
Nottingham University Research : दांतों की सड़न, ठंडा-गरम लगने और मसूड़ों की तकलीफ से परेशान लोगों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी आई है! अक्सर आपने सुना होगा कि एक बार अगर दांत खराब हो जाएं या घिस जाएं, तो उन्हें पहले जैसा करना नामुमकिन होता है। डॉक्टर सिर्फ फीलिंग कर सकते हैं, लेकिन असली दांत वापस नहीं ला सकते। लेकिन ब्रिटेन के नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया है जो दंत चिकित्सा (डेंटल केयर) की दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है।
रिसर्चर्स ने एक ऐसा फ्लोराइड-फ्री जेल तैयार किया है, जो दांतों की ऊपरी सबसे मजबूत परत यानि इनेमल (Enamel) कुदरती तरीके से फिर से उगाने और नया बनाने में सक्षम है। यह जेल इनेमल की सूक्ष्म से सूक्ष्म दरारों को भर देता है और मुंह की लार से जरूरी खनिज खींचकर दांत पर एक नई, मजबूत और बिल्कुल असली जैसी परत बना देता है। आइए समझते हैं कि यह तकनीक कैसे काम करती है, यह आपके लिए कितनी फायदेमंद है और यह बाजार में कब तक उपलब्ध होगी!
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने बिना फ्लोराइड लार से असली दांत का रिसर्च किया है। (फोटो: Google Gemini AI)
दांतों का सबसे बाहरी और चमकदार सफेद हिस्सा इनेमल (Enamel) कहलाता है। यह इंसानी शरीर का सबसे कठोर ऊतक (टिश्यू) होता है—यहां तक कि यह हमारी हड्डियों से भी ज्यादा मजबूत होता है। इसका मुख्य काम हमारे दांतों को चबाने के दबाव, अत्यधिक ठंडे या गर्म तापमान,एसिडिक पदार्थों और बैक्टीरिया से बचाना है।
इनेमल भले ही बहुत कठोर हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें कोई जीवित कोशिकाएं (लिविंग सेल्स) नहीं होतीं।
स्किन या हड्डी की तरह नहीं: अगर आपकी स्किन कट जाए या हड्डी टूट जाए, तो शरीर की कोशिकाएं खुद-ब-खुद उसे ठीक कर लेती हैं।
एक बार गया तो गया: इनेमल के साथ ऐसा नहीं है। एक बार अगर आपका इनेमल घिस गया, एसिड की वजह से गल गया, या सड़न से नष्ट हो गया, तो मानव शरीर इसे दोबारा कभी नहीं बना सकता।
अम्लीय भोजन और पेय: कोल्ड ड्रिंक्स, सोडा, नींबू पानी, और ज्यादा खट्टे पदार्थों का सेवन।
गलत तरीके से ब्रश करना: बहुत तेजी से या सख्त ब्रिसल्स वाले ब्रश से दांत साफ करना।
दांत किचकिचाना (ग्राइंडिंग): नींद में या तनाव में दांतों को आपस में रगड़ना।
मीठा और जंक फूड: दांतों में चिपका खाना जो बैक्टीरिया को जन्म देता है और एसिड बनाता है।
आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की लगभग 50% आबादी इनेमल घिसने या दांतों की सड़न से जूझ रही है। अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो दांतों में भयानक दर्द, इन्फेक्शन, मसूड़ों की बीमारियां और यहां तक कि दांत टूटने की नौबत आ जाती है। इतना ही नहीं, खराब ओरल हेल्थ का सीधा संबंध डायबिटीज (मधुमेह) और हार्ट डिसीज (हृदय रोग) जैसी गंभीर बीमारियों से भी पाया गया है।
अब तक बाजार में मिलने वाले टूथपेस्ट, फ्लोराइड वार्निश या रीमिनरलाइजेशन ट्रीटमेंट केवल बचे हुए इनेमल को थोड़ा मजबूत कर सकते थे या दर्द में राहत दे सकते थे। वे इनेमल की मूल संरचना को दोबारा नहीं बना सकते थे। इसी समस्या का समाधान नॉटिंघम विश्वविद्यालय के फार्मेसी स्कूल और केमिकल व एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों नेढूंढ निकाला है। उन्होंने एक ऐसा बायो-मटीरियल (जैविक पदार्थ) बनाया है जो ठीक उसी प्राकृतिक प्रक्रिया की नकल करता है, जिस प्रक्रिया से बच्चा जब मां के पेट में होता है या शिशु अवस्था में होता है, तब उसके दांतों का इनेमल बनता है। इस शोध के नतीजे मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर कम्युनिकेशंस' (Nature Communications) में प्रकाशित हुए हैं।
नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार नये बायो जेल से दांतों का इनेमल दुबारा बन सकेगा। ( फोटो: ChatGPT)
इस जेल की कार्यप्रणाली बेहद दिलचस्प और प्राकृतिक है। इसे समझना बहुत आसान है:
