Patrika+

छात्रों ने बैरिकेड तोड़ विधानसभा की ओर किया कूच: क्यों झारखंड में आखिर 17 दिन से सुलग रहा छात्र आंदोलन?

झारखंड की राजधानी रांची में हजारों छात्र पिछले 17 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। आज छात्रों ने पुलिस बैरिकेड तोड़कर विधानसभा की ओर कूच कर दिया। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन चलाया। सरकार का दावा है कि 98% मांगें मान ली गई हैं, लेकिन छात्र 13 में से केवल तीन परीक्षाएं रद्द किए जाने और CBI जांच की मांग पूरी न होने से आंदोलन जारी रखे हुए हैं। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट
6 min read
Aug 10, 2026
Jharkhand Protest
झारखंड में छात्रों ने बैरिकेड तोड़े (ChatGpt)

झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को हजारों अभ्यर्थियों ने विधानसभा की ओर मार्च करना शुरू कर दिया। छात्रों ने पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ दिया और आगे बढ़ते रहे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियो को रोकने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। यह विरोध सिर्फ एक दिन का नहीं है। यहां पिछले 17 दिनों से लगातार विरोध और प्रदर्शन जारी है। प्रदर्शन के पीछे भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक के आरोपों और वर्षों से नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के टूटते भरोसे की लंबी कहानी है।

अलग-अलग जगहों से रांची पहुंचे प्रदर्शनकारी

रांची की सड़कों पर सोमवार को जो दृश्य दिखाई दिया, वह किसी सामान्य छात्र प्रदर्शन जैसा नहीं था। हजारों की संख्या में अभ्यर्थी बसों, ट्रेनों और निजी वाहनों से राजधानी पहुंचे। हाथों में तिरंगा और पोस्टर थे, सामने पुलिस की बैरिकेडिंग थी और मंजिल थी—झारखंड विधानसभा।

छात्रों ने एक के बाद एक बैरिकेड पार करने शुरू किए। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की और अंततः वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया। प्रदर्शनकारी पीछे हटने के बजाय पानी की बौछार के बीच नारे लगाते और आगे बढ़ते दिखाई दिए। झारखंड की राजधानी में यह टकराव उस आंदोलन का नया चरण है, जो 25 जुलाई से लगातार जारी है। लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छात्रों ने बैरिकेड क्यों तोड़े। बड़ा सवाल है यह भी कि आखिर वे विधानसभा तक पहुंचकर सरकार से क्या कहना चाहते हैं?

किस मांग के लिए 17 दिन से कर रहे आंदोलन?

इस आंदोलन की जड़ में झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर उठे सवाल हैं। अभ्यर्थी कई परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, परिणामों में अनियमितता और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आंदोलन 25 जुलाई को शुरू हुआ और 10 अगस्त को इसका 17वां दिन था। रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में धरना जारी रहा और छह प्रदर्शनकारी भूख हड़ताल पर भी बैठे हैं।

छात्रों का आरोप है कि जब कोई युवा किसी सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों लगा देता है, हजारों रुपये परीक्षा और तैयारी पर खर्च करता है और फिर परीक्षा या परिणाम पर ही सवाल उठ जाएं, तो उसका नुकसान सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। उसका समय जाता है, उम्र निकलती है और अगली भर्ती की तैयारी भी प्रभावित होती है।

यही कारण है कि यह आंदोलन धीरे-धीरे एक परीक्षा के विवाद से निकलकर भर्ती व्यवस्था पर भरोसे के सवाल में बदल गया है।

14वीं JPSC परीक्षा से विवाद की शुरुआत

मौजूदा विवाद का एक बड़ा केंद्र 14वीं JPSC Combined Civil Services Preliminary Examination है। इस परीक्षा के परिणाम पर सवाल उठने के बाद राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों ने भी जांच की मांग उठाई। जुलाई में BJP ने परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। उस परीक्षा के लिए कुल 103 पद थे और 1,772 अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा के बाद सफल घोषित किए गए थे।

इसके बाद मामला गंभीर होता चला गया। JPSC के चेयरपर्सन एल. खियांगते (L. Khiangte) ने 22 जुलाई को इस्तीफा दिया। आयोग ने जुलाई में कई परीक्षाओं को स्थगित कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने अभ्यर्थियों के बीच पहले से मौजूद असंतोष को और बढ़ाया। यहीं से सवाल उठने लगा— क्या झारखंड में सरकारी नौकरी की परीक्षा व्यवस्था भरोसे के संकट से गुजर रही है?**

98 फीसदी मांगें मान लीं : सरकार

आंदोलन के बीच सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के कई दौर हुए। 9 अगस्त को हुई छठे दौर की बातचीत भी गतिरोध खत्म नहीं कर सकी। सरकार का कहना है कि उसने प्रदर्शनकारियों की लगभग 98 फीसदी मांगें स्वीकार कर ली हैं। सरकार ने तीन परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जताई, जिसमें 14वीं JPSC Combined Civil Services Preliminary Examination भी शामिल है। इसके अलावा 14वीं सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच में Enforcement Directorate को शामिल करने की बात भी सामने आई।

छात्रों की कहानी अलग है

छात्रों का कहना है कि उनकी मांग 13 परीक्षाओं को रद्द करने की थी, जबकि सरकार ने केवल तीन परीक्षाओं पर सहमति जताई है। सबसे बड़ा विवाद JSSC Combined Graduate Level यानी JSSC-CGL परीक्षा के परिणाम और सभी संबंधित परीक्षाओं की जांच को लेकर है।

छात्र CBI जांच पर भी अड़े हुए हैं। सरकार ने इसके बजाय सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय न्यायिक जांच का प्रस्ताव रखा है। सरकार का कहना है कि JSSC-CGL परीक्षा सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट की निगरानी में हुई थी, इसलिए उसके परिणाम रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की गई है। यही अंतर अब आंदोलन का सबसे बड़ा गतिरोध बन गया है।

