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भारत की हेल्थ रिसर्च में बड़ा बदलाव! नई नीति से बीमारी के इलाज से लेकर सरकारी योजनाओं तक क्या बदलेगा?

national health research policy 2026 india: भारत की नई ड्राफ्ट हेल्थ रिसर्च पॉलिसी 2026 में क्या है खास? जानिए गवर्नेंस ढांचा, बजट में वृद्धि, 2047 के लक्ष्य और AI-ICMR पार्टनरशिप तक की पूरी बात
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Aug 08, 2026
national health research policy 2026 india
national health research policy 2026 india: जानिए आपकी हेल्थ के लिए सरकार क्या-क्या कर रही है? (AI Creative)

National Health Research Policy 2026: भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान अब सिर्फ मेडिकल कॉलेजों और प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय सीधे बीमारी के बोझ, मरीजों की जरूरत, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और आम लोगों तक पहुंचने वाले इलाज से जोड़ने की तैयारी है। केंद्र के Department of Health Research (DHR) ने Draft National Health Research Policy 2026 जारी की है। इसका उद्देश्य देश के बिखरे हुए हेल्थ-रिसर्च सिस्टम को एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचे में जोड़ना और यह सुनिश्चित करना है कि रिसर्च का फायदा शोध-पत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि अस्पतालों, स्वास्थ्य योजनाओं, इलाज और नीतियों तक पहुंचे। हालांकि यह अभी ड्राफ्ट पॉलिसी है, अंतिम लागू नीति नहीं। DHR की वेबसाइट पर इसे सार्वजनिक राय के लिए रखा गया था।

क्यों पड़ी नई हेल्थ रिसर्च पॉलिसी की जरूरत?

ड्राफ्ट नीति खुद भारत के मौजूदा हेल्थ रिसर्च सिस्टम की कई चुनौतियों को स्वीकार करती है। इसके मुताबिक रिसर्च क्षमता कुछ चुनिंदा संस्थानों और क्षेत्रों में अधिक केंद्रित है। कई बार शोध की प्राथमिकताएं देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से पूरी तरह मेल नहीं खातीं। वहीं एक और बड़ी समस्या रिसर्च और उसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच की दूरी। किसी बीमारी पर रिसर्च हो सकती है, शोध-पत्र प्रकाशित हो सकता है या कोई तकनीक विकसित हो सकती है, लेकिन उसे सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम, अस्पतालों और आम मरीजों तक पहुंचने में समय लग सकता है। ड्राफ्ट नीति इसी अंतर को कम करने पर जोर देती है।

बीमारी के बोझ के हिसाब से तय होगी रिसर्च की प्राथमिकता

नई नीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि स्वास्थ्य अनुसंधान की प्राथमिकताएं बीमारी के वास्तविक बोझ, स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत, समानता, महामारी की तैयारी और राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखकर तय की जाएं। इसके लिए National Health Research Agenda (NHRA) बनाने का प्रस्ताव है। इसमें राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, समुदायों, मरीजों, फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों, शोधकर्ताओं और संस्थानों की भागीदारी की बात कही गई है। साथ ही, नीति राज्यों को अपने स्तर पर रिसर्च एजेंडा बनाने और private hospitals, industry, startups तथा philanthropy को भी रिसर्च में ज्यादा भागीदारी देने के लिए प्रोत्साहित करती है।

इसका अर्थ यह है कि रिसर्च का सवाल केवल यह नहीं होगा कि वैज्ञानिक क्या शोध करना चाहते हैं, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि देश को किस समस्या पर सबसे ज्यादा वैज्ञानिक जवाब की जरूरत है।

नीति को लागू कौन करेगा? तीन-स्तरीय गवर्नेंस मॉडल

ड्राफ्ट नीति में एक तीन-स्तरीय गवर्नेंस ढांचा भी प्रस्तावित है, जो यह तय करेगा कि इतने बड़े बदलाव जमीन पर कैसे उतरेंगे-

