
Indian tricolour national flag history 1947: आज जिस तिरंगे को देखते ही हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है, उसकी कहानी सिर्फ तीन रंगों और अशोक चक्र की कहानी नहीं है। इसके पीछे आजादी की लंबी लड़ाई, बदलते राजनीतिक विचार और एक ऐसे राष्ट्र की तलाश छिपी है जो अभी अस्तित्व में आया भी नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि भारत का वर्तमान तिरंगा 15 अगस्त 1947 को नहीं बनाया गया था। इसकी यात्रा आजादी से करीब चार दशक पहले शुरू हो चुकी थी। 1906 से 1947 के बीच भारतीय झंडे का स्वरूप कई बार बदला और आखिरकार 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने उस तिरंगे को स्वीकार किया, जिसे आज पूरा देश अपना राष्ट्रीय ध्वज मानता है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज की कहानी का शुरुआती महत्वपूर्ण पड़ाव 1906 का कलकत्ता माना जाता है। उस समय स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के बीच एक झंडा फहराया गया था। वह आज के तिरंगे जैसा नहीं था, लेकिन उसमें पहली बार स्वतंत्र भारत की कल्पना को प्रतीक देने की कोशिश दिखाई देती है। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो में दी गई जानकारी के मुताबिक 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में इसी तरह के एक झंडे को फहराया, जिससे भारत की आजादी की आवाज यूरोप तक पहुंची। यानी तिरंगे की कहानी केवल भारत की धरती पर नहीं लिखी जा रही थी। विदेश में भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अपने प्रतीकों की तलाश कर रहा था।
इसके बाद 1917 आया। एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाले होम रूल आंदोलन के दौरान एक और झंडा सामने आया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर भारतीयों के लिए स्वशासन की मांग को प्रतीक देना था। यहां से झंडा सिर्फ पहचान का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक मांगों की आवाज भी बनने लगा।
1921 में विजयवाड़ा में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के सामने झंडे का एक डिजाइन प्रस्तुत किया। सरकारी स्रोतों बताते हैं कि इसमें अलग-अलग रंगों की पट्टियां और बीच में चरखा था। चरखा उस समय भारत के आर्थिक आत्मनिर्भरता के विचार का प्रतीक था। वेंकैया की कहानी इसलिए खास है क्योंकि आज जिस राष्ट्रीय ध्वज को हम भारत की पहचान के रूप में देखते हैं, उसके मूल डिजाइन से उनका नाम सीधे जुड़ा है। भारत सरकार भी उन्हें राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन से जुड़े प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद करती है। लेकिन अभी तिरंगे की अंतिम मंजिल दूर थी।
1931 में झंडे के स्वरूप में एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। इसका रंग बदला। लाल रंग की जगह केसरिया रंग आया और सफेद तथा हरे रंग को बरकरार रखा गया। रंगों को साहस, शांति और समृद्धि जैसे भावों से जोड़ा गया। यही वह दौर था जब झंडा स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर ज्यादा स्वीकार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित होने लगा। लेकिन आज के तिरंगे की सबसे बड़ी पहचान अशोक चक्र अब भी इसमें नहीं था।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। इसी समय झंडे के बीच मौजूद चरखे की जगह सारनाथ के सिंह स्तंभ के धर्मचक्र यानी अशोक चक्र को अपनाया गया। इसमें 24 तीलियां हैं। यही बदलाव तिरंगे को स्वतंत्रता आंदोलन के एक राजनीतिक झंडे से स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज में बदलने वाला निर्णायक क्षण था।
अशोक चक्र का अर्थ भी बेहद गहरा है। दरअसल यह धर्म के चक्र का प्रतीक है और इसका संदेश जीवन गति में है, ठहराव मृत्यु है। यानी तिरंगे के बीच का नीला चक्र सिर्फ डिजाइन नहीं है। वह निरंतर गति, कर्तव्य और प्रगति का संदेश देता है।
यहां इतिहास का एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। संविधान सभा ने तिरंगे को 22 जुलाई 1947 को अपनाया था और 15 अगस्त 1947 से यह स्वतंत्र भारत के डोमिनियन का आधिकारिक ध्वज बन गया। यानी आजादी मिलने से करीब तीन सप्ताह पहले ही स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप तय हो चुका था। इसका मतलब यह है कि 15 अगस्त को तिरंगे का जन्म नहीं हुआ था। वह तो आजादी से पहले ही लंबे संघर्ष और कई प्रयोगों के बाद अपने अंतिम रूप तक पहुंच चुका था।
आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रीय ध्वज मुख्य रूप से सरकारी और राष्ट्रीय संस्थानों से जुड़ा था। लेकिन 26 जनवरी 2002 को फ्लेग कोड ऑफ इंडिया में बदलाव के बाद आम नागरिकों को भी अपने घर, कार्यालय और संस्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति मिली, बशर्ते उसकी गरिमा और नियमों का पालन किया जाए।
2021 के संशोधन के बाद मशीन से बने और पॉलिएस्टर के राष्ट्रीय ध्वज की अनुमति भी दी गई। 2022 में खुले में या घर पर तिरंगे को दिन-रात फहराने की अनुमति संबंधी नियम में भी बदलाव किया गया। यानी जिस झंडे को कभी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनाने की कोशिश की गई थी, वही आज करोड़ों भारतीयों के घरों तक पहुंच चुका है।
आज तिरंगा हमें बेहद सहज दिखाई देता है। हम उसे देखते हैं और कहते हैं झंडे में तीन रंग हैं, ऊपर केसरिया, बीच में सफेद, नीचे हरा और बीचों-बीच बना है नीला अशोक चक्र, जिसके बीच में 24 तीलियों सा डिजाइन है।
लेकिन इसके पीछे 1906 का स्वदेशी आंदोलन, 1907 का पेरिस, 1917 का होम रूल आंदोलन, 1921 का पिंगली वेंकैया का डिजाइन, 1931 का संशोधित स्वरूप और 22 जुलाई 1947 का अंतिम निर्णय छिपा है। इसलिए तिरंगा सिर्फ आजादी की तारीख का प्रतीक नहीं है। यह उस भारत की यात्रा का वृतांत सुनाता है, जो पहले अपनी पहचान खोज रहा था, फिर अपनी आजादी के लिए लड़ा और आखिरकार अपने भविष्य की पहचान खुद तय करने की स्थिति में पहुंचा।
15 अगस्त के दिन जब करोड़ों भारतीय तिरंगे को आसमान में लहराते देखेंगे, तो शायद अगली बार उन्हें सिर्फ तीन रंग नहीं दिखेंगे। उन्हें इस तिरंगे के पीछे छिपे चार दशक के संघर्ष, बदलाव और उस सपने की कहानी भी दिखाई देगी, जिसे 1947 में एक राष्ट्र ने अपना नाम दिया।