
India First Photographer: आज किसी ऐतिहासिक इमारत, राजमहल या पुराने शहर की तस्वीर देखकर हम आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन 140 साल पहले ऐसी तस्वीर बनाना सिर्फ कैमरा उठाकर बटन दबाने जितना आसान नहीं था। और उस दौर में भारत की तस्वीर दुनिया के सामने रखने वाले सबसे महत्वपूर्ण नामों में एक था लाला दीन दयाल।
दिलचस्प बात यह है कि दीन दयाल शुरुआत में पेशेवर फोटोग्राफर नहीं थे। उन्होंने थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग, रुड़की में तकनीकी शिक्षा हासिल की और इंजीनियरिंग से जुड़े काम में आए। बाद में इंदौर में सरकारी नौकरी करते हुए फोटोग्राफी उनका शौक बनी और धीरे-धीरे यही शौक उनका जीवन का सबसे बड़ा काम बन गया।
दीन दयाल का शुरुआती पेशेवर जीवन इंदौर से जुड़ा था। वहीं उन्होंने फोटोग्राफी को गंभीरता से अपनाना शुरू किया। इंदौर के महाराजा तुकोजीराव द्वितीय और मध्य भारत में ब्रिटिश एजेंट सर हेनरी डेली ने उनके काम को प्रोत्साहित किया। इसके बाद उन्हें मध्य भारत के दौरे और स्मारकों की तस्वीरें बनाने के काम मिलने लगे। ब्रिटिश लाइब्रेरी और अन्य संग्रहों में उनके काम के रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं।
यही वह दौर था जब कैमरा उनके लिए सिर्फ चेहरों की तस्वीर लेने का उपकरण नहीं रहा। उन्होंने मंदिरों, महलों, ऐतिहासिक इमारतों और मध्य भारत के दृश्यों को कैमरे में दर्ज करना शुरू किया।
दीन दयाल ने सर लेपेल ग्रिफिन के साथ बुंदेलखंड की यात्रा के दौरान प्राचीन स्थापत्य और स्मारकों की तस्वीरें बनाईं। इस काम से 86 तस्वीरों का एक पोर्टफोलियो, Famous Monuments of Central India, तैयार हुआ।
यही वह काम था जिसने उन्हें सिर्फ एक स्थानीय फोटोग्राफर से कहीं आगे पहुंचा दिया। उनके कैमरे ने उन इमारतों को दर्ज किया जिन्हें देखने के लिए आज इतिहासकारों को केवल पुराने दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। उनकी तस्वीरें उस समय के भारत का एक दृश्य अभिलेख बन गईं।
दीन दयाल के करियर का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें हैदराबाद के निजाम मीर महबूब अली खान के दरबार से काम मिला। भारत सरकार के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र यानी IGNCA के अनुसार दीन दयाल 1885 से अपनी मृत्यु तक निजाम की सेवा में रहे और उन्होंने राजपरिवार, दरबारी जीवन, मेहमानों, भव्य समारोहों, शिकार अभियानों, महलों और अकाल के दौरान किए गए राहत कार्यों तक का चित्रात्मक रिकॉर्ड तैयार किया। निजाम ने उनके काम से प्रभावित होकर उन्हें राजा की उपाधि दी। यहीं से वह लाला दीन दयाल से राजा दीन दयाल बन गए।
दीन दयाल का कैमरा ब्रिटिश सत्ता के महत्वपूर्ण लोगों तक भी पहुंच चुका था। ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख में 1902 में लॉर्ड कर्जन की हैदराबाद यात्रा की तस्वीरों का पूरा संग्रह मौजूद है। इसमें कर्जन और निजाम की मुलाकात, चौमहल्ला पैलेस में आगमन, आधिकारिक समारोह, समूह चित्र और फलकनुमा पैलेस से जुड़े दृश्य शामिल हैं।
