
MP Freedom fighter Rani avantibai: मध्य प्रदेश के सिवनी जिले का एक छोटा सा गांव था मनकेहणी गांव। 16 अगस्त 1831 की सुबह जमींदार राव जुझार सिंह के घर एक बेटी का जन्म हुआ। कहा जाता है कि जब दाई ने उसे गोद में उठाया, तो बच्ची रोई नहीं, बल्कि आंखें खोलकर सबको ताक रही थी। जैसे पहले ही दिन दुनिया को परखने की कोशिश कर रही थी।
दायी ने जब उसे राव जुझार सिंह के हाथों में दिया तो, उसे गोद में लेते ही वे बोल पड़े इसका नाम हम अंवती रखेंगे। ये कोई आम लड़की नहीं बनेगी। और राव जुझार की यह बात सच साबित हुई। कहते हैं न पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। जैसे-जैसे अवंती बड़ी होने लगी, उसकी खूबियां सामने आने लगी।
बचपन से ही यह लड़की औरों से अलग थी। जहां बाकी लड़कियां गुड़िया खेलतीं, वहीं अवंती घुड़सवारी सीख रही थी, तलवार चलाना सीख रही थी, धनुष-बाण साधना सीख रही थी। पिता ने कभी उसे रोका नहीं। उन्हें शायद पता था कि यह बेटी आने वाले समय में इतिहास रचेगी।
जब अवंतीबाई बड़ी हुईं तो, तब उनका विवाह रामगढ़ रियासत के युवराज विक्रमादित्य सिंह लोधी से हुआ। घर से डोली उठी और रामगढ़ पहुंच गई। सिवनी की राजकुमारी अब रामगढ़ की रानी बन गई थीं।
फिर एक दिन विक्रमादित्य सिंह बीमार पड़ गए। तब राज-काज की बागडोर अवंतीबाई को संभालनी पड़ी। उन्होंने इस जिम्मेदारी को बड़ी कुशलता से निभाया। किसानों के हित में काम किए, प्रजा का ख्याल रखा। रामगढ़ की जनता के दिल में रानी ने अपने लिए जगह बना ली।
लेकिन उस दौर में अंग्रेज एक नई चाल चल रहे थे। 'हड़प नीति', यानी जिस रियासत का कोई बालिग वारिस सत्ता संभालने में सक्षम न हो, अंग्रेज उसे अपने कब्जे में ले लेते थे। विक्रमादित्य सिंह की बीमारी को बहाना बनाकर अंग्रेजों ने रामगढ़ पर भी नजरें गड़ा दीं। लेकिन रानी अवंतीबाई को यह मंजूर नहीं था। यह सिर्फ एक रियासत छिनने की बात नहीं थी। यह उनके स्वाभिमान पर हमला था।
और यहीं से शुरू होती है वह कहानी, जो अवंतीबाई को बाकी रानियों से अलग खड़ा कर देती है। 1857 की क्रांति की आग जब देश में फैलने लगी, तो रानी ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने आसपास के राजाओं और सरदारों के पास एक चिट्ठी के साथ काली चूड़ियां भिजवाईं। इनमें संदेश साफ था, 'जो अंग्रेजों के खिलाफ हथियार नहीं उठा सकता, वो ये चूड़ियां पहन ले।' यह ललकार थी और असर भी कर गई। कई जागीरदार और स्थानीय लोग उनके साथ आ खड़े हुए।
रानी ने खुद की एक सेना खड़ी की और मोर्चा संभाला। रामगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में उन्होंने अंग्रेजी फौज को कई बार छकाया। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाकर उन्होंने बड़ी-बड़ी टुकड़ियों को नाकों चने चबवा दिए। एक समय तो अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। लेकिन अंग्रेजों के पास संसाधन और हथियार ज्यादा थे। धीरे-धीरे घेराबंदी कसती गई। देवहारगढ़ के घने जंगलों में आखिरी लड़ाई लड़ी गई। रानी अपनी सेना के साथ डटी रहीं, लेकिन हालात बिगड़ते गए।
20 मार्च 1858 को, जब यह साफ हो गया कि हार सामने है और अंग्रेजों के हाथ आना तय है, तो रानी अवंतीबाई ने वो फैसला लिया जो उनकी आत्मा की आजादी को दर्शाता है। उन्होंने कैद होना स्वीकार नहीं किया। अपनी ही तलवार से उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। दुश्मन के आगे झुकने से बेहतर उन्हें खुद को मृत्यु देना लगा।
रानी अवंतीबाई का नाम इतिहास की किताबों में उतनी जगह नहीं पा सका, जितना उनके बलिदान को मिलना चाहिए था। लेकिन मध्य प्रदेश के सिवनी और मंडला क्षेत्र में आज भी उन्हें 'रामगढ़ की रानी' के नाम से याद किया जाता है और उनके नाम पर कई स्मारक और योजनाएं भी बनी हैं।