
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)
कोरोना महामारी के बाद से भारत के कॉर्पोरेट और IT सेक्टर में वर्क फ्रॉम होम (WFH) और हाइब्रिड वर्किंग एक स्थायी चलन बन चुका है, लेकिन अब तक इसे लेकर देश में कोई ठोस कानून मौजूद नहीं था। सब कुछ कंपनी की नीति पर निर्भर था। नए लेबर कोड्स में पहली बार रिमोट वर्किंग और हाइब्रिड मॉडल को कानूनी मान्यता दी गई है, जिससे अब यह केवल कंपनी की मर्जी पर नहीं बल्कि कानून के दायरे में तय होगा।
EPFO ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया है कि नए लेबर कोड्स के तहत अब कोई भी नियोक्ता बिना वाजिब कारण के कर्मचारी को वर्क फ्रॉम होम या हाइब्रिड वर्क सुविधा लेने से नहीं रोक सकता। इसके साथ ही यह भी साफ किया गया है कि अगर आईटी सेक्टर का कोई कर्मचारी WFH या हाइब्रिड मोड (जैसे- हफ्ते में 2 दिन ऑफिस) चुनता है, तो इसका असर उसे मिलने वाले PF, ग्रेच्युटी, बोनस और लीव जैसे बेनिफिट्स पर नहीं पड़ेगा।
इसका मतलब है कि ऑफिस से काम करने वाले और घर से काम करने वाले कर्मचारियों को कानूनी तौर पर बराबर सुविधाएं मिलेंगी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) में काम करने वाली कंपनियों के लिए भी नियमों को लचीला बनाया गया है, जहां अब आधे तक कर्मचारी एक साल तक घर से काम कर सकते हैं, ताकि आईटी सेक्टर की रफ्तार प्रभावित न हो।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति (OSH) संहिता के तहत काम के घंटों को लेकर स्पष्ट सीमा तय की गई है। सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे काम की सीमा तय की गई है। इसके साथ ही सप्ताह में कम से कम एक दिन का अनिवार्य अवकाश देना भी जरूरी होगा। अगर कोई कर्मचारी दिन में 8 घंटे या सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम करता है, तो उसे सामान्य वेतन से दोगुनी दर पर ओवरटाइम भुगतान मिलेगा।
हालांकि, एक तिमाही यानी तीन महीने में कोई भी नियोक्ता किसी कर्मचारी से 144 घंटे से अधिक ओवरटाइम नहीं करा सकेगा, और इसका हिसाब रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक या मैन्युअल रजिस्टर बनाए रखना अनिवार्य होगा। इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव खासतौर पर उन कर्मचारियों के लिए राहत साबित होगा जिन्हें अक्सर 'हसल कल्चर' के नाम पर 10-12 घंटे काम करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर बिना सीमा के इतने लंबे समय तक काम चलता रहे तो 40-50 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते कर्मचारियों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। अगर बार-बार तय सीमा से ज्यादा काम कराया जा रहा है तो यह कर्मचारी की कमी नहीं बल्कि कंपनी की कैपेसिटी प्लानिंग की खामी दर्शाता है।
कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए संसद में एक अहम विधेयक भी पेश किया गया है। NCP सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में 'राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025' पेश किया था। जिसके तहत यदि यह कानून बन जाता है तो कर्मचारियों को अधिकार होगा कि वे अपनी शिफ्ट खत्म होने के बाद या छुट्टियों के दौरान काम से जुड़ी कॉल या मैसेज का जवाब न दें और इसके लिए उन पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
इस विधेयक में एक कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण (Employees' Welfare Authority) बनाने का भी प्रस्ताव है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि नियम सही तरीके से लागू हों। प्रस्तावित कानून के मुताबिक, गैर-अनुपालन करने वाली कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह प्रावधान डिजिटल थकान को रोकने के मकसद से लाया गया है। फिलहाल यह एक निजी सदस्य विधेयक (प्राइवेट मेंबर बिल) है। इसलिए इसे कानून बनने में अभी वक्त लग सकता है।
नए श्रम कानूनों में कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस दिशा में अभी विस्तृत प्रावधानों की जरूरत है। फिलहाल मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 ही एकमात्र ऐसा कानून है जो सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को समर्पित है, जबकि OSH कोड प्रतिदिन आठ घंटे काम की सीमा तय करता है और ओवरटाइम को लेकर राज्य सरकारों को नियम बनाने के निर्देश देता है। इसके अलावा दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हाल में कार्यस्थल के विषाक्त माहौल और जरूरत से ज्यादा काम कराए जाने को लेकर चिंता जताई है।
नए प्रावधानों से यह साफ है कि अब वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड मॉडल केवल कंपनी की सुविधा नहीं, बल्कि कर्मचारी का एक कानूनी हक बनता जा रहा है। इसके साथ ही, तय काम के घंटे, डबल ओवरटाइम पेमेंट और ऑफिस के बाद डिस्कनेक्ट होने का अधिकार। ये सभी मिलकर आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर की कार्य संस्कृति को ज्यादा पारदर्शी और कर्मचारी-हितैषी बनाने की दिशा में बड़ा कदम माने जा रहे हैं। हालांकि राइट टू डिस्कनेक्ट बिल अभी कानून नहीं बना है, इसलिए तुरंत सभी कंपनियों पर इसकी बाध्यता लागू नहीं होगी।
Updated on:
08 Aug 2026 10:46 pm
Published on:
08 Aug 2026 10:46 pm