बाजार में मिलने वाले ज्यादातर डेंटल प्रोडक्ट्स में फ्लोराइड का इस्तेमाल होता है, लेकिन इस नए जेल में फ्लोराइड बिल्कुल नहीं है। इसकी जगह इसमें खास तरह के सिंथेटिक प्रोटीन्स का इस्तेमाल किया गया है। ये प्रोटीन वही काम करते हैं जो बचपन में इनेमल बनाते समय कुदरती प्रोटीन करते थे।
जब डॉक्टर इस जेल को दांत पर लगाते हैं, तो यह दांत की सतह पर एक बहुत बारीक लेकिन मजबूत परत बना लेता है। यह परत इनेमल में मौजूद सूक्ष्म छिद्रों, दरारों और क्षतिग्रस्त हिस्सों के अंदर गहराई तक समा जाती है।
यह इस पूरी रिसर्च का सबसे मुख्य हिस्सा है। जेल लगाने के बाद, यह हमारे मुंह में मौजूद लार (Saliva) में से नेचुरल कैल्शियम (Calcium) और फास्फेट (Phosphate) के आयनों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसके बाद जेल इन खनिजों का उपयोग करके नए खनिज क्रिस्टल (Mineral Crystals) बनाना शुरू करता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में एपिटैक्सियल मिनरलाइजेशन कहते हैं। इसका मतलब है कि नए बनने वाले क्रिस्टल दांत के पुराने क्रिस्टल के पैटर्न में ही आगे बढ़ते हैं।
इसका फायदा: इससे नए क्रिस्टल अलग-थलग या अव्यवस्थित तरीके से जमने के बजाय, पुराने दांत की जड़ों और सतह के साथ एकदम प्राकृतिक रूप से जुड़ जाते हैं। नतीजा यह होता है कि नया बना इनेमल दिखने, छूने और मजबूती में आपके असली इनेमल जैसा ही होता है।
क्या आपको ठंडा पानी पीते ही या गर्म चाय लेते ही दांतों में तेज झनझनाहट महसूस होती है? अगर हां, तो यह जेल आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा।
इनेमल के ठीक नीचे एक थोड़ी मुलायम परत होती है जिसे डेंटिन (Dentin) कहते हैं। डेंटिन के अंदर हजारों बहुत छोटी-छोटी नलिकाएं (माइक्रोस्कोपिक ट्यूब्स) होती हैं, जो सीधे दांत की नसों तक जाती हैं। जब इनेमल घिस जाता है या मसूड़े नीचे खिसक जाते हैं, तो यह डेंटिन हवा और खाने-पीने की चीजों के संपर्क में आ जाता है। जैसे ही कोई ठंडी, गर्म, खट्टी या मीठी चीज इससे टकराती है, नसों में तीखा दर्द और झनझनाहट महसूस होती है।
जब इस नए जेल को खुले हुए डेंटिन वाले हिस्से पर लगाया जाएगा, तो यह उन सूक्ष्म नलिकाओं को पूरी तरह से बंद कर देगा और डेंटिन के ऊपर एक नई इनेमल जैसी खनिजीकृत सुरक्षात्मक परत तैयार कर देगा।
इससे नसों तक ठंडक या गर्मी पहुंचना बंद हो जाएगी।
दांतों की सेंसिटिविटी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।
दांतों पर नई कैपिंग या रिस्टोरेशन का काम करना आसान और मजबूत हो जाएगा।
कई लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि "क्या प्रयोगशाला में बना यह नया इनेमल सचमुच उतना ही मजबूत होगा जितना हमारा असली इनेमल है?"
इस सवाल का जवाब देने के लिए रिसर्चर्स ने इस नए बने इनेमल का बेहद कड़ा परीक्षण किया।
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और पोस्टडॉक्टोरल फेलो डॉ. अबशर हसन ने बताया कि उन्होंने लैब में ठीक वैसी ही स्थितियां पैदा कीं, जैसी हमारे मुंह के अंदर रोजमर्रा की जिंदगी में होती हैं:
ब्रश करने का घर्षण: दांतों पर बार-बार सख्त ब्रश चलाने का दबाव डाला गया।
चबाने का दबाव: खाना चबाते समय पड़ने वाले भारी दबाव का परीक्षण किया गया।
एसिड अटैक: अम्लीय और खट्टे पदार्थों के प्रभाव की जांच की गई जो इनेमल को गला देते हैं।
डॉ. हसन के अनुसार, इन सभी कठोर परीक्षणों के बाद यह पाया गया कि जेल से दुबारा बना हुआ इनेमल बिल्कुल स्वस्थ और असली इनेमल की तरह ही व्यवहार करता है। इसमें उतनी ही सहनशक्ति, कठोरता और लचीलापन है जो असली दांतों में होता है। इसका मतलब है कि यह रोजमर्रा के इस्तेमाल में आसानी से नहीं घिसेगा।
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार नई बायो तकनीक से दांतों की चमक लौट आएगी। ( फोटो : ChatGPT)
विशेषताएं / फ्लोराइड वार्निश नया प्रोटीनोमिक्स जेल (नॉटिंघम तकनीक)
काम करने का तरीका केवल बचे हुए इनेमल को थोड़ा मजबूत करता है। नष्ट हो चुके इनेमल की पूरी संरचना को दोबारा बनाता है।
