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भारत में कितनी जमीन सरकार के पास है? रेलवे, रक्षा, वन और भूमि बैंक की पूरी कहानी

Government land in India : जानिए भारत में सरकार के पास कितनी जमीन है! पढ़ें रक्षा मंत्रालय, रेलवे, वन विभाग और इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक के आधिकारिक आंकड़े, खाली जमीन और अतिक्रमण की पूरी कहानी।
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Aug 04, 2026
Government land in India
Government land in India

भारत जैसे विशाल देश में जमीन सिर्फ रहने या खेती के लिए नहीं, बल्कि रक्षा, परिवहन, पर्यावरण और औद्योगिक विकास के लिए भी उतनी ही जरूरी है। सरकार अलग-अलग विभागों के जरिए देश की एक बड़ी हिस्सेदारी की मालिक है पर यह जमीन कितनी है, कहां है, और क्यों इसका एक बड़ा हिस्सा खाली या अतिक्रमण का शिकार पड़ा है? यह एक्सप्लेनर रक्षा मंत्रालय, रेल मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और DPIIT के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है।

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 32.87 करोड़ हेक्टेयर (3.287 करोड़ वर्ग किलोमीटर) है। दुनिया के कुल भूमि क्षेत्र का करीब 2.4%। इसमें से मोटे तौर पर करीब आधा हिस्सा खेती के लिए, करीब 21-25% वन क्षेत्र के लिए, और बाकी बंजर, आवासीय, औद्योगिक व अन्य उपयोगों के लिए है।

सरकार के पास मौजूद जमीन का कोई एक समेकित आधिकारिक आंकड़ा प्रकाशित नहीं होता (क्योंकि यह अलग-अलग मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक उपक्रमों में बंटा हुआ है), पर तीन सबसे बड़े "जमीन मालिक" विभाग साफ तौर पर पहचाने जा सकते हैं — रक्षा मंत्रालय, भारतीय रेलवे और वन विभाग।

रक्षा मंत्रालय: देश का सबसे बड़ा एकल भू-स्वामी

रक्षा मंत्रालय के पास करीब 17.95-18 लाख एकड़ (करीब 7.27 लाख हेक्टेयर) जमीन है, जो इसे भारत सरकार के भीतर सबसे बड़ा एकल भू-स्वामी बनाता है। इसमें से:

  • करीब 1.6 लाख एकड़ जमीन 62 अधिसूचित छावनियों (कैंटोनमेंट) के भीतर है
  • बाकी करीब 16.35-16.38 लाख एकड़ जमीन छावनियों के बाहर, देशभर में करीब 4,900 अलग-अलग जगहों (पॉकेट्स) में फैली हुई है।
  • प्रशिक्षण मैदान, फायरिंग रेंज, एयरफील्ड, डिपो, आवास और कार्यालयों के लिए

आजादी के बाद पहली बार, तीन साल से ज्यादा समय तक चले एक विशाल डिजिटल सर्वे अभियान में ड्रोन, सैटेलाइट और 3D मॉडलिंग का इस्तेमाल करते हुए इस पूरी जमीन (17.78 लाख एकड़) का सर्वेक्षण पूरा किया गया है, ताकि सीमांकन साफ हो और अतिक्रमण रोका जा सके। सरकार ने हाल में एक नई रक्षा भूमि नीति भी लाई है, जो करीब 250 साल में पहली बड़ी नीतिगत समीक्षा है। इसका मकसद खाली पड़ी रक्षा भूमि का बेहतर व्यावसायिक और विकास-उन्मुख इस्तेमाल करना है, जबकि पहले इस पर सख्त पाबंदियां थीं।

भारतीय रेलवे: सबसे बड़ी परिचालन जमीन

भारतीय रेलवे के पास कुल 4.9 लाख हेक्टेयर जमीन है। जो पटरियों, स्टेशनों, वर्कशॉप और आवासीय कॉलोनियों के लिए इस्तेमाल होती है। दिलचस्प बात यह है कि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में बताया कि इस विशाल जमीन में से सिर्फ 1% (करीब 4,930 हेक्टेयर) ही व्यावसायिक उपयोग में लाई जा रही है, जिसका प्रबंधन Rail Land Development Authority (RLDA) करता है। इसके जरिए वित्त वर्ष 2024-25 में रेलवे ने ₹3,129 करोड़ की कमाई की, जो पिछले साल से 16% ज्यादा है।

