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भारत में रिसर्च पर कितना खर्च? Research & Development में पीछे रहना कहीं फ्यूचर टेक्नोलॉजी के लिए खतरा तो नहीं!

India R&D Spending: भारत का R & D खर्च दोगुना बढ़ा, लेकिन GDP के मुकाबले अब भी 1% से नीचे। जानिए सरकार की 1 लाख करोड़ रुपए की RDI योजना, निजी क्षेत्र की कमजोर भागीदारी और ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की उछाल के 81वें स्थान से 38वें स्थान के पीछे की पूरी कहानी।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 08, 2026

India Research and Development Spending

India Research and Development Spending (AI Creative)

India R&D Spending: भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल पेमेंट, वैक्सीन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर तक भारत अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक अहम सवाल है, देश रिसर्च और डेवलपमेंट यानी R&D पर वास्तव में कितना खर्च कर रहा है?

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत का R&D खर्च बढ़ा जरूर है, लेकिन GDP के मुकाबले इसका अनुपात अभी भी 1 प्रतिशत से नीचे है। Department of Science and Technology (DST) के उपलब्ध विस्तृत आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में भारत का Gross Expenditure on Research and Development (GERD) 1,27,380.96 करोड़ था, जो 2010-11 के 60,196.75 करोड़ रुपए से दोगुने से ज्यादा है। लेकिन GDP के अनुपात में GERD 2020-21 में केवल 0.64 प्रतिशत था।

खर्च बढ़ा, लेकिन GDP के मुकाबले तस्वीर कमजोर

R&D खर्च को सिर्फ कुल रुपए में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ कुल खर्च बढ़ना स्वाभाविक है। असली सवाल यह है कि देश अपनी पूरी अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा नए ज्ञान, तकनीक और उत्पाद विकसित करने पर लगा रहा है। DST के अनुसार भारत का GERD/GDP अनुपात 2019-20 में 0.66 प्रतिशत और 2020-21 में 0.64 प्रतिशत था। यानी पिछले वर्षों में कुल R&D खर्च बढ़ने के बावजूद GDP के अनुपात में इसमें बड़ा बदलाव नहीं आया। यही अंतर भारत की चुनौती को समझने में महत्वपूर्ण है।

OECD के मुताबिक 2023 में OECD देशों का औसत R&D intensity लगभग 2.7 प्रतिशत था। चीन 2.6 प्रतिशत तक पहुंच चुका था, जबकि दक्षिण कोरिया करीब 5 प्रतिशत पर था। इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ ज्यादा R&D खर्च करने से कोई देश तकनीकी महाशक्ति बन जाता है। लेकिन लंबे समय तक कम निवेश से अत्याधुनिक तकनीक, पेटेंट, डीप-टेक कंपनियों और विश्वविद्यालयों की रिसर्च क्षमता विकसित करने की गति प्रभावित हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल-पैसा कौन लगा रहा है?

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर भी R&D खर्च की रफ्तार अब धीमी पड़ रही है। OECD की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक OECD देशों का R&D intensity 2024 में भी 2.7% पर स्थिर रहा, जबकि सरकारी R&D बजट में महंगाई-समायोजित आधार पर 4.1% की गिरावट आई और खर्च का रुख अब रक्षा क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है। इसके उलट चीन का R&D intensity 2024 में OECD के स्तर के करीब पहुंच चुका है, जो दिखाता है कि वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में चीन की पकड़ लगातार मजबूत हो रही है, यह भारत के लिए एक अतिरिक्त चुनौती है।

अब सरकार ने निजी R&D को बढ़ाने के लिए क्या किया?

इस चुनौती को देखते हुए सरकार ने Research, Development and Innovation (RDI) Scheme शुरू की है। इसके तहत छह वर्षों में 1 लाख करोड़ रुपए का फंड बनाया गया है। इसका उद्देश्य खासतौर पर निजी क्षेत्र में हाई-रिस्क और हाई-इम्पैक्ट रिसर्च को बढ़ावा देना है। योजना में क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, स्पेस, AI, बायोटेक्नोलॉजी, मेडिकल डिवाइस, ऊर्जा और डिजिटल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।

जुलाई 2026 तक इस फंड के तहत Technology Development Board को 500 करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके थे। TDB ने 22 परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिनकी कुल परियोजना लागत 4,744 करोड़ रुपए थी और इनमें RDI Fund का समर्थन 2,192 करोड़ रुपए था। Biotechnology Industry Research Assistance Council यानी BIRAC ने भी आठ परियोजनाओं को समर्थन के लिए शॉर्टलिस्ट किया था। इससे संकेत मिलता है कि सरकार अब केवल सरकारी प्रयोगशालाओं में रिसर्च बढ़ाने के बजाय रिसर्च को उद्योग और बाजार से जोड़ने पर भी जोर दे रही है।

रिसर्च का फायदा आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा?

