
AIIMS Study: AI Creative
AIIMS study yoga: अभी तक योग को हम स्ट्रेस कम करने, शरीर लचीला बनाने या फिटनेस बनाए रखने से जोड़कर देखते आए हैं। लेकिन दिल्ली AIIMS की एक नई स्टडी ने योग को एक बिल्कुल अलग भूमिका में परखा है और वो है नशा छुड़ाने की भूमिका वहीं, इसके नतीजे भी चौंकाने वाले हैं।
AIIMS दिल्ली के इंटिग्रेटिव मेडिसिन एंड रिसर्च सेंटर और सेंटर फॉर कम्यूनिटी मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने कई क्लिनिकल ट्रायल्स के डेटा पर विश्लेषण किया। इन्हें एक साथ मिलाकर एक सिस्टमेटिक रिव्यू और मेटा एनलिसिस किया। यानी उन्होंने अलग-अलग जगह हुई कई स्टडीज के नतीजों को इकट्ठा करके देखा कि योग वाकई तंबाकू छोड़ने में मदद करता है या नहीं। यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'Nicotine & Tobacco Research' में प्रकाशित हुई है।
नतीजा साफ था कि, जिन लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या में शामिल किया, उनमें तंबाकू छोड़ने की संभावना उन लोगों के मुकाबले करीब 50% ज्यादा पाई गई, जिन्होंने सिर्फ पारंपरिक तरीकों (जैसे काउंसलिंग या दवाओं) का सहारा लिया।
यहां समझने वाली बात यह है कि तंबाकू या सिगरेट छोड़ना मुश्किल क्यों होता है। ज्यादातर लोग वापस इसकी तरफ इसलिए लौटते हैं क्योंकि क्रेविंग (तलब), बेचैनी, चिंता और तनाव उन्हें दोबारा धकेल देते हैं।
रिसर्च में पाया गया कि योग के तीन हिस्से, आसन (शारीरिक मुद्राएं), प्राणायाम (सांस से जुड़े अभ्यास) और ध्यान ऐसे हिस्से हैं जो इन्हीं ट्रिगर्स पर सीधा असर डालते हैं। ये अभ्यास इमोशनल रेगुलेशन यानी भावनाओं को संभालने की क्षमता बेहतर करते हैं, जिससे व्यक्ति क्रेविंग के दौरान खुद को बेहतर तरीके से संभाल पाता है, वह भी बिना सिगरेट या तंबाकू का सहारा लिए। यानी योग सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि दिमाग की उस 'बेचैनी' को भी शांत करता है, जो लत को दोबारा जगाती है।
स्टडी में यह भी सामने आया कि योग करने वालों में सिर्फ तंबाकू छोड़ने की दर ही नहीं बढ़ी, बल्कि उनकी चिंता (anxiety), डिप्रेशन और तनाव के लक्षण भी कम हुए। ये तीनों ही ऐसे मानसिक कारण हैं जो, अक्सर लोगों को दोबारा लत की तरफ धकेलते हैं। यानी योग एक साथ दो मोर्चों पर काम करता दिखा, शारीरिक लत पर भी और उसके पीछे छिपे मानसिक कारणों पर भी।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऐसा नहीं है और यह बात रिसर्चर्स में भी साफ की गई है। योग को यहां एक 'complementary therapy' यानी सहायक उपचार के तौर पर देखा गया है, किसी विकल्प के तौर पर नहीं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि योग को व्यावहारिक काउंसलिंग और डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाओं के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाए, न कि उनकी जगह पर।
रिसर्चर्स का कहना है कि योग एक ऐसा तरीका है जो सस्ता, आसानी से उपलब्ध और भारतीय संस्कृति के हिसाब से पहले से जाना-पहचाना है। इसीलिए इसे सरकारी तंबाकू-मुक्ति कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से शामिल किया जा सकता है।
भारत में तंबाकू का इस्तेमाल एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या रहा है। करोड़ों लोग सिगरेट, बीड़ी, गुटखा और खैनी जैसे उत्पादों की लत से जूझते हैं और ज्यादातर सरकारी डी-एडिक्शन प्रोग्राम्स मुख्य रूप से काउंसलिंग और दवाओं पर ही केंद्रित रहते हैं।
अगर योग जैसा एक ऐसा तरीका, जो हर गांव-शहर में पहले से मौजूद है, बिना ज्यादा खर्च के तंबाकू-मुक्ति कार्यक्रमों को मजबूत बना सकता है, तो यह ग्रामीण और कम संसाधन वाले इलाकों के लिए खासतौर पर उपयोगी साबित हो सकता है। जहां महंगी दवाओं या नियमित काउंसलिंग तक पहुंच सीमित होती है।
स्टडी स्पष्ट करती है कि सिर्फ फिटनेस या रिलैक्सेशन तक सीमित नहीं, बल्कि एक ऐसे टूल के तौर पर जो नशे जैसी गहरी आदतों को तोड़ने में वैज्ञानिक रूप से मदद कर सकता है। भारत के अपने पारंपरिक अभ्यास को अब आधुनिक मेडिकल रिसर्च का समर्थन मिल रहा है।
Updated on:
10 Aug 2026 06:18 pm
Published on:
10 Aug 2026 06:18 pm