  • नेशनल हेल्थ रिसर्च सट्यूआर्डशिप कमेटी (National Health Research Stewardship Committee) समग्र रणनीतिक दिशा और नीति समन्वय की जिम्मेदारी।
  • हेल्थ रिसर्च विभाग (DHR)- नोडल इम्प्लिमेंटिक और को-ऑर्डिनेटिंग एजेंसी की भूमिका में।-ICMR (Indian Council of Medical Research)- वैज्ञानिक और तकनीकी नेतृत्व प्रदान करेगा।
  • इसके अलावा नीति में एक नेशनल रिसर्च इंटीग्रिटी ऑफिस बनाने का भी प्रस्ताव है। इसका मकसद वैज्ञानिक ईमानदारी और नैतिक निगरानी को मजबूत करना है। साथ ही मल्टीसेंटर स्टडीज के लिए मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाने पर भी जोर है, ताकि रिसर्च शुरू होने में देरी कम हो।

सबसे बड़ा बदलाव क्या? रिसर्च से सीधे इलाज तक

नीति का सबसे जनहित वाला हिस्सा ट्रांसलेशन है। इसका मतलब है वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से बाहर निकालकर नीति, अस्पताल, सरकारी कार्यक्रम, क्लिनिकल प्रैक्टिस और आम लोगों तक पहुंचाना। मसलन, यदि किसी भारतीय बीमारी के लिए कोई नई जांच तकनीक विकसित होती है, तो उसका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह वास्तविक स्वास्थ्य व्यवस्था में कितनी उपयोगी है, कितनी सस्ती है और क्या उसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।

नीति में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी आकलन, सरकारी खरीद, नियमन, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और अंतिम व्यक्ति तक पहुंच को रिसर्च सिस्टम का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव है। यही बदलाव इसे केवल 'वैज्ञानिकों की नीति' के बजाय जनस्वास्थ्य की नीति बनाता है।

सरकार कितना पैसा लगा रही है?

हेल्थ रिसर्च के लिए सरकारी निवेश में भी बढ़ोतरी हुई है। केंद्र सरकार के अनुसार DHR का बजट आवंटन 2014-15 के 932 करोड़ रुपए से बढ़कर 2026-27 में 4,821.21 करोड़ रुपए हो गया है। 2026-27 का आवंटन 2025-26 के संशोधित अनुमान 3,900.69 करोड़ रुपए से करीब 24 प्रतिशत अधिक है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। 2026-27 में DHR का बजट आवंटन GDP का करीब 0.012 प्रतिशत बताया गया है। इसलिए सिर्फ बजट बढ़ना पर्याप्त नहीं है; सवाल यह भी है कि यह पैसा किस तरह की रिसर्च और किस परिणाम तक पहुंचता है।

इसी बजट के साथ Union Budget 2026-27 में बायोफार्मा शक्ति नाम की एक नई स्कीम की भी घोषणा की गई है, जिसमें अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना है। इसका मकसद भारत को बायोलॉडजिक्स, बायोसिमिलर्स औऱ क्लिनिकल रिसर्च में एक ग्लोबल बायोफार्मा हब बनाना है। इसके तहत तीन नए NIPER स्थापित किए जाएंगे और 1,000 से ज्यादा एक्रेडिटेड क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क तैयार होगा। नई ड्राफ्ट नीति इसी वजह से केवल खर्च बढ़ाने की बात नहीं करती, बल्कि रिसर्च के प्रभाव को मापने की व्यवस्था भी प्रस्तावित करती है।

2047 तक कितना बड़ा लक्ष्य?

ड्राफ्ट नीति ने हेल्थ रिसर्च के लिए लंबी अवधि के लक्ष्य भी प्रस्तावित किए हैं। इसके मुताबिक स्वास्थ्य अनुसंधान पर निवेश को GDP के 0.024 प्रतिशत के मौजूदा बेसलाइन से बढ़ाकर 2037 तक 0.072 प्रतिशत और 2047 तक 0.15 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही Medical Science PhDs, हेल्थ रिसर्च पब्लिकेशन्स, लाइफ साइंस पेटेंट्स और स्वदेशी हेल्थ टेक्नोलॉजीज जैसे संकेतकों को भी ट्रैक करने का प्रस्ताव है।इससे साफ है कि सरकार रिसर्च को केवल खर्च के रूप में नहीं, बल्कि मानव संसाधन, पेटेंट, तकनीक और स्वास्थ्य परिणामों से जोड़कर देखना चाहती है।

मेडिकल कॉलेजों को भी रिसर्च का केंद्र बनाने की कोशिश

2026 में DHR ने मेडिकल कॉलेज रिसर्च कनेक्ट कार्यक्रम के जरिए देश के 100 से ज्यादा मेडिकल कॉलेजों में स्थापित multidisciplinary research units को एक मंच पर लाने की पहल की। यह दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन 26-27 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित हुआ था। इसका उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों में रिसर्च क्षमता और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।

