
India Sand Mining Crisis: रेत को अक्सर सिर्फ निर्माण सामग्री समझा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह नदियों, भूजल, जैव विविधता और बाढ़ नियंत्रण की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्य, शहरीकरण और अवैध खनन ने रेत की मांग को इतना बढ़ा दिया है कि कई नदियों का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होने लगा है। अब विशेषज्ञ इसे केवल खनन का नहीं, बल्कि जल और पर्यावरण सुरक्षा का मुद्दा मान रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की मई 2026 में जारी नई रिपोर्ट 'Sand and Sustainability: An Essential Resource for Nature and Development' के मुताबिक दुनिया में हर वर्ष लगभग 50 अरब टन रेत और बजरी का उपयोग होता है। यह आंकड़ा 1970 के मुकाबले पांच गुना ज्यादा है, जब यह मात्र 9.6 अरब टन थी। पानी के बाद रेत दुनिया का सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला प्राकृतिक संसाधन है। बढ़ते शहर, सड़कें, पुल, मेट्रो, बंदरगाह और आवासीय परियोजनाएं इसकी मांग लगातार बढ़ा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2060 तक केवल भवन निर्माण क्षेत्र में रेत की मांग लगभग 45% तक बढ़ने का अनुमान है और दुनिया भर में करीब 2.3 अरब लोगों की आजीविका सीधे तौर पर स्वस्थ रेतीले पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर बताई गई है।
भारत में रेत को लघु खनिज माना जाता है और इसके खनन का नियमन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार अवैध रेत खनन आज भी कई राज्यों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार ने संसद में बताया है कि अवैध खनन से नदी तल का क्षरण, जलीय जीवों के आवास का नुकसान, भूजल स्तर में गिरावट, मिट्टी का कटाव, बाढ़ का खतरा और पुलों जैसी संरचनाओं को नुकसान हो सकता है।
यह मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। इसी साल मार्च 2026 में मध्य प्रदेश की नर्मदा और सिंध नदियों में जारी अवैध खनन का मामला लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान उठा, जब सांसदों ने केंद्र सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग की। इसी तरह यमुना और गंगा जैसी बड़ी नदियों में भी अवैध रेत खनन से नदी-तटों और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचने के मामले सामने आते रहे हैं।
वैज्ञानिक बताते हैं कि नदी की रेत पानी के प्रवाह को संतुलित रखने, भूजल को रिचार्ज करने और नदी किनारों को स्थिर रखने में मदद करती है। जब अत्यधिक मात्रा में रेत निकाली जाती है तो, नदी का तल नीचे चला जाता है। इससे भूजल स्तर गिर सकता है। नदी किनारों का कटाव बढ़ सकता है। पुलों और तटबंधों की नींव कमजोर हो सकती है। मछलियों और अन्य जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो सकते हैं। बाढ़ और सूखे दोनों का जोखिम बढ़ सकता है।
हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि अनियंत्रित रेत खनन से हिमालयी नदियों की प्राकृतिक संरचना तेजी से बदल रही है। शोधकर्ताओं के मुताबिक कई नदी खंडों में चैनल संकरे हुए हैं, नदी तल गहरा हुआ है और पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक असर दिखाई दे रहा है।
UNEP की ताजा रिपोर्ट में सुझाव है कि रेत को केवल निर्माण सामग्री नहीं बल्कि, एक रणनीतिक राष्ट्रीय संसाधन माना जाए और इसके लिए हर देश ठोस 'सैंड रोडमैप' बनाए। इसके लिए वैज्ञानिक आकलन के आधार पर खनन, अवैध खनन पर सख्त निगरानी, ड्रोन और डिजिटल ट्रैकिंग, निर्माण एवं ध्वस्तीकरण कचरे के पुनर्चक्रण तथा वैकल्पिक निर्माण सामग्री (जैसे क्रश्ड रॉक और कृत्रिम रेत) के उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारत में भी सस्टेनेबल सैंड माइनिंग गाइडलाइंस (2016) और MoEFCC के दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि असली चुनौती इन्हें जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू करने की है।
भारत में रेत का संकट केवल पर्यावरण समस्या नहीं रही बल्कि आने वाले वर्षों में जल सुरक्षा, कृषि, बाढ़ प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है। यदि रेत का दोहन उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक होता रहा, तो नदियों का भूगोल बदलने के साथ-साथ भूजल और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। UNEP की मई 2026 रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया पहले ही एक 'सैंड गैप', यानी प्रकृति की पुनर्भरण क्षमता से कहीं तेज रफ्तार से खनन का सामना कर रही है और भारत जैसे तेजी से शहरीकरण कर रहे देश इस गैप के केंद्र में हैं। इसलिए अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रेत कहां से आएगी, बल्कि यह भी है कि क्या भारत अपनी नदियों को बचाते हुए विकास का संतुलन बना पाएगा?