
किसान को गुलामी से आजादी दिलवाने वाले महानायक विजयसिंह पथिक। ( विजुअल: AI.)
राजस्थान के किसान आंदोलनों और जनजागरण के इतिहास में विजय सिंह पथिक का नाम एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने हथियारबंद क्रांति की राह से निकल कर किसानों के संगठित, अनुशासित और अहिंसक संघर्ष को नई दिशा दी। बिजोलिया किसान आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में उनका योगदान यादगार और निर्णायक रहा।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या लखनऊ के बड़े आंदोलनों तक सीमित नहीं थी। देश की रियासतों और गांवों में भी शोषण, बेगार और भारी करों के खिलाफ आवाजें उठ रही थीं। राजस्थान की धरती पर 'बिजोलिया किसान आंदोलन' इसी जनआक्रोश का ऐतिहासिक अध्याय था। इस आंदोलन ने किसानों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होना सिखाया और आगे चल कर राजस्थान में राजनीतिक चेतना के विस्तार की मजबूत जमीन तैयार की।
इस आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में 'विजय सिंह पथिक का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उनका मूल नाम 'भूप सिंह' था और उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली गांव में हुआ था। उनके परिवार का संबंध 1857 के विद्रोह से रहा था। उनके दादा ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान दिया था। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके भीतर बचपन से ही देशभक्ति और अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध की भावना पैदा की।
युवावस्था में भूप सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। वे 'सचिंद्र नाथ सान्याल' के संपर्क में आए और उनके माध्यम से क्रांतिकारी नेता 'रास बिहारी बोस' से भी जुड़े। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1915 की क्रांतिकारी योजनाओं में उनकी सक्रिय भूमिका रही। अंग्रेजी सरकार की नजर उन पर पड़ी और गिरफ्तारी का खतरा बढ़ गया।
इसके बाद उन्होंने अपनी पहचान बदल ली और ‘विजय सिंह पथिक’ नाम अपनाया। भारत सरकार के अभिलेखों में भी यह उल्लेख मिलता है कि क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था और वे साधु के वेश में चित्तौड़ क्षेत्र पहुंचे। यहीं से उनके जीवन की दिशा में बड़ा बदलाव आया। राजस्थान की रियासतों में किसानों की बदहाली को देख कर पथिक ने महसूस किया कि जनता को केवल राजनीतिक आजादी की नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की भी जरूरत है।
मेवाड़ रियासत का बिजोलिया ठिकाना आज के भीलवाड़ा जिले में स्थित है। यहां किसानों पर भारी करों और विभिन्न प्रकार की लागतों का बोझ था। '84 प्रकार की लागतें', बेगार और अन्य आर्थिक दबाव किसानों के जीवन को कठिन बना रहे थे। भारत सरकार के डिजिटल डिस्ट्रिक्ट रिपॉजिटरी के अनुसार बिजोलिया किसान आंदोलन की शुरुआती पृष्ठभूमि '1897' में तैयार हुई थी। आंदोलन के पहले चरण में साधु सीताराम दास की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके बाद 1916-17 के दौर में विजय सिंह पथिक आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता बने।
पथिक ने किसानों को समझाया कि व्यक्तिगत रूप से अत्याचार सहने के बजाय संगठित होकर अपनी मांगों को सामने रखना होगा। उन्होंने आंदोलन को केवल करों के विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे 'जनजागरण, शिक्षा, संगठन और आत्मसम्मान' से जोड़ा। किसानों के बीच पंचायतों, बैठकों और जागरूकता के माध्यम से संगठन मजबूत हुआ। शिक्षा के प्रसार के लिए पुस्तकालय और संस्थागत प्रयास भी किए गए। बिजोलिया में 'विद्या प्रचारिणी सभा' ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत सरकार के अभिलेखों के अनुसार साधु सीताराम दास ने 1915 में यहां विद्या प्रचारिणी सभा की शाखा स्थापित की थी, जिसने शिक्षा और चेतना के प्रसार का काम किया।
बिजोलिया आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत किसानों की सामूहिक एकजुटता थी। किसानों ने अत्यधिक करों और बेगार के खिलाफ विरोध जताते हुए खेती से जुड़े कई सरकारी आदेशों का बहिष्कार किया। आंदोलन का स्वरूप लंबे समय तक अहिंसक और संगठित रहा।
भारत सरकार के अभिलेख बिजोलिया आंदोलन को '1897 से 1941 तक चलने वाला 44 वर्ष का ऐतिहासिक किसान आंदोलन' बताते हैं। इसके अलग-अलग चरणों में अलग-अलग नेताओं ने भूमिका निभाई। सन 1916-23 के चरण में विजय सिंह पथिक का नेतृत्व विशेष रूप से प्रभावशाली रहा। बाद के चरण में माणिक्यलाल वर्मा सहित दूसरे नेताओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाया।
यही तथ्य इस आंदोलन को समझने के लिए बहुत जरूरी है। इसे केवल पथिक का आंदोलन कहना इतिहास को छोटा करना होगा; लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आंदोलन को 'राजस्थान और राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श तक पहुंचाने वाले प्रमुख सूत्रधारों में पथिक अग्रणी थे।'