इसके अलावा 2025-26 में DHR ने मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और विभिन्न शोध कार्यक्रमों के लिए करोड़ों रुपए जारी किए। इनमें Viral Research and Diagnostic Labs, Multi-disciplinary Research Units, Health Technology Assessment और molecular oncology diagnostics जैसी पहल शामिल थीं। यानी नई नीति के साथ-साथ जमीन पर रिसर्च नेटवर्क को विस्तार देने की कोशिश भी चल रही है।

AI, जीनोमिक्स और नई तकनीक भी नीति के केंद्र में

भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियां केवल पारंपरिक बीमारियों तक सीमित नहीं हैं। AI, जीनोमिक्स, डिजिटल हेल्थ, पेंडेमिक प्रीपेयर्डनेस और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज तेजी से स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। ड्राफ्ट नीति में डिजिटल हेल्थ, इमर्जिंग डुमेंस को स्वास्थ्य अनुसंधान के दायरे में शामिल किया गया है। साथ ही डेटा गवर्नेंस, AI, जीनोमिक डेटा, सेंसेटिव डेटा, साइबर सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी अलग से ध्यान दिया गया है।

मई 2026 में IndiaAI और ICMR ने भी स्वास्थ्य क्षेत्र में जिम्मेदार और बड़े पैमाने पर AI के इस्तेमाल के लिए सहयोग समझौता किया था। इस MoU के तहत ICMR अपने MIDAS (Medical Information Data for AI Solutions) फ्रेमवर्क के जरिए anonymised biomedical डेटासेट, AI मॉडल्स और टूलकिट्स को AIKosh प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराएगा, जबकि IndiaAI ICMR को सब्सिडाइज्ड दरों पर GPU आधारित कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर देगा। इसका लक्ष्य AI तकनीक और biomedical research को जोड़ना है।

क्या इससे आम मरीज को तुरंत फायदा मिलेगा?

आपके लिए यह जानना जरूरी है, क्योंकि ऐसा नहीं होता है। दरअसल ड्राफ्ट नीति अपने आप कोई नई दवा, अस्पताल या मुफ्त इलाज उपलब्ध नहीं कराती। इसका असर तभी दिखाई देगा जब इसके प्रस्ताव लागू होंगे, रिसर्च फंडिंग समय पर मिलेगी, राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्था से शोध जुड़ेगा और सफल तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाएगा।

नीति स्वयं मानती है कि भारत में रिसर्च क्षमता और संस्थागत क्षमता समान रूप से वितरित नहीं है। इसलिए सिर्फ दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या कुछ बड़े मेडिकल संस्थानों में रिसर्च मजबूत करने से लक्ष्य पूरा नहीं होगा। छोटे शहरों, मेडिकल कॉलेजों और कम संसाधन वाले क्षेत्रों तक रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर पहुंचाना भी जरूरी होगा।

असली परीक्षा होगी, लैब से आखिरी मरीज तक

नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2026 (National Health Research Policy 2026) का सबसे बड़ा दावा यही है कि भारत में हेल्थ रिसर्च को 'शोध-पत्र से सार्वजनिक लाभ' की पूरी श्रृंखला में बदला जाए। अगर किसी रिसर्च से बेहतर जांच, सस्ती दवा, प्रभावी वैक्सीन, नई मेडिकल डिवाइस या बेहतर सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम बनता है और वह देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंचता है, तभी इस नीति का वास्तविक असर माना जाएगा।

इसलिए आने वाले वर्षों में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि भारत ने कितने शोध-पत्र प्रकाशित किए। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल होंगे, कितनी रिसर्च मरीजों के इलाज में बदली? कितनी स्वदेशी तकनीकें अस्पतालों तक पहुंचीं? कितनी खोजों ने सरकारी नीतियां बदलीं? और सबसे अहम सवाल होगा, क्या रिसर्च का फायदा उस व्यक्ति तक पहुंचा, जिसके लिए यह पूरा सिस्टम बनाया जा रहा है? यही National Health Research Policy 2026 की असली परीक्षा होगी।

Updated on:
08 Aug 2026 12:20 pm
Published on:
08 Aug 2026 12:20 pm