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जब एक आवाज पूरे हिंदुस्तान की धड़कन बन गई, मोहम्मद रफी की कुछ ऐसी यादें, जो कभी पुरानी नहीं होंगी

Mohammed Rafi : मोहम्मद रफी की वो आवाज जो पूरे भारत की धड़कन बन गई। जानिए उनके बचपन के फकीर के किस्से से लेकर के.एल. सहगल के कंसर्ट, दरियादिली और सदाबहार गीतों की अनकही दास्तान।
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Jul 31, 2026
Mohammed Rafi
Mohammed Rafi : मोहम्मद रफी के कुछ किस्से।

31 जुलाई 1980 की शाम मुंबई पर बारिश का साया था। खबर फैली कि मोहम्मद रफी नहीं रहे। कुछ ही घंटों में सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। कोई फिल्म स्टार नहीं था, कोई नेता नहीं था, फिर भी हजारों लोग घरों से निकल आए थे। वजह सिर्फ इतनी थी कि जिस शख्स को वे अंतिम विदाई देने जा रहे थे, उसकी आवाज उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।

किसी के पहले प्यार में रफी थे, किसी की शादी में रफी थे, किसी की तन्हाई में रफी थे और किसी की इबादत में भी रफी ही थे।

लेकिन यह कहानी उस दिन से शुरू नहीं होती। यह कहानी शुरू होती है पंजाब के एक छोटे से गांव से, जहां एक दुबला-पतला लड़का घंटों एक फकीर के पीछे-पीछे घूमता था। फकीर गाता हुआ गुजरता और वह लड़का उसकी आवाज की नकल करता। घरवालों को लगता था कि बच्चा खेल रहा है, लेकिन शायद किस्मत उस समय भारत के सबसे बड़े गायक की रिहर्सल करा रही थी।

वह लड़का था मोहम्मद रफी। मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। बचपन में उनका उपनाम 'फीको' था।

कहते हैं जिंदगी कभी-कभी एक पल में बदल जाती है। रफी की जिंदगी में भी ऐसा ही एक पल आया। लाहौर में मशहूर गायक के.एल. सहगल का कार्यक्रम था। हजारों लोग जमा थे। तभी बिजली चली गई। सहगल ने गाने से इनकार कर दिया। भीड़ नाराज होने लगी। आयोजकों ने एक युवा लड़के को मंच पर भेज दिया ताकि लोग शांत हो जाएं। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ मिनट बाद वही लड़का पूरे कार्यक्रम की चर्चा बन जाएगा। उस रात रफी ने सिर्फ गीत नहीं गाया था, अपनी किस्मत लिख दी थी।

फिर मुंबई आए, संघर्ष आया, छोटे-छोटे मौके आए और देखते ही देखते वह दौर आया जब फिल्म इंडस्ट्री का शायद ही कोई बड़ा अभिनेता हो, जिसके लिए रफी ने आवाज न दी हो। मजेदार बात यह थी कि रफी सिर्फ गाते नहीं थे, वह अभिनेता बन जाते थे।

शम्मी कपूर पर्दे पर कूदते-फांदते नजर आते तो लगता आवाज भी नाच रही है। दिलीप कुमार की आंखों में दर्द होता तो रफी की आवाज भी भर्रा जाती। जॉनी वॉकर आते तो वही आवाज शरारती हो जाती। मानो एक गले में दर्जनों कलाकार रहते हों। लेकिन, रफी को महान सिर्फ उनकी गायकी ने नहीं बनाया।

एक किस्सा फिल्म इंडस्ट्री में आज भी सुनाया जाता है। एक निर्माता आर्थिक संकट में था। फिल्म अधूरी थी और पैसे खत्म हो चुके थे। रफी ने उसकी परेशानी सुनी और बेहद मामूली रकम लेकर गीत रिकॉर्ड कर दिया। ऐसे किस्से एक-दो नहीं, दर्जनों हैं। लोग कहते हैं कि रफी साहब पैसे कमाने नहीं, गाना गाने आए थे।

उनकी दरियादिली का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि उन्होंने कई लोगों की मदद की, लेकिन कभी उसका जिक्र नहीं किया। आज के दौर में जहां छोटी-सी मदद भी सोशल मीडिया पोस्ट बन जाती है, वहां रफी ने जिंदगी भर खामोशी से लोगों का साथ दिया।

फिर एक दौर ऐसा भी आया जब उनका और लता मंगेशकर का रॉयल्टी को लेकर मतभेद हो गया। दोनों ने साथ गाना बंद कर दिया। फिल्म इंडस्ट्री को लगा कि अब शायद यह दूरी कभी खत्म नहीं होगी। लेकिन संगीत ने आखिरकार अहंकार पर जीत हासिल की और दोनों फिर साथ आए। इसके बाद जो गीत बने, वे आज भी संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट में सबसे ऊपर मिलते हैं।

रफी की सबसे बड़ी ताकत शायद यह थी कि वह अपने गीतों में खुद को गायब कर देते थे।

जब 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' सुनिए तो लगता है कोई भक्त गा रहा है। 'ये दुनिया ये महफिल' सुनिए तो लगता है कोई टूटा हुआ दिल बोल रहा है। 'बहारों फूल बरसाओ' सुनिए तो लगता है जैसे प्यार खुद आवाज बन गया हो। शायद इसी वजह से रफी सिर्फ गायक नहीं रहे, लोगों की भावनाओं की आवाज बन गए।

आज भी अगर किसी पुराने रेडियो से 'अभी न जाओ छोड़कर' बजने लगे तो अचानक वक्त धीमा पड़ जाता है। नई पीढ़ी शायद उस दौर को नहीं जानती, लेकिन रफी की आवाज सुनकर उसे भी लगता है कि इस गायक में कुछ तो खास था और सच कहें तो यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है।

मोहम्मद रफी को लेकर एक दिलचस्प किस्सा अक्सर संगीत प्रेमियों के बीच सुनाया जाता है। यह उस दौर की बात है जब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी और उनके गीत रेडियो से लेकर सिनेमाघरों तक हर जगह गूंजते थे।

एक दिन रफी साहब कार से कहीं जा रहे थे। रास्ते में रेडियो पर उनका ही एक मशहूर गीत बजने लगा। साथ बैठे व्यक्ति ने उत्साह से कहा, 'रफी साहब, यह तो आपका गाना है।' रफी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, 'नहीं, यह मेरी आवाज नहीं लग रही।'

साथ बैठे लोग हैरान रह गए। गाना खत्म हुआ और उद्घोषक ने साफ बताया कि गीत मोहम्मद रफी ने गाया है। तब भी रफी साहब हंसते हुए बोले, 'अच्छा! फिर तो मैंने ही गाया होगा।'

46 साल बाद भी लोग मोहम्मद रफी को याद करते हैं, उनके गीत गुनगुनाते हैं, उनके किस्से सुनाते हैं। क्योंकि कुछ आवाजें सिर्फ कानों तक नहीं पहुंचतीं, वे दिल में घर बना लेती हैं।

मोहम्मद रफी की आवाज भी ऐसी ही थी।

एक आवाज, जो चली गई।

एक एहसास, जो आज भी जिंदा है।

Updated on:
31 Jul 2026 03:39 pm
Published on:
31 Jul 2026 03:38 pm