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सावधान! अब साइबर ठगों की नजर सिर्फ बैंक खाते पर नहीं, आपके ‘शरीर और दिमाग’ पर भी है, क्या है बॉडी हैक?

आधुनिक डिजिटल दौर में साइबर ठग लोगों को निशाना बनाने के लिए नए-नए तरीके अपना रहे हैं। अब साइबर ठग 'बॉडी हैक' का इस्तेमाल करके लोगों को चूना लगा रहे हैं। आइए जानते हैं, बॉडी हैक क्या होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
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भारत

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Vinay Shakya

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Updated: 31 Oct 2026, 4:04 PM IST

Body Hack Cyber Fraud

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Janani)

डिजिटल क्रांति के इस दौर में साइबर अपराध के तरीके इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि अब केवल ओटीपी (OTP) या बैंक पासवर्ड छिपाना ही काफी नहीं रह गया है। साइबर अपराधियों ने अब ठगी और ब्लैकमेलिंग का एक बेहद खतरनाक और नया तरीका खोज निकाला है, जिसे तकनीकी और वैज्ञानिक भाषा में 'बॉडी हैक' (Body Hack या Biohacking) कहा जा रहा है।

मूल रूप से इंसानी क्षमताओं और स्वास्थ्य को सुधारने के लिए इस्तेमाल होने वाली यह तकनीक अब हैकर्स का सबसे घातक हथियार बन चुकी है। साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अब ठग न सिर्फ आपके गैजेट्स को, बल्कि आपके शरीर में लगे मेडिकल उपकरणों, आपके बायोमेट्रिक डेटा और यहाँ तक कि आपके दिमाग को भी रिमोटली कंट्रोल कर रहे हैं।

क्या है 'बॉडी हैक' का खतरा?

आसान शब्दों में कहें तो जब साइबर अपराधी किसी इंसान के शरीर से जुड़े नेटवर्क, स्मार्ट मेडिकल गैजेट्स, बायोमेट्रिक पहचान या उसके मनोवैज्ञानिक व्यवहार (डर और लालच) को हैक कर लेते हैं, तो इसे साइबर सुरक्षा की दुनिया में 'बॉडी हैकिंग' कहा जाता है। आज के समय में जब लोग अपनी सेहत की निगरानी के लिए शरीर में एडवांस्ड और इंटरनेट से चलने वाले उपकरण लगवा रहे हैं, ठगों ने उनमें सेंधमारी शुरू कर दी है।

कैसे बुना जा रहा है ठगी का जाल?

साइबर एक्सपर्ट्स और जांच एजेंसियों के अनुसार, साइबर ठग 'बॉडी हैक' को मुख्य रूप से 3 स्तरों पर अंजाम दे रहे हैं:

  1. मेडिकल डिवाइसेज को रिमोट कंट्रोल करना: आजकल कई मरीज दिल की धड़कन नियंत्रित करने के लिए 'पेसमेकर' या शुगर लेवल ठीक रखने के लिए 'इंसुलिन पंप' जैसे वायरलेस और ब्लूटूथ से चलने वाले गैजेट्स अपने शरीर के अंदर या बाहर इम्प्लांट करवाते हैं।हैकर्स इन उपकरणों के वायरलेस सिग्नलों को बीच में ही इंटरसेप्ट (Intercept) कर लेते हैं। इसके बाद वे इन उपकरणों की सेटिंग्स बदलकर मरीज को जानलेवा झटका दे सकते हैं या इंसुलिन की ओवरडोज दे सकते हैं। इसे 'डिजिटल एक्सटॉर्शन' या 'मेडिकल रैनसमवेयर' कहा जाता है, जिसमें मरीज की जान बचाने के बदले उसके परिजनों से लाखों रुपये की फिरौती मांगी जाती है।
  2. बायोमेट्रिक और डीएनए डेटा की परमानेंट चोरी: हम अपने फोन को अनलॉक करने या बैंक ऐप्स खोलने के लिए फिंगरप्रिंट और फेस आईडी (आईरिस स्कैन) का इस्तेमाल करते हैं। ठग इन शारीरिक निशानों को क्लोन कर रहे हैं। इसके अलावा, आजकल ऑनलाइन जेनेटिक और डीएनए (DNA) टेस्ट का चलन बढ़ा है। हैकर्स इन कंपनियों के डेटाबेस से आपका लाइफटाइम जेनेटिक डेटा चुरा लेते हैं। पासवर्ड बदले जा सकते हैं, लेकिन आपका डीएनए या फिंगरप्रिंट कभी नहीं बदला जा सकता, जिससे भविष्य में पहचान की बड़ी चोरी का खतरा पैदा हो जाता है।

3. 'माइंड हैकिंग' और डिजिटल अरेस्ट का आतंक: यह बॉडी हैकिंग का सबसे मानसिक रूप है, जिसे 'सोशल इंजीनियरिंग' भी कहते हैं। इसमें ठग पुलिस, सीबीआई या कस्टम अधिकारी बनकर पीड़ित को वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ित की जैविक प्रवृत्तियों जैसे अत्यधिक डर और घबराहट का फायदा उठाते हैं। 'डिजिटल अरेस्ट' के दौरान वे पीड़ित को घंटों कैमरे के सामने बिना हिले-डुले बैठने पर मजबूर कर देते हैं। इस स्थिति में पीड़ित का दिमाग पूरी तरह उनके नियंत्रण में आ जाता है और वह डर के मारे अपनी सारी जमापूंजी ठगों के हवाले कर देता है।

खुद को इस खतरे से कैसे बचाएं?

  • मेडिकल गैजेट्स की सुरक्षा: यदि आप स्मार्ट पेसमेकर या फिटनेस ट्रैकर का उपयोग करते हैं, तो उसके सॉफ्टवेयर को हमेशा अपडेटेड रखें। जरूरत न होने पर ब्लूटूथ और वाई-फाई को बंद रखें।
  • बायोमेट्रिक डेटा की गोपनीयता: किसी भी गैर-भरोसेमंद ऐप या वेबसाइट पर अपने फिंगरप्रिंट, फेस स्कैन या डीएनए टेस्ट जैसी संवेदनशील रिपोर्ट्स कभी भी साझा न करें।
  • कैमरे के सामने न डरें: देश में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई कानून नहीं है। यदि कोई आपको वीडियो कॉल पर डराता है, तो तुरंत कॉल काट दें। आपका डर ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
  • हेल्पलाइन नंबर: यदि आप या आपका कोई परिचित इस तरह की साइबर ठगी, ब्लैकमेलिंग या डिजिटल अरेस्ट का शिकार होता है, तो बिना घबराए तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या सरकार के आधिकारिक पोर्टल (cybercrime.gov.in) पर जाकर तुरंत अपनी शिकायत दर्ज करवाएं। समय पर दी गई सूचना आपकी जान और पैसा दोनों बचा सकती है।