया है।
भारत के सबसे व्यापक पॉपुलेशन-जीनोमिक्स इनिशिएटिव्स में से एक जीनोमइंडिया प्रोजेक्ट के विस्तृत जेनेटिक एनालिसिस ने दिखाया है कि भारतीय आबादी में जेनेटिक वेरिएशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन ग्लोबल डेटाबेसेज में दर्ज ही नहीं था, जिन पर दुनिया भर में जीनोमिक रिसर्च और कई जेनेटिक प्रेडिक्शन टूल्स निर्भर करते हैं।
2026 में जारी जीनोम इंडिया के फ्लैगशिप मैनुस्क्रिप्ट के अनुसार 83 भारतीय पॉपुलेशन ग्रुप्स से लिए गए 9,768 स्वस्थ लोगों के होल जीनोम्स के विश्लेषण में करीब 12.99 करोड़ हाई-कॉन्फिडेंस जेनेटिक वेरिएंट्स मिले। इनमें करीब 4.4 करोड़ वेरिएंट्स ऐसे थे जो प्रमुख ग्लोबल जेनेटिक डेटाबेसेज में पहले रिपोर्ट नहीं हुए थे।
यह भारत का एक नेशनल जीनोमिक्स प्रोजेक्ट है, जिसे डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के समर्थन से शुरू किया गया। इसका उद्देश्य भारत की जेनेटिक डायवर्सिटी को बड़े पैमाने पर मैप करना है। प्रोजेक्ट का औपचारिक लॉन्च जनवरी 2020 में हुआ था और सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च, आईआईएससी बेंगलुरु इसकी कोऑर्डिनेटिंग इंस्टीट्यूशन रही है।
भारत की आबादी जेनेटिक रूप से एक जैसी नहीं है। लंबे समय से माइग्रेशन, पॉपुलेशन मिक्सिंग और एंडोगैमी (यानी अपने ही कम्युनिटी ग्रुप के भीतर विवाह) जैसी प्रक्रियाओं ने जेनेटिक स्ट्रक्चर को प्रभावित किया है। डेटासेट में 30 ट्राइबल और 53 नॉन-ट्राइबल पॉपुलेशंस शामिल थीं। यही डायवर्सिटी किसी एक "इंडियन जीनोम" की धारणा को चुनौती देती है।
ग्लोबल जीनोमिक्स रिसर्च में यूरोपीय एन्सेस्ट्री वाले पॉपुलेशंस का रिप्रेजेंटेशन लंबे समय से बहुत ज्यादा रहा है, जिससे साउथ एशियन पॉपुलेशंस की डायवर्सिटी कम दिखाई देती है। 2025 में नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित पेपर ने भी भारत को ग्लोबल जीनोमिक लैंडस्केप में सीवियरली अंडररिप्रेजेंटेड बताया था।
इससे बीमारी की जेनेटिक प्रेडिक्शन पर असर पड़ सकता है। किसी एक पॉपुलेशन के लिए बनाए गए पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर (पीआरएस) को दूसरी पॉपुलेशन पर इस्तेमाल करने से उसकी एक्युरेसी घट सकती है, क्योंकि एलील फ्रीक्वेंसीज अलग हो सकती हैं।
हम सभी किसी दवा को एक जैसी गति से मेटाबोलाइज नहीं करते। इसी फील्ड को फार्माकोजेनॉमिक्स कहा जाता है। एनालिसिस में 82 इंडियन पॉपुलेशंस के लिए फार्माकोजेनॉमिक डायवर्सिटी का अध्ययन किया गया, जिसमें औसतन एक व्यक्ति में लगभग चार एक्शनेबल फार्माकोजेनॉमिक वेरिएंट्स पाए गए।
जैसे -
रिसर्चर्स ने इन वेरिएंट्स की फ्रीक्वेंसीज भारतीय पॉपुलेशन ग्रुप्स में अलग-अलग पाईं, यानी भविष्य में कुछ दवाओं के लिए जीनोटाइप-गाइडेड डोजिंग ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
अगर कोई छोटा पॉपुलेशन लंबे समय तक आइसोलेटेड रहा हो, तो कोई वेरिएंट उसमें सामान्य पॉपुलेशन के मुकाबले ज्यादा फ्रीक्वेंसी पर पहुंच सकता है। जैसे MPZL2 वेरिएंट, जो हेरेडिटरी डेफनेस से जुड़ा है। यह ऑस्ट्रोएशियाटिक ट्राइबल ग्रुप में करीब 7% फ्रीक्वेंसी पर मिला। ध्यान रहे, यह वेरिएंट फ्रीक्वेंसी है, डिजीज प्रिवेलेंस नहीं।
इसके अलावा LPA जीन में लोअर Lp(a) लेवल्स और कार्डियोवैस्कुलर रिस्क से जुड़े वेरिएंट्स, और CD36 जीन में लिपिड मेटाबॉलिज्म से जुड़े वेरिएंट्स भी मिले।
बिल्कुल नहीं। "नोवल वेरिएंट" का मतलब सिर्फ यह है कि वह प्रमुख रेफरेंस डेटाबेसेज में पहले रिपोर्ट नहीं हुआ था। इनमें से ज्यादातर हार्महीन या पॉपुलेशन-स्पेसिफिक हो सकते हैं, और सिर्फ कुछ ही मेडिकली रेलिवेंट हो सकते हैं।
2026 का यह विस्तृत मैनुस्क्रिप्ट अभी मेडआरजिव पर प्रीप्रिंट के रूप में उपलब्ध है, यानी अभी पीयर-रिव्यू प्रोसेस से नहीं गुजरा है। हालांकि जीनोम इंडिया का पहला पेपर अप्रैल 2025 में नेचर जेनेटिक्स में पीयर-रिव्यूड पब्लिकेशन के रूप में छप चुका है।
करीब 9,768 लोगों और 83 पॉपुलेशंस के एनालिसिस में 4.4 करोड़ वेरिएंट्स ग्लोबल डेटाबेसेज में पहले अनरिपोर्टेड मिले। इनमें से हर वेरिएंट बीमारी का कारण नहीं है, लेकिन यह साफ करता है कि भारत के लिए जेनेटिक रिसर्च में 'एक साइज फिट्स ऑल' अप्रोच पर्याप्त नहीं हो सकती। भारत का अपना जेनेटिक रेफरेंस मैप सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की प्रिसिजन मेडिसिन के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बन सकता है।