पथिक समझते थे कि किसी रियासत के भीतर किसानों की समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए पत्रकारिता जरूरी है। उन्होंने समाचार पत्रों और लेखन का सहारा लिया। 'गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’' जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से बिजोलिया की स्थिति देश के व्यापक राजनीतिक समाज तक पहुंची।
पथिक स्वयं भी पत्रकार और लेखक थे। उन्होंने 'राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, राजस्थान संदेश और नव संदेश' जैसे प्रकाशनों से जुड़कर राजनीतिक चेतना फैलाने का काम किया। भारत सरकार के अभिलेखों में उन्हें निर्भीक पत्रकार, लेखक, कवि और वक्ता के रूप में दर्ज किया गया है। उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल साहित्य रचना नहीं था। वह जनता में आत्मविश्वास पैदा करने और राजनीतिक चेतना जगाने का माध्यम थी।
बिजोलिया आंदोलन की गूंज राष्ट्रीय नेताओं तक भी पहुंची। महात्मा गांधी ने इस किसान संघर्ष में रुचि दिखाई। भारत सरकार के अभिलेखों में पथिक और गांधी के बीच निकट संपर्क का उल्लेख मिलता है। बिजोलिया ने यह साबित किया कि देशी रियासतों के किसानों की समस्याएं भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यही कारण है कि राजस्थान के किसान आंदोलनों का इतिहास आगे चलकर प्रजामंडल और राजनीतिक जनजागरण से जुड़ता गया।
विजय सिंह पथिक का संघर्ष केवल बिजोलिया तक सीमित नहीं रहा। 'राजस्थान सेवा संघ' के माध्यम से राजस्थान की रियासतों में राजनीतिक जागृति और जनसेवा के प्रयासों को संस्थागत आधार मिला। उपलब्ध सरकारी स्रोत इसके गठन के 1919-20 के दौर से जोड़ते हैं और इनमें पथिक, जमनालाल बजाज और रामनारायण चौधरी की भूमिका का उल्लेख मिलता है। इस संगठन ने किसान आंदोलनों, सामाजिक सुधार और रियासती कुशासन के खिलाफ जनमत तैयार करने में भूमिका निभाई। राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार हुआ।
बिजोलिया के बाद मेवाड़ के बेगूं किसान आंदोलन ने भी जोर पकड़ा। पथिक का प्रभाव इस आंदोलन पर भी रहा और राजस्थान सेवा संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने किसानों के बीच संगठन खड़ा किया। रामनारायण चौधरी के सरकारी अभिलेख में 1923 के बेगूं किसान आंदोलन का उल्लेख मिलता है।
किसान आंदोलनों में सक्रियता के कारण पथिक को कई बार सरकारी दमन और जेल का सामना करना पड़ा। उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन उन्होंने लेखन और जनसेवा का रास्ता नहीं छोड़ा। भारत सरकार के अभिलेख उन्हें ऐसे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद करते हैं जिन्होंने किसानों के लिए संघर्ष करते हुए बार-बार गिरफ्तारी झेली।
विजय सिंह पथिक केवल आंदोलनकारी नहीं थे। वे साहित्यकार भी थे। ‘अजय मेरु’, ‘पथिक प्रमोद’, ‘पथिकजी के जेल के पत्र’ और ‘पथिक की कविताओं का संग्रह’ उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं। उन्होंने राष्ट्रवादी लेखन के जरिये जनता में देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना मजबूत की।
उनका चर्चित ‘झंडागान’ भी राष्ट्रीय चेतना जगाने वाली रचनाओं में गिना जाता है। भारत सरकार के अभिलेख के अनुसार उन्होंने 26 जनवरी 1930 को अजमेर में यह रचना की थी, जब देशभर में स्वतंत्रता के संकल्प का वातावरण था।
स्वतंत्रता आंदोलन के उतार-चढ़ाव के बीच पथिक का जीवन संघर्षों से भरा रहा। राजस्थान में उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध और आर्थिक कठिनाइयां भी आईं। इसके बावजूद उन्होंने लेखन और सामाजिक जागृति का काम जारी रखा।
1954 में उनका निधन हुआ। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव अभिलेख में उनके निधन को गर्मी से हुई तबीयत बिगड़ने से जोड़ते हुए 1954 का उल्लेख है। राजस्थान फाउंडेशन ने भी विजय सिंह पथिक को राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल किया है।
विजय सिंह पथिक की सबसे बड़ी विरासत यह थी कि उन्होंने किसान को केवल करदाता या रियासत की प्रजा के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसे ‘अधिकारों वाला नागरिक’ मानकर संगठित होने की प्रेरणा दी। बिजोलिया आंदोलन ने राजस्थान में राजनीतिक चेतना की ऐसी जमीन तैयार की, जिस पर आगे चल कर किसान आंदोलनों, प्रजामंडलों और जनाधिकार आंदोलनों का विस्तार हुआ। राजस्थान सरकार के प्रकाशन में बिजोलिया आंदोलन को सामंती अत्याचार के खिलाफ राजस्थान में राजनीतिक जागरण का महत्वपूर्ण आरंभिक अध्याय बताया गया है।
बहरहाल,आज विजय सिंह पथिक को याद करना केवल किसी स्वतंत्रता सेनानी की जीवनी पढ़ना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है जब किसान भारी करों, बेगार और सामंती दबाव के बीच भी अपनी आवाज उठाने के लिए एकजुट हुए थे। बिजोलिया की मिट्टी से उठी वह आवाज धीरे-धीरे पूरे राजस्थान में जनजागरण की आवाज बनी। और उस आवाज को दिशा देने वालों में विजय सिंह पथिक का नाम इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।
Updated on:
10 Aug 2026 04:06 pm
Published on:
10 Aug 2026 03:58 pm