रेलवे के पास 62,068 हेक्टेयर जमीन खाली पड़ी है, हालांकि इसमें से 60-70% जमीन पटरियों के किनारे संकरी पट्टियों में है, जो पहले से ही अलग-अलग परिचालन कामों में इस्तेमाल होती है और वास्तव में "खाली" नहीं मानी जा सकती।

अतिक्रमण की समस्या: मार्च 2025 तक रेलवे की 1,068.54 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा था। यह आंकड़ा साल-दर-साल बढ़ा है। 2021-22 में यह घटकर 782.81 हेक्टेयर हुआ था, पर 2023-24 में यह बढ़कर 1,078.55 हेक्टेयर तक पहुंच गया, यानी सिर्फ एक साल में करीब 268 हेक्टेयर की बढ़ोतरी। रेलवे बोर्ड में इसके लिए एक अलग 'भूमि एवं सुविधा निदेशालय' भी है, फिर भी अतिक्रमण पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पाई है।

रिकॉर्ड-रखरखाव की समस्या भी बड़ी है। कई राज्यों में रेलवे की जमीन को गलती से सड़क या पगडंडी के तौर पर दर्ज कर दिया गया है, जिससे विवाद बढ़ते हैं। इसे ठीक करने के लिए महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने 2026 में रेलवे भूमि को स्पष्ट रूप से 'भारत सरकार, रेलवे' के नाम दर्ज करने का फैसला लिया है।

वन भूमि: सबसे बड़ी श्रेणी, आकार में सबसे विशाल

अगर सिर्फ आकार की बात करें तो वन भूमि इन सबसे कहीं आगे है। भारत में कुल वन एवं वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17% है। इसमें से शुद्ध वनावरण 7,15,343 वर्ग किमी (21.76%) है। ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेज़ असेसमेंट (GFRA) 2025 के मुताबिक भारत अब वन क्षेत्र के मामले में दुनिया में 9वें स्थान पर पहुंच गया है, और पिछले दशक में वन विस्तार के मामले में चीन और रूस के बाद तीसरे स्थान पर है।

वन भूमि की एक खासियत यह है कि यह सामान्य 'सरकारी संपत्ति' से अलग है। इसमें आरक्षित वन (Reserved Forests), संरक्षित वन (Protected Forests), अवर्गीकृत वन और राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि शामिल है, जिन पर स्थानीय समुदायों और आदिवासियों के परंपरागत अधिकार भी जुड़े होते हैं। इसलिए वन भूमि को रेलवे या रक्षा भूमि की तरह सीधे 'व्यावसायिक इस्तेमाल" के लिए नहीं खोला जा सकता। इसका प्रबंधन वन अधिकार कानून और पर्यावरण संरक्षण नियमों के तहत होता है।

बिखरी हुई खाली जमीन

रक्षा, रेलवे और वन के अलावा, बाकी केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के पास भी बड़ी मात्रा में जमीन है, जिसका बड़ा हिस्सा इस्तेमाल में नहीं है। एक पुराने पर व्यापक ऑडिट में सामने आया था कि सिर्फ 51 में से 41 मंत्रालयों और 300 में से 22 सार्वजनिक उपक्रमों की जानकारी जोड़ने पर ही केंद्र सरकार के पास मौजूद खाली जमीन दिल्ली के आकार से करीब नौ गुना निकली। यानी करीब 13,000 वर्ग किलोमीटर। चूंकि यह गणना अधूरे आंकड़ों पर आधारित थी (कई मंत्रालय शामिल नहीं थे, और गृह मंत्रालय ने सुरक्षा कारणों से जानकारी नहीं दी), असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।

भूमि बैंक (Land Bank) की अवधारणा क्या है?