इन तस्वीरों के रिकॉर्ड में फोटोग्राफर के रूप में दयाल, दीन दर्ज हैं। यानी एक भारतीय फोटोग्राफर उस दौर की ऐसी तस्वीरें बना रहा था, जिसमें ब्रिटिश वायसराय और भारतीय रियासत का सबसे शक्तिशाली शासक एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं।
यह सिर्फ फोटोग्राफी नहीं थी। यह इतिहास का दृश्य रिकॉर्ड था। उनके कैमरे में सिर्फ राजा-महाराजा नहीं थे। राजा दीन दयाल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनकी तस्वीरों का संसार केवल दरबार तक सीमित नहीं था। उनकी विरासत में राजघरानों, वास्तुकला, शहरों, दैनिक जीवन और औपनिवेशिक भारत से जुड़ी बड़ी संख्या में तस्वीरें मिलती हैं।
उनके परिवार द्वारा संरक्षित डिजिटल अभिलेख में भी उनके काम को 19वीं सदी के भारत के राजदरबार, वास्तुकला और दैनिक जीवन के व्यापक दस्तावेज के रूप में बताया गया है। यानी कैमरे के एक तरफ निजाम थे तो दूसरी तरफ भारत की सड़कें, महल और स्मारक।
दीन दयाल की तस्वीरों का महत्व आज इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि उनके समय का बहुत-सा भारत बदल चुका है। IGNCA ने उनके परिवार से प्राप्त उनके काम और उपकरणों को अपने संग्रह में सुरक्षित रखा है और उनकी विरासत पर प्रदर्शनी भी आयोजित की है। संस्था उन्हें 19वीं सदी के भारत के सबसे महत्वपूर्ण फोटोग्राफरों में से एक मानती है।
उनकी विरासत को संरक्षित करने वाला पारिवारिक डिजिटल अभिलेख भी आज उपलब्ध है, जिसमें दीन दयाल और उनकी अगली पीढ़ियों के फोटोग्राफरों का काम शामिल है।
दीन दयाल के समय फोटोग्राफी तकनीकी रूप से कठिन और महंगी प्रक्रिया थी। बड़े कैमरे, कांच की प्लेटें, रसायन और यात्रा की मुश्किलें। इन सबके बीच किसी स्मारक या पूरे शहर की तस्वीरें बनाना अपने आप में अभियान था। आज हम मोबाइल निकालकर किसी महल की 20 तस्वीरें बना सकते हैं। लेकिन दीन दयाल के समय एक तस्वीर बनाना ही अपने आप में एक घटना थी।
इसलिए उनकी तस्वीरों को सिर्फ पुराने फोटो के रूप में देखना उनके महत्व को छोटा करना होगा। उनके कैमरे ने हमें 19वीं सदी का भारत देखने का एक ऐसा माध्यम दिया, जिसमें शासक भी हैं, सत्ता भी है, वास्तुकला भी है और बदलता हुआ समाज भी।
19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाते समय हम अक्सर कैमरे के आविष्कार, आधुनिक तकनीक और स्मार्टफोन की बात करते हैं। लेकिन भारत की फोटोग्राफी की कहानी हमें एक अलग सबक देती है। कैमरा सिर्फ तस्वीर नहीं बनाता, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए समय को रोक देता है।
लाला दीन दयाल ने जब इंदौर में कैमरा उठाया था, तब शायद उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनकी तस्वीरें एक दिन इतिहासकारों के लिए बीते भारत की आंख बन जाएंगी। उनके कैमरे में कैद इंदौर, मध्य भारत, हैदराबाद, निजाम का दरबार और ब्रिटिश भारत आज सिर्फ पुरानी तस्वीरें नहीं हैं।
वे उस भारत के दृश्य प्रमाण हैं जिसे समय अपने साथ आगे ले गया और शायद यही राजा दीन दयाल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उन्होंने तस्वीरें नहीं खींचीं, उन्होंने अपने कैमरे से एक पूरा दौर बचा लिया।