R&D का मतलब केवल वैज्ञानिक पेपर या प्रयोगशाला में नई खोज तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से है। बेहतर मेडिकल रिसर्च से नई दवाएं और सस्ती मेडिकल तकनीक विकसित हो सकती हैं। कृषि अनुसंधान से बेहतर बीज और मौसम आधारित सलाह मिल सकती है। ऊर्जा क्षेत्र में रिसर्च से बैटरी और स्टोरेज तकनीक सस्ती हो सकती है। AI और रोबोटिक्स में निवेश से उद्योगों की उत्पादकता बढ़ सकती है। लेकिन यहां एक दूसरी चुनौती भी है और वो है लैब से बाजार तक पहुंच।

किसी तकनीक की खोज हो जाना और उसका बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हो जाना दो अलग चीजें हैं। इसी वजह से RDI Scheme को technology development और commercialization से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य घरेलू तकनीकी क्षमता बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारतीय उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत करना है।

क्या भारत को 2 प्रतिशत R&D खर्च का लक्ष्य रखना चाहिए?

भारत में लंबे समय से R&D पर GDP के करीब 2 प्रतिशत खर्च का लक्ष्य चर्चा में रहा है। DST ने भी पहले इस दिशा में लक्ष्य का उल्लेख किया है। लेकिन केवल प्रतिशत बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। खर्च की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होगी। किस क्षेत्र में पैसा जा रहा है, कितनी रिसर्च वास्तविक उत्पादों में बदल रही है, कितने पेटेंट व्यावसायिक उपयोग तक पहुंच रहे हैं और निजी कंपनियां कितनी दीर्घकालिक रिसर्च कर रही हैं।

दुनिया के दूसरे बड़े देशों में R&D की तस्वीर

  • भारत की तुलना दुनिया के टॉप R&D खर्च करने वाले देशों से करें तो फासला साफ नजर आता है। 2022 के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका ने R&D पर सबसे ज्यादा 923.24 अरब डॉलर खर्च किए, जो उसके GDP का 3.59% था। दूसरे नंबर पर चीन रहा, जिसने 811.86 अरब डॉलर खर्च किए, यानी GDP का 2.56%। जापान (200.77 अरब डॉलर, GDP का 3.41%), जर्मनी (174.86 अरब डॉलर, GDP का 3.13%) और दक्षिण कोरिया (139 अरब डॉलर) टॉप 5 में शामिल रहे।
  • दुनिया के टॉप 5 R&D प्रदर्शन करने वाले देश, अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया वैश्विक R&D खर्च का करीब 73% हिस्सा खर्च करते हैं।
  • GDP के अनुपात के मुताबिक देखा जाए तो जो तस्वीर सामने आती है वह दिलचस्प है। दरअसल दक्षिण कोरिया इस मामले में सबसे आगे है। 2023 में दक्षिण कोरिया का GERD/GDP अनुपात 4.96% था, जबकि अमेरिका का 3.45% और जापान का 3.44% रहा। जर्मनी की बात करें तो 2023 में उसका R&D खर्च करीब 132 अरब यूरो तक पहुंच गया, जिसमें करीब 67% हिस्सा निजी क्षेत्र (कमर्शियल सेक्टर) का था।
  • चीन की रफ्तार खासतौर पर चौंकाने वाली है। 2000 में वैश्विक R&D खर्च में चीन की हिस्सेदारी सिर्फ 4.8% थी, जो 2022 तक बढ़कर 26.5% हो गई, जबकि इसी दौरान अमेरिका की हिस्सेदारी 39% से घटकर 30.1% रह गई।
  • इस तुलना से भारत की चुनौती और स्पष्ट होती है, जहां टॉप 5 देश GDP का 2.5% से लेकर करीब 5% तक R&D पर खर्च करते हैं और निजी क्षेत्र की भागीदारी 66-78% के बीच है, वहीं भारत अभी भी 0.64% GDP खर्च और सिर्फ 36.4% निजी भागीदारी के स्तर पर है।

कुल मिलाकर भारत की चुनौती इसलिए केवल 'R&D पर कितना पैसा खर्च हो रहा है?' नहीं है। बल्कि, असली सवाल है, उस पैसे से कितनी नई तकनीक, कितने उत्पाद और कितनी वैश्विक प्रतिस्पर्धी क्षमता पैदा हो रही है? भारत ने R&D निवेश में वृद्धि की है और 2025 में Global Innovation Index में उसकी रैंकिंग 38 तक पहुंची, जो 2015 में 81 थी। अब अगला पड़ाव यह तय करेगा कि यह सुधार केवल रैंकिंग और शोध-पत्रों तक सीमित रहता है या भारत को वास्तव में रिसर्च से टेक्नोलॉजी और टेक्नोलॉजी से रोजगार व आर्थिक विकास की मजबूत श्रृंखला बनाने में सफलता मिलती है।