
भारतीय नौसेना की मारक क्षमता बढ़ाने वाली बड़ी परियोजना पर मुहर लग गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) ने आठ नेक्स्ट जेनरेशन कार्वेट (एनजीसी) बनाने की योजना को मंजूरी दे दी है। यह सौदा 40,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला बुधवार को हुई CCS की बैठक में लिया गया है।
अधिकारियों ने बताया कि 8 युद्धपोतों के निर्माण का अनुबंध अगले कुछ दिनों में कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) के साथ होगा। रक्षा विशेषज्ञ वेबसाइट IDRW के मुताबिक, जीआरएसई को मई 2025 में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी घोषित किया गया था।
बोली की व्यवस्था के तहत पांच पोत जीआरएसई के हिस्से आए, जबकि बाकी तीन दूसरी सबसे कम बोली वाली कंपनी को उसी कीमत पर मिलेंगे। विकिपीडिया की सूची में भी पांच पोत जीआरएसई और तीन जीएसएल के नाम दर्ज हैं। यह बंटवारा अभी रिपोर्टों पर आधारित है, अनुबंध पर हस्ताक्षर के बाद ही स्पष्ट होगा।
कार्वेट करीब 2,000 टन वजनी हल्के युद्धपोत होते हैं, जिनकी रफ्तार लगभग 30 समुद्री मील प्रति घंटा (नॉट) तक होती है। इनका इस्तेमाल निगरानी अभियानों, एस्कॉर्ट मिशन, प्रतिरोध, सरफेस एक्शन ग्रुप (एसएजी) संचालन, सर्च एंड अटैक और तटीय रक्षा में होगा।
इन युद्धपोत का निर्माण नौसेना के नए इन-हाउस डिजाइन पर होगा। ये जहाज पुराने खुकरी और कोरा श्रेणी के कार्वेट की जगह लेंगे। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि इन पर विस्तारित रेंज की ब्रह्मोस मिसाइल, आधुनिक रडार और पनडुब्बी-रोधी प्रणालियां लग सकती हैं, पर इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) ने आठ नेक्स्ट जेनरेशन कार्वेट (एनजीसी) बनाने की योजना को मंजूरी दे दी है। यह सौदा 40,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है। अनुबंध होने के बाद नौसेना को 8 में से पहला युद्धपोत 2030 तक मिलने की उम्मीद है। शिपयार्ड इसे जल्दी देने के तरीके भी तलाश रहे हैं।
यह परियोजना नई नहीं है। रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने इसे पहली बार 6 जून 2022 को मंजूरी दी थी। तब इसकी अनुमानित लागत 36,000 करोड़ रुपए आंकी गई थी और कहा गया था कि सारी मशीनरी भारतीय उद्योग से ली जाएगी। यह नौसेना की 175 जहाजों वाली फोर्स बनाने की योजना का हिस्सा है। यानी चार साल में अनुमानित लागत करीब 4,000 करोड़ रुपए बढ़कर 40,000 करोड़ के पार पहुंच गई।
केरल कौमुदी की रिपोर्ट के अनुसार इन कार्वेट में रडार की पकड़ से बचने की स्टील्थ क्षमता होगी और ज्यादातर पुर्जे देश में ही बनेंगे। सूत्रों ने 70 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री की बात कही है, पर यह आंकड़ा अन्य प्रमुख रिपोर्टों में नहीं मिला।
जीआरएसई के लिए यह ऑर्डर खास मायने रखता है। आईडीआरडब्ल्यू के अनुसार कंपनी की ऑर्डर बुक पांच साल में पहली बार 20,000 करोड़ रुपए से नीचे आ गई थी। नया ऑर्डर इसे भरेगा और देश के शिपबिल्डिंग उद्योग को भी बल देगा।
हिंद महासागर में चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी के बीच तटीय और निकटवर्ती समुद्र में निगरानी व मारक क्षमता बढ़ाना भारत की प्राथमिकता है। केरल कौमुदी ने इस परियोजना को चीन का मुकाबला करने की रणनीति से जोड़ा है। एएनआई के अनुसार ये जहाज सरकार की सागर (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) पहल को भी आगे बढ़ाएंगे।