सामग्री केमिकल्स और फ्लोराइड का उपयोग। प्राकृतिक प्रोटीन्स और लार के खनिजों का उपयोग।
स्थायित्व कुछ समय बाद दोबारा उपचार की जरूरत होती है। असली दांत की संरचना के साथ स्थायी रूप से जुड़ जाता है।
प्राकृतिक संरचना केवल एक ऊपरी अस्थायी परत जमाता है। क्रिस्टल्स को असली दांत के पैटर्न में उगाता है (एपिटैक्सियल)।
सुरक्षा फ्लोराइड की ज्यादा मात्रा बच्चों के लिए हानिकारक हो सकती है। पूरी तरह से सेफ, फ्लोराइड-मुक्त और बायोकम्पैटिबल।
इस रिसर्च का नेतृत्व करने वाले बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और बायोमटेरियल्स के प्रोफेसर अल्वारो माटा (Prof. Alvaro Mata) ने बताया कि इस तकनीक को बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि इसका उपयोग करना आसान हो।
त्वरित प्रक्रिया (Quick Application): डेंटिस्ट इस जेल को अपने क्लिनिक में ठीक उसी तरह आसानी से और जल्दी लगा सकते हैं, जैसे आज वे फ्लोराइड ट्रीटमेंट या दांतों की सफाई करते हैं। इसमें कोई दर्दनाक सर्जरी या ड्रिलिंग की आवश्यकता नहीं होगी।
सुरक्षित और विस्तार योग्य (Scalable & Safe): यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है और इसे बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों में बनाया जा सकता है।
हर उम्र के लिए उपयुक्त: इसका इस्तेमाल बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किसी भी उम्र के मरीज पर किया जा सकता है—चाहे इनेमल घिसने की समस्या हो या दांतों की संवेदनशीलता की परेशानी।
अगर आप सोच रहे हैं कि आप इस जेल को कब खरीद पाएंगे या अपने डेंटिस्ट से लगवा पाएंगे, तो आपके लिए एक और अच्छी खबर है!
रिसर्चर्स केवल लैब तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि वे इस तकनीक को आम जनता तक पहुँचाने के लिए बहुत तेजी से काम कर रहे हैं।
स्टार्टअप कंपनी बनाई: वैज्ञानिकों की टीम ने 'मिंटेक-बायो' (Mintech-Bio) नाम से अपनी एक स्टार्ट-अप कंपनी शुरू कर दी है।
कॉमर्शियल प्रोडक्शन: इस कंपनी के जरिए वे इस जेल का व्यावसायिक स्तर पर निर्माण और क्लीनिकल ट्रायल आगे बढ़ा रहे हैं।
संभावित लॉन्च: प्रोफेसर अल्वारो माटा के अनुसार, उन्हें पूरी उम्मीद है कि अगले साल तक इसका पहला उत्पाद बाजार में आ सकता है।
भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल कई तरह के डेंटल प्रोडक्ट्स में देखने को मिल सकता है, जैसे:
क्लिनिक में डॉक्टरों के इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोफेशनल जेल।
दांतों की सेंसिटिविटी दूर करने वाले स्पेशल प्रोडक्ट्स।
दांतों की फीलिंग (Filling) या क्राउन को मजबूत करने वाले मटीरियल।
यह ऐतिहासिक अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) नामक अंतरराष्ट्रीय साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
मेन रिसर्च टीम: अबशर हसन, एंड्री चुविलिन, अलेक्जेंडर वान टीजलिंगन, हेलेना रूको, क्रिस्टोफर पारमेंटर, फेडेरिको वेंचुरी, माइकल फे, गैब्रिएल ग्रीको, निकोला एम. पुगनो, जान रुबेन, चार्लोट जेसी एडवर्ड्स-गेल, बेंजामिन मायर्स, इंग्रिड ड्रेवेनी, नाथन काउइसन, एडम विंटर, सारा गेमिया, एक्स. फ्रैंक वालबूमर्स, तनवीर हुसैन, जोस कार्लोस रोड्रिग्ज-कैबेलो, फ्रेंकी रॉसन, टेल टटल, शेरिफ एल्शार्कवी, अविजीत बनर्जी, स्टीफन हेबेलित्ज़ और अल्वारो माटा।
नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की यह खोज सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि डेंटल साइंस के इतिहास में एक बहुत बड़ी क्रांति है। दशकों से माना जाता था कि दांतों का इनेमल नष्ट होने के बाद कभी वापस नहीं आ सकता, लेकिन इस बायो-इंस्पायर्ड जेल ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो बहुत जल्द दांतों की फिलिंग, ड्रिलिंग और कृत्रिम दांत लगाने जैसी दर्दनाक प्रक्रियाओं से दुनिया को मुक्ति मिल सकती है, और हम अपने प्राकृतिक दांतों को जीवनभर स्वस्थ बनाए रख सकेंगे!