असली लड़ाई परीक्षा की नहीं, भरोसे की है

इस आंदोलन को केवल “छात्र बनाम सरकार” के रूप में देखना कहानी को छोटा कर देगा। दरअसल, सरकारी भर्ती परीक्षाएं युवाओं के लिए सिर्फ एक परीक्षा नहीं होतीं। खासकर ऐसे राज्य में जहां सरकारी नौकरी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण रास्ता मानी जाती है, एक भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी का आरोप हजारों परिवारों की उम्मीदों से जुड़ जाता है।

एक अभ्यर्थी कई वर्षों तक एक ही परीक्षा प्रणाली के भरोसे तैयारी करता है। परीक्षा टलती है, परिणाम विवादित होता है, मामला अदालत में जाता है या जांच शुरू होती है तो पूरी प्रक्रिया महीनों और कभी-कभी वर्षों तक खिंच सकती है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें रांची का आंदोलन समझना होगा।

जब परीक्षा का कैलेंडर ही अनिश्चित हो जाए

JPSC ने जुलाई में नौ प्रमुख भर्ती परीक्षाओं को अगले आदेश तक स्थगित किया था। इनमें Combined Civil Services Main Examination भी शामिल थी। आयोग ने इसके पीछे “unavoidable reasons” बताए थे। अभ्यर्थियों के लिए इसका अर्थ सिर्फ एक तारीख बदलना नहीं है। एक परीक्षा की तारीख बदलने से उम्र सीमा, दूसरी परीक्षाओं की तैयारी, नौकरी छोड़कर तैयारी करने वालों की आर्थिक स्थिति और परिवार की उम्मीदें - सब प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि भर्ती परीक्षाओं में समय पर परीक्षा, पारदर्शी प्रक्रिया और तय समय में परिणाम किसी भी सरकार के लिए सिर्फ प्रशासनिक मुद्दे नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे का सवाल हैं।

सड़क पर छात्र, राजनीति में भी हलचल

रांची का आंदोलन अब राजनीतिक रूप भी ले चुका है। 10 अगस्त को जब छात्र विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे, उसी दौरान BJP नेताओं ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास के बाहर प्रदर्शन किया। पूर्व मुख्यमंत्री और BJP नेता बाबूलाल मरांडी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई। इससे आंदोलन का राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है। लेकिन यहां एक बात महत्वपूर्ण है— राजनीतिक दलों के समर्थन से आंदोलन की दृश्यता बढ़ सकती है, मगर मूल सवाल वही है जो अभ्यर्थी उठा रहे हैं: भर्ती परीक्षाओं में निष्पक्षता और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी?

सात बैरिकेड और एक सवाल

सोमवार को छात्रों ने रांची में कई बैरिकेड पार किए। एक रिपोर्ट के अनुसार छात्र सातवीं और आखिरी बैरिकेडिंग तक पहुंचे, जिसके बाद पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। यह दृश्य प्रतीकात्मक भी है। एक तरफ पुलिस की बैरिकेडिंग है, दूसरी तरफ वे युवा हैं जो सरकारी नौकरी की तलाश में वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। बैरिकेड सिर्फ सड़क पर खड़ी लोहे की संरचना नहीं है। छात्रों के लिए यह उस व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है जिसके बारे में उन्हें लगता है कि उनकी आवाज वहां तक नहीं पहुंच रही। और सरकार के लिए यही प्रदर्शन कानून-व्यवस्था की चुनौती भी है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में सबसे जरूरी है कि विरोध का अधिकार और कानून-व्यवस्था- दोनों के बीच संतुलन बना रहे।

सिर्फ बातचीत से नहीं बनेगी बात

रांची का आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर है जहां सिर्फ एक और बातचीत शायद पर्याप्त नहीं होगी। सरकार को अपनी स्वीकार की गई मांगों पर स्पष्ट समयसीमा देनी होगी। छात्रों को भी यह स्पष्ट करना होगा कि किन मांगों पर तत्काल समाधान संभव है और किन पर कानूनी प्रक्रिया जरूरी है। अगर किसी परीक्षा में अनियमितता के आरोप हैं तो जांच ऐसी होनी चाहिए जिस पर अभ्यर्थियों और आम लोगों दोनों को भरोसा हो। साथ ही दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई और निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की सुरक्षा दोनों जरूरी हैं। क्योंकि परीक्षा में गलती का सबसे बड़ा नुकसान उस छात्र को होता है जिसने शायद उस परीक्षा के लिए अपनी जिंदगी के दो-तीन साल लगा दिए हों।

बैरिकेड से आगे की कहानी

रांची की सड़कों पर सोमवार को पानी की बौछार से छात्र शायद कुछ देर के लिए पीछे हुए हों, लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा है। क्या झारखंड अपने युवाओं को ऐसी भर्ती व्यवस्था दे सकता है जिसमें परीक्षा पर भरोसा हो, परिणाम पर भरोसा हो और न्याय की प्रक्रिया पर भी भरोसा हो? हजारों छात्र विधानसभा की ओर इसलिए बढ़े क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ एक मार्च नहीं था। यह उस व्यवस्था के केंद्र तक पहुंचने की कोशिश थी, जिसके जरिए वे अपने भविष्य की दिशा तय करना चाहते हैं। सरकार के सामने अब चुनौती केवल भीड़ को नियंत्रित करने की नहीं है। सरकार के लिए समक्ष यह चुनौती पैदा हो गई कि छात्रों का शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में भरोसा दोबारा कैसे पैदा हो?

Updated on:
10 Aug 2026 03:13 pm
Published on:
10 Aug 2026 03:13 pm