
भारत में तालाब और जलाशय सदियों से गांवों की जीवनरेखा रहे हैं। खेती, पशुपालन, पेयजल और भूजल रिचार्ज के लिए इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण आज देश के हजारों तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। यही वजह है कि अब यह सवाल उठने लगा है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सभी तालाब क्या वास्तव में जमीन पर मौजूद हैं?
जल शक्ति मंत्रालय की पहली वाटर बॉडी जनगणना के अनुसार देश में लगभग 24.24 लाख जल निकाय दर्ज हैं। इनमें तालाब, झील, टैंक और अन्य जलाशय शामिल हैं। इनमें से करीब 97 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के पास जल संरक्षण की विशाल परंपरागत व्यवस्था है, लेकिन इसकी वास्तविक स्थिति जानना अब बड़ी चुनौती बन गया है।
हालांकि ये आंकड़े सिर्फ रिकॉर्ड की तस्वीर दिखाते हैं। जमीन पर स्थिति कई जगह अलग नजर आती है। अनेक शहरों और गांवों में ऐसे तालाब मिलते हैं जो राजस्व रिकॉर्ड में तो दर्ज हैं, लेकिन मौके पर वहां मकान, सड़क, बाजार या खेत दिखाई देते हैं।
कई मामलों में तालाब पूरी तरह खत्म नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे सूख जाते हैं। जब वर्षों तक उनमें पानी नहीं भरता तो लोग उनका दूसरा उपयोग शुरू कर देते हैं। कुछ जगहों पर खेती होने लगती है, तो कहीं निर्माण कार्य शुरू हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कई राज्यों में भूमि और राजस्व रिकॉर्ड दशकों पुराने हैं। कई तालाबों की सीमाएं कभी अपडेट नहीं हुईं। परिणामस्वरूप कागज पर दर्ज क्षेत्रफल और वास्तविक क्षेत्रफल में बड़ा अंतर पैदा हो गया।
कई बार किसी तालाब का आधा हिस्सा अतिक्रमण की भेंट चढ़ जाता है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसका पूरा पुराना क्षेत्र ही दर्ज रहता है। ऐसे मामलों में प्रशासन को भी वास्तविक स्थिति समझने में मुश्किल होती है।
तालाबों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अब आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है। सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वे, GIS मैपिंग और जियो-टैगिंग के जरिए जल निकायों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।
सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से यह भी देखा जा सकता है कि किसी तालाब का क्षेत्रफल समय के साथ कितना घटा है और उसके आसपास कितना निर्माण हुआ है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में जल संकट से निपटने के लिए सिर्फ नए तालाब बनाना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले उन लाखों जल निकायों की पहचान करनी होगी जो रिकॉर्ड में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर उनकी स्थिति खराब हो चुकी है।
इन प्रयासों का उद्देश्य पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करना और भविष्य में उन पर कब्जा रोकना है।
भारत के पास कागजों पर 24 लाख से अधिक जल निकायों का रिकॉर्ड है, लेकिन उनमें से सभी आज सुरक्षित और सक्रिय नहीं हैं। हजारों तालाब अतिक्रमण की चपेट में हैं, कई सूख चुके हैं और कुछ का वास्तविक अस्तित्व ही सवालों के घेरे में है। ऐसे में आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती नए तालाब बनाने की नहीं, बल्कि कागज पर दर्ज तालाबों को जमीन पर बचाने और पुनर्जीवित करने की होगी। सैटेलाइट सर्वे और डिजिटल रिकॉर्ड इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।