'भूमि बैंक' एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सरकार खाली, अप्रयुक्त या अधिग्रहित जमीन का एक डिजिटल डेटाबेस तैयार करती है, ताकि उद्योगों, निवेशकों या अन्य परियोजनाओं को जल्दी और पारदर्शी तरीके से जमीन आवंटित की जा सके। बिना नए सिरे से लंबी अधिग्रहण प्रक्रिया से गुजरे। इसके पीछे मकसद है:

  • तैयार जमीन का भंडार रखना ताकि परियोजनाओं में देरी न हो
  • GIS तकनीक से डिजिटल मैपिंग करना, ताकि जमीन का क्षेत्रफल, स्थान, मालिकाना हक और मौजूदा इस्तेमाल साफ तौर पर दर्ज हो
  • पारदर्शी आवंटन, ताकि निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को जमीन की उपलब्धता की स्पष्ट जानकारी मिले

भारत का सबसे बड़ा उदाहरण India Industrial Land Bank (IILB): वाणिज्य मंत्रालय के अधीन DPIIT (Department for Promotion of Industry and Internal Trade) ने यह केंद्रीकृत GIS-आधारित प्लेटफॉर्म बनाया है, जो देशभर के औद्योगिक क्षेत्रों की जानकारी एक जगह देता है। दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक:

  • इसमें 4,523 औद्योगिक पार्क शामिल हैं, जो कुल 7.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं
  • इनमें से करीब 1.35 लाख हेक्टेयर जमीन अभी भी औद्योगिक विकास के लिए उपलब्ध है
  • इन पार्कों में कुल 6.45 लाख से ज्यादा प्लॉट हैं, जिनमें से 1.25 लाख से ज्यादा प्लॉट खाली पड़े हैं

यह प्लेटफॉर्म निवेशकों को सीधे यह देखने की सुविधा देता है कि किस राज्य में, किस औद्योगिक क्षेत्र में जमीन उपलब्ध है। जिससे प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया तेज होती है।

राज्य स्तर पर भी प्रयोग: कर्नाटक, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने भी अपने-अपने भूमि बैंक बनाए हैं। उत्तर प्रदेश ने हाल में 42,000 से ज्यादा औद्योगिक इकाइयों का सर्वे शुरू किया है ताकि बंद पड़ी या कम-इस्तेमाल वाली इकाइयों की जमीन को चिन्हित कर नए भूमि बैंक में जोड़ा जा सके।

चुनौतियां भी हैं: कई राज्यों में भूमि बैंक की अवधारणा विवादों में भी रही है। किसानों से जबरन कम कीमत पर जमीन लेकर उसे 'बैंक' में डालने के आरोप लगे हैं, और कई मामलों में अधिग्रहित जमीन सालों तक खाली पड़ी रहकर न तो औद्योगिक इस्तेमाल में आई, न किसानों को वापस मिली।

अतिक्रमण एक बड़ी और लगातार समस्या क्यों है?

रेलवे और रक्षा, दोनों जगह अतिक्रमण के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ जमीन का मालिक होना काफी नहीं, उसकी निगरानी और सीमांकन उतना ही जरूरी है। इसके पीछे कुछ आम कारण हैं:

  • पुराने और अपडेट न हुए रिकॉर्ड- कई जगह दशकों पुरानी जमीन का सीमांकन कभी ठीक से दर्ज ही नहीं हुआ
  • बिखरी हुई जमीन - जैसे रक्षा मंत्रालय की जमीन देशभर में करीब 4,900 अलग-अलग टुकड़ों में बंटी है, जिनकी निगरानी करना मुश्किल होता है
  • शहरीकरण का दबाव - शहरों के पास स्थित सरकारी जमीन पर आवासीय अतिक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है
  • कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें - अतिक्रमण हटाने में अदालती प्रक्रिया, पुनर्वास और राजनीतिक संवेदनशीलता जैसी वजहों से देरी होती है
Updated on:
04 Aug 2026 04:32 pm
Published on:
04 Aug 2026 04